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गुरुपर्व पर बाह्य समारोह से अधिक बल आन्तरिक साधना पर दें

[Shantikunj], Jul 04, 2017
गुरुतत्त्व क बोध करने कि क्षमता, उनके प्रति सच्चे समर्पण की पात्रता बढ़ायें

गुरुकृपा की चाह बनाम राह

आध्यात्मिक जगत में गुरुकृपा के महत्त्व को मुक्त कंठ से गाया और सराहा गया है।। सनातन आर्ष परम्परा में तो गुरु को ब्रह्मा- विष्णु-महेश्वर और साक्षात् परब्रह्म ही माना गया है ।। उनके प्रति श्रद्धा जाग जाये, उनका अनुग्रह मिल जाये तो लौकिक और पारलौकिक जीवन की श्रेष्ठतम विभूतियाँ उपलब्धियाँ मिलने का सहज मार्ग प्रशस्त हो जाता है ।। ऐसी गुरुसत्ता की कृपा पाने की चाह सभी साधकों में उभरना स्वाभाविक है ।।

लेकिन यहाँ यह तथ्य भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि उनकी कृपा का समुचित लाभ केवल चाह उभरने से नहीं, उसकी राह पकड़ने से ही मिलता है।। उस राह पर अविचल निष्ठा के साथ, निरन्तर बढ़ते रहने की साधना से ही ऐसा संभव होता है ।।

यह बात भी सही है कि चाह से ही राह बनती है ।। कहावत प्रसिद्ध है-  '' जहाँ चाह है वहाँ राह है ।। ''  राह साफ सुथरी है तो भी यदि चाह नहीं है तो कोई उस पर कदम नहीं रखता ।। लेकिन यदि चाह गहरी है तो राह की दुर्गमता भी बाधक नहीं बन पाती ।। जहाँ राह दिखती नहीं, वहाँ भी बन जाती है ।। यह कथन भी सही है कि ईश या गुरु अनुग्रह के बिना केवल पुरुषार्थ काफी नहीं होता ।। लेकिन यह तथ्य और भी सही है कि नैष्ठिक साधना पुरुषार्थ के बिना ईश- गुरु अनुग्रह प्राप्त नहीं हो पाता ।। जब साधक के मन में प्रबल चाह पैदा होती है और वह अपनी बुद्धि और शक्ति को उस दिशा में पूरी ईमानदारी से, तत्परतापूर्वक लगाने लगता है तो गुरुकृपा अवतरित होने लगती है ।। कठिनाइयों के हल निकलने लगते हैं ।। गुरुकृपा से प्रतिकूलताएँ घटने और अनुकूलताएँ बढ़ने लगती हैं ।। पुरुषार्थ फलित होने लगते हैं ।।

गुरुकृपा का महत्त्व सभी सम्प्रदायों में मान्य है ।। सनातनी, आर्य समाज, जैन, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान, सिक्ख, ज्ञानमार्गी, भक्ति मार्गी, सभी गुरु का महत्त्व स्वीकार करते हैं ।। उनके अनुग्रह से ही स्वर्ग, मुक्ति, सद्गति पाने, भव रोगों- पापों से उद्धार के रास्ते गुरु अनुग्रह से ही खुलते हैं, ऐसा विश्वास सभी पंथ के साधकों में है ।। सभी को अंदर गुरुकृपा की चाह होती है ।। यदि उस कृपा को पाने की राह पर चलने का मर्म समझ में आ जाये तो बात बन जाये ।। आइये, इसी को समझने, अपनाने का प्रयास करें ।।

गुरुमार्ग
भवसागर से, भव क्लेश से उबरने, उद्धार पाने के ज्ञान- सूत्र कहाँ से मिलें? उन्हें धारण कैसे करें? अनुभव सिद्ध- गुरुगीता के सूत्रों के माध्यम से इस प्रक्रिया को समझने का प्रयास करें :

त्रैलोक्य स्फुटवक्तारो देवाद्यसुरपन्नगा : ।।
गुरुवक्त्रस्थिता विद्या गुरुभत्क्या तु लभते ।। ।। २२ ।। ।।


तीनों लोकों के देव- असुर एवं नाग आदि सभी इस सत्य को बड़ी स्पष्ट रीति से बताते हैं कि ब्रह्मविद्या गुरुमुख में ही स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राय किया जा सकता है ।।

गुरुमुख खुले और गुरु भक्ति विकसित हो तो बात बने ।। गुरु नामधारी व्यक्तियों की भीड़ में गुरुतत्त्व को कैसे पहचानें, ताकि अभीष्ट सिद्धि के उद्देश्य पूरे होने के मार्ग में भटकाव न आये ।। इस हेतु अपने अन्दर शिष्य की तत्त्वदृष्टि जाग्रत् करनी होगी ।। गुरुतत्त्व को समझना होगा ।। इस संदर्भ में कहा गया है-

गुरुर्बुद्धयात्मनो नान्यत् सत्यं सत्यं न संशय : ।।
तल्लाभार्थं प्रयतस्तु कर्तव्यो हि मनीषिभि : ।।  ९  ।।


प्रबुद्ध आत्मा एवं सद्गुरु एक ही है? भिन्न नहीं है। यह सत्य है- सत्य है? इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इसलिए मननशील मनीषियों को इसकी प्राप्ति हेतु ही सभी श्रेष्ठ  कर्तव्य कर्म करना चाहिए।

यह बड़ा महत्त्वपूर्ण सूत्र है ।। प्रबुद्ध आत्मा ही सद्गुरु है ।। जिस व्यक्ति में आत्म तत्त्व प्रबुद्ध हो वही गुरु की भूमिका निभा सकता है ।। साधक की आत्मा चेतना प्रबुद्ध होने लगे तो उसके अन्दर से सद्गुरु की आवाज उभरने लगती है ।। प्रबुद्ध आत्मा वाला गुरु वास्तव में साधक के अन्दर के सद्गुरु को जाग्रत्- मुखर करने के लिए ही प्रयत्नशील रहते हैं ।।

भगवान दत्तात्रेय को जरूरत पड़ी तो प्रकृति के २४ घटकों से गुरु की वाणी प्रकट हो उठी ।। संत कबीर को प्रत्यक्ष गुरु का मार्गदर्शन तो नहीं के बराबर मिला था ।। उनके गुरु की पूर्ति तो प्रबुद्ध आत्मसत्ता ही करती रही ।। लेकिन उसे पाने के लिए साधक को अपने अन्दर गुरुभक्ति को जीवन्त बनाना पड़ता है ।। भक्ति ही गुरु अनुग्रह के लिए आवश्यक कीमत चुकाने में समर्थ होती है ।। भक्त तो बड़ी से बड़ी कीमत उसके लिए चुकाने को तत्पर होता है ।।

संत कबीर कहते हैं-

शशि चढ़ाये गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।।
अर्थात् यदि अपना सिर समर्पित करने से ( सम्पूर्ण आत्मसमर्पण से, अहंकार के पूर्ण विसर्जन से) भी गुरुतत्त्व का बोध किया जा सके तो भी उसे सस्ता सौदा ही मानना चाहिए ।। ऐसी प्रखर भक्ति विकसित करने के लिए सूत्र है-

गुरुमुर्ति स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत् ।।
गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत  गुरोरन्यन्न भावयेत् ।।  १८ ।।

सद्गुरु कृपा से अपने जीवन में भौतिक अध्यात्मिक लौकिक- अलौकिक समस्त विभूतियों को पाने की चाहत रखने वाले साधक को सदा ही गुरुदेव की छवि का स्मरण करक चाहिए। उनके नम का प्रति पल प्रति क्षण जप करना चाहिए साथ ही गुरु आज्ञा का जीवन की सभी विपरीतताओं के बावजूद सम्पूर्ण निष्ठा से पालन करना चाहिए । अपने जीवन में कल्याण कामना करने वाले साधक को गुरुदेव के अतिरिक्त अन्य कोई भावना नहीं रखनी चाहिए।

इस  श्लोक  में भक्ति को विकसित करने के तीन सूत्र दिए गये हैं ।। निरन्तर नाम स्मरण, आज्ञा पालन और अनन्य भाव ।। इन तीनों के मर्म को समझकर तद्नुसार नैष्ठिक अभ्यास करने से गुरुभक्ति दृढ़तर होती जाती है ।।

नाम स्मरण :-
नाम स्मरण से गुरु की स्मृति निरन्तर बनी रहती है ।। संसार के माया जाल में बुद्धि उलझ जाती है तो इष्ट का विस्मरण होने लगता है ।। नाम जप से गुरु स्मरण होता है, उससे अपनी अभीष्ट लक्ष्य और उसके लिए दिये गये निर्देशों का भी स्मरण होने लगता है ।। यंत्रवत बिना बौद्धिक लगाव के जप होने का विशेष लाभ नहीं होता ।। गुरु के लौकिक नाम के अनेक व्यक्ति हो सकते हैं।। अस्तु नाम से जुड़े हुए गुरु के दिव्य व्यक्तित्व और उनके निर्देशों का स्मरण होते रहना भी जरूरी है ।। तभी नाम जप का उद्देश्य पूरा होता है ।।

आज्ञा पालन:-
गुरु के दिव्य व्यक्तित्व का स्मरण होने से उनके अनुकूल बनने का भाव भी उभरता है ।। गुरु ब्रह्मा की तरह व्यक्तित्व गढ़ने में कुशल होते हैं ।। वे शिष्य की आन्तरिक स्थिति के अनुसार उसे जीवन साधना के निर्देश देते हैं ।। उन्हें याद रखकर उनको अभ्यास में लाने के प्रखर पुरुषार्थ को भी तप कहा जाता है ।। इस प्रकार तप साधना से भक्ति दृढ़तर होती है और साधक की प्रगति निरंतर होती रहती है ।।

अनन्य भाव :-
यदि साधक की शक्ति बिखरती रहे तो साधना के उचित परिणाम नहीं मिल पाते ।। यदि शक्ति लक्ष्य पर केन्द्रित रहे तो चमत्कारी परिणाम निकलने लगते हैं ।। सांसारिक आकर्षणों की ओर मन झुकता है तो शक्ति बिखरने लगती है ।। इसलिए जब लक्ष्य निशित कर लिया और समर्थ गुरु का मार्गदर्शन उपलब्ध हो गया है तो फिर अविचल भाव से एकनिष्ठ साधना के लिए दृढ़ भावना रखनी ही चाहिए ।।

ऊपर बतलाये गये सूत्रों के अनुसार गुरुमार्ग पर बढ़ने वाले साधकों को गुरुसत्ता के विशिष्ट अनुदान सहज ही प्राप्त होने लगते हैं ।।

गुरुतत्त्व का बोध
भक्तिभाव को दृढ़ करने के लिए प्रतीक पूजा को भी महत्व दिया जाता है ।। इष्ट की मूर्ति की तरह गुरु की काया को भी गुरु तत्त्व की प्रतीक भर माना जाना उचित है ।। गुरु तत्त्व तो त्रिदेवों तथा परब्रह्म की तरह अपार विस्तार वाला होता है ।। उस विराट का बोध न रहे तो शिष्य की दृष्टि के अनुसार उसकी साधना भी संकीर्ण ही रह जाती है ।। उसमें अनेक विकार आने लगते हैं ।। गुरु के प्रतीक के सामने नमन करते हुए शिष्य का चित्त उनकी विराट और समर्थ सत्ता के प्रति जागरूक रहे, इसीलिए गुरु वन्दना के श्लोकों में गुरु तत्व की ओर संकेत किए गये हैं : -जैसे-

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नम: ।।६७।।


अखण्ड वलयाकार चेतना के रूप में जो इस सम्पूर्ण चर- अचर जगत् में व्याप्त है, वह ब्रह्म तत्व व आत्म तत्व जिसके श्री चरणों की कृपा से दर्शित होती है उन मई सद्गुरु को नमन है।

जीव चेतना अपने मूल रूप दिव्य चेतना का बोध करे, यही अभीष्ट है।। गुरुसत्ता उस सर्वव्यापी परमात्म चेतना का दर्शन करा सकती है ।। किन्तु उसके लिए लौकिक नेत्रों से काम नहीं चलता, ज्ञान नेत्रों को खोलना पड़ता है ।। यह कार्य एक कुशल वैद्य की तरह गुरु कर पाते हैं :: कहा है-

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाअनशलाकया ।।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम : ।। ३४ ।।


नमन उन श्री गुरु को जो अज्ञान के अन्धकार से अन्धे जीव की आँखों को ज्ञानाज्जन की शलाका से खोलते हैं।

गुरु अपने ज्ञान के अंजन से शिष्य के ज्ञान नेत्र खोल सकता है ।। जब तक वह नहीं खुलते तब तक शिष्य गुरु से अपनी लौकिक कामनाओं की पूर्ति की ही कामना करता है ।। ज्ञान नेत्र खुलते ही सांसारिक माया के पीछे परमात्मा की अखण्ड चेतना का बोध कर पाता है ।। संसार भी माया का जंजाल नहीं, शिव रूप दिखने लगता है ।।

यस्य ज्ञानादिदं विश्व न दृश्य भिन्नभेदत : ।।
सदेकरूपरूपाय तस्मै श्री गुरवे नम : ।।  ३९ ।।

जिनके द्वारा ज्ञान मिलने से जगत् की भेददृष्टि समाप्त हो जाती है और वह शिव स्वरूप दिखाई देने लगता है जिनका स्वरूप एकमात्र सत्य का स्वरूप ही है उन सद्गुरु को नमन है ।

अस्तु साधक शिष्य को गुरु के प्रतीक के सामने नमन करते हुए भी उस दिव्य गुरु तत्व को प्रणाम करने का भाव जाग्रत रखना चाहिए ।। इस प्रकार भाव रखने से साधक सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी माया से मोहित नहीं होता तथा लौकिक एवं पारलौकिक प्रगति का लाभ उठाने में सफल होता है ।। जब तक साधक की भेद दृष्टि घटती नहीं, विश्व के कल्याणकारी रूप का बोध नहीं होता, तब तक साधक की गुरुनिष्ठा संदिग्ध ही मानी जायेगी।।

गुरुध्यान एवं अनुशासन

गुरुतत्व का मानसिक स्तर पर बोध होने पर भी ध्यान के माध्यम से गुरु चेतना की निकटता का बोध करना साधक के लिए उपयोगी होता है ।। इसके लिए साकार अथवा निराकार किसी भी तरह के ध्यान का आश्रय साधकगण अपनी प्रकृति के अनुसार ले सकते हैं ।।

साकार ध्यान के सूत्र गुरुगीता के निम्नलिखित श्लोकों में स्पष्टता से दिये गये हैं :

श्वेतामबरं  श्वेतविलेपपुष्पं मुक्ताविभूषं मुदितं द्विनेत्रम् ।।
वामांङ्कपीठस्थितदिव्यशक्तिं मन्दस्मितं सांद्रकृपानिधानम् ।। ९२ ।।


सद्गुरुदेव श्वेत वस्त्र पहने हुए हैं, उन्होंने श्वेत लेप धारण किया हैं। वे श्वेत पुष्प एवं मोतियों की माला से अलंकृत हैं । उनके दोनों नेत्रों से आनन्द छलक रहा हैं। उनके वामभाग में उनकी लीला सहचरी दिल शक्ति माँ विद्यमान हैं ऐसे मधुर मधुमय मुस्कान बिखेरने वाले गुरुदेव का ध्यान करना चाहिए।।

आनन्दमानन्दकरं प्रसन्न ज्ञानस्वरूपं निजबोधयुक्तम् ।।
योगीन्द्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमदगुरुंनित्यमहम् नमामि ।। ९३ ।।


गुरुदेव आनन्दमय रूप हैं। वे शिष्यों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं वे प्रभु प्रसन्नमुख एवं ज्ञानमय हैं । वे सदा आत्मबोध में निमग्न रहते हैं योगीजन सदा उनकी स्तुति करते हैं । संसार रूपी रोग के वही एक मात्र वैद्य हैं मैं उन गुरुदेव को नित्य नमन करता हूँ।

साकार ध्यान से गुरु के साथ आत्मीयता की अनुभूति बढ़ती है ।। इससे उनके अनुशासनों को मानने की तप साधना सहजता से होने लगती है ।।

निराकार ध्यान :-
कुछ साधकों को साकार की अपेक्षा निराकार ध्यान अधिक अनुकूल पड़ता है ।। इसमें गुरु को दिव्य ज्योति के रूप में अनुभव किया जाता है ।। जैसे प्रज्वलित दीपक के सम्पर्क में आने से अन्य दीपक भी ज्योतित हो जाते हैं, वैसे ही बोधमय गुरुसत्ता के सम्पर्क से साधक भी सहज बोध का लाभ ले पाते हैं ।।

नित्यं ब्रह्म निराकारं निर्गुण बोधयेत् परम् ।।
सर्व ब्रह्म निराभासं दीपो दीपान्तरं यथा ।।  १०९ ।।


नित्य निराकार , निर्गुण ब्रह्म का बोध केवल गुरु कृपा से मिलता है। जिस तरह दीप से दीप जलता है उसी तरह से गुरुदेव शिष्य के अन्तस् में ब्रह्मज्ञान की ज्योति जला देते हैं।

अंगुष्ठमात्रपुरुषं ध्यायतश्रिच्न्मयं हृदि ।।
तत्र स्फुरति भावो य :  शृणु तं कथयाम्यहम् ।। ११५ ।।

हृदय में चिन्मय आत्मज्योति के अंगुष्ठ मात्र स्वरूप का ध्यान करना चाहए। इस ध्यान की गहनता, सघनता व प्रगाढ़ता से जो भाव स्फुरित होते हैं, उन्हें सुनो ।

निराकार का ध्यान करने से गुरु चेतना का बोध अपने अन्दर- बाहर सभी जगह होने लगता है ।। दोनों ही प्रकार के ध्यान करने से गुरुसत्ता के प्रति आत्मीयता का भाव विकसित होता है ।। उनकी साक्षी में ही अपने विचार, कार्य और व्यवहार दिखते हैं ।। ऐसी स्थिति में गुरु के बताये अनुशासनों को पूरी तत्परता से पालने की निष्ठा दृढ़ होती है ।। उनके दिव्य व्यक्तित्व के सान्निध्य में, उनकी साक्षी में हीन विचार और कार्यों की ओर झुकाव नहीं होने पाता ।। श्रेष्ठ कार्यों को सम्पन्न करने के लिए साधक के अन्दर उत्साह और साहस का संचार होने लगता है।

गुरुपूर्णिमा पर्व के संदर्भ में युग साधकों को केवल पर्व- समारोहों तक ही सीमित न रहकर गुरु अनुग्रह पाने की अपनी पात्रता बढा़ने के लिए संकल्पित साधना करनी चाहिए ।...






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Amrendra kumar
2017-07-10 18:56:38
Satbottam