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पाँच दिवसीय बाल संस्कार शाला शिविर सम्पन्न.

[शांतिकुंज], Dec 26, 2017
11 राज्यों के 65 प्रतिभागियों ने की भागीदारी.शिष्य के व्यक्तित्व का निर्माण गुरु की प्रतिष्ठा का प्रश्न: डॉ प्रणव पण्ड्या. युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने ‘अध्यापक हैं युग निर्माता-छात्र राष्ट्र के भाग्य विधाता’ का नारा देकर बाल संस्कार शाला के महत्त्व को समझने और उसे पुनरूस्थापित करने का उत्साह जगाया। इन दिनों गायत्री परिवार द्वारा देश भर में चलायी जा रही बाल संस्कार शालाएँ इसी पुण्य परंपरा को जीवंत करने के सार्थक-सफल प्रयासों के रूप में देखी जा रही हैं।शांतिकुंज उनकी गुणवत्ता बढ़ाने और लोकप्रिय बनाने का निरंतर प्रयास कर रहा है। इसी क्रम में विवेकानंद हॉल में पाँच दिवसीय बाल संस्कार शाला शिविर का आज समापन हुआ। इसमें दिल्ली, गुजरात, मप्र सहित 11 राज्यों के 65 प्रतिभागियों ने अपनी शानदार सफलताओं का कारण संस्कार शालाओं के संचालकों का दृष्टिकोण बताया।अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि कभी भारत जगद्गुरु था, तब की गुरु-शिष्य संबंधों की परंपरा बड़ी आदर्श थी। शिष्य के व्यक्तित्व का निर्माण गुरु की प्रतिष्ठा का प्रश्न हुआ करता था और शिष्य में गुरु के प्रति भगवान से भी बढ़कर श्रद्धा के भाव विकसित होते देखे जाते थे। आज गुरु-शिष्य परंपरा शायद ही कहीं दिखाई देती हो। शिक्षक-विद्यार्थी का संबंध निहायत व्यावसायिक हो गया है। बनने-बनाने का न कोई लक्ष्य है, न पीड़ा। संस्था की अधिष्ठात्री शैल दीदी ने कहा कि बच्चों के व्यावहारिक शिक्षण का यह एक उत्कृष्ट प्रयोग है तथा शिक्षण तकनीक बाल मनोविज्ञान के साथ मनोरंजक कार्यों, खेलों के माध्यम से बच्चों में बदलाव लाने की कारगर विधि है।इस अवसर पर हजारीबाग झारखंड से आये प्रो० बी के विश्वकर्मा ने बताया कि उनकी बाल संस्कार शाला में बच्चों को इतना प्यार मिलता है जितना शायद उनके माता-पिता भी न दे पाते हों। दुर्ग छत्तीसगढ़ से आये रामलाल यादव ने बताया कि एक वर्ष में बच्चों में आये परिवर्तन और संस्कारों से प्रभावित होकर अब उनके अभिभावकों ने कहा है कि यह बाल संस्कार शाला किसी भी कीमत पर बंद नहीं होनी चाहिए। वे इसके लिए हर प्रकार का सहयोग करने के लिए तैयार हैं।






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