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हरिद्वार, 25 अक्टूबर।
    विजयादशमी की संध्यावेला में देव संस्कृति विश्वविद्यालय का विशाल मृत्युंजय सभागार एक घंटे तक करतल ध्वनियों से गूँजता रहा। अवसर था विवि. के स्टाफ द्वारा बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय के प्रतीक विजयादशमी पर्व पर रामचरित्र के मंचन का। जीवंत अभिनय, लाइट और साउंड के शानदार समन्वय के साथ इस नाट्य प्रस्तुति में रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाओं को इतने प्रभावशाली ढंग से उभारा गया था, जिसे देखकर मंत्रमुग्ध होकर अपने उल्लास की अभिव्यक्ति करते रहे। सभागार में दो घंटे की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ महाकाल मंदिर परिसर में किये गये रावण दहन में शांतिकुंज-विवि परिवार के साथ हरीपुर कलाँ गाँव के लगभग पाँच हजार लोगों ने भाग लिया।
    कुलाधिपति माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने इस प्रस्तुति पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि रावण का पुतला जलाकर लोग सोचते हैं कि रावण मर गया। रावण तो राम के आदर्शों के अनुगमन से ही मर सकता है। प्रसन्नता की बात है कि यह विश्वविद्यालय परिवार इस दिशा में सतत आगे बढ़ रहा है। आदर्शों के अनुगमन का उनका उत्साह केवल अभिनय में ही नहीं झलकता, बल्कि उनके जीवन में भी दिखाई देता है। डॉ. पण्ड्या जी ने कहा कि हमारे विश्वविद्यालय के विद्यार्थी व्यक्तिगत उत्कर्ष की आकांक्षा के साथ समाज को प्रगतिशील दिशाएँ प्रदान करने के सामूहिक संकल्प के साथ विद्यार्जन कर रहे हैं।
    विजयादशमी की मनमोहक प्रस्तुति के निदेशक, पटकथा लेखक और राम की भूमिका निभाने वाले श्री ओमप्रकाश तेजरा ने बताया कि रामचरित्र पर मंचित थियेटर में  उन प्रेरणाओं को प्रमुखता से उकेरा गया था, जो नवरात्रि के नौ दिनों में साधना की विशेष कक्षा में उनके कुलाधिपति जी ने बतायी थीं। सृजनात्मकता को उकेरने वाले सह निदेशक गोपाल शर्मा ने नाटक के सूत्रधार के रूप में रामचरित्र की तत्कालीन प्रेरणाओं को आज की समस्याओं से जोड़ते हुए उनके वह समाधान बताये, जो परम पूज्य आचार्य श्रीराम शर्मा जी ने अपनी पुस्तक-रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाओं में वर्णित किये हैं।
    सांस्कृतिक संध्या का शुभारंभ मातृ वंदना से हुआ। उसके बाद विद्यार्थीदल द्वारा प्रस्तुत बंगाली नृत्य महिषासुर मर्दिनी की प्रस्तुति में आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने के लिए सद्बुद्धि की प्रार्थना की गयी। रामचरित्र पर मंचित 55 मिनिट के थियेटर में बृजेश एवं सजल के लाइट-साउंड इफैक्ट और शिवनारायण के पार्श्व संगीत के समन्वय ने उसे व्यावसायिक स्तर का बना दिया था।
    अंतिम प्रस्तुति के रूप में महाकाल मंदिर परिसर में रावण के पुतले का दहन हुआ। पुणेन्द्र, आलोक, फिरोज एवं उनकी टीम ने पिछले पंद्रह दिनों के अथक परिश्रम से यह आकर्षक पुतला बनाया था। रावण दहन के इस प्रेरक प्रसंग में आतिशबाजी, गंदगी तथा अन्यान्य विकृत परंपराओं से पूरी तरह परहेज किया गया था।


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