आत्मचिंतन-आत्मबोध का महापर्व शांतिकुंज में आयोजित राष्ट्रीय जोनल कार्यकर्त्ता शिविर आज समाज को जिन चरित्रवान श्रेष्ठ व्यक्तियों की आवश्यकता है, उनके निर्माण का एक ही आधार है-साधना। इसी से परम पूज्य गुरुदेव के ‘मानव में देवत्व का उदय’ और ‘धरती पर स्वर्ग का अवतरण’ के संकल्प को साकार करने का यही आधार है। इस वर्ष का हमारा प्रमुख लक्ष्य है समूह साधना से समूह चेतना का निर्माण। समूह चेतना के जागरण से लोगों के मन बदलेंगे, विचार बदलेंगे तो देखते ही देखते परिस्थितियाँ भी बदलती चली जायेंगी। आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने यह संदेश १ से ३ मार्च की तारीखों में शांतिकुंज में आयोजित राष्ट्रीय जोनल कार्यकर्त्ता शिविर में दिया। उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव के तप और जीवनादर्शों को आधार बनाकर उनका अनुसरण करने की प्रेरणा दी। साधना सर्वांगीण होआदरणीय श्री उपाध्याय जी ने  साधना के स्वरूप को समझाते हुए कार्यकर्त्ताओं को केवल जप, पूजा, ध्यान तक ही सीमित नहीं रहकर मन, विचार, व्यवहार को बदलने के लिए समूह साधना करने की प्रेरणा दी। उन्होंने पांडवों का उदाहरण देते हुए कहा कि हर व्यक्ति की विशेषताएँ और क्षमताएँ भिन्न होती हैं, लेकिन विजयी वही होते हैं जो परस्पर समन्वय से सभी की विशेषताओं का उपयोग कर लेने की योग्यता रखते हैं। समूह साधना का महत्त्व बताते हुए उन्होंने कहा कि सोडियम जैसा ज्वलनशील और क्लोरीन जैसा जहरीला पदार्थ मिलकर लावण्य (नमक) तैयार करने की क्षमता रखता है। फिर हम मतभेद रहते हुए भी एक उद्देश्य के लिए समर्पित स्वजनों की विशेषताओं का उपयोग क्यों नहीं कर पाते? हमारे गुरुदेव ने हर विचारधारा के व्यक्ति को अपना बना लिया, हमें भी यह साधना करनी चाहिए। मान्यताएँ बदलनी होंगीश्री बृजमोहन गौड़ ने समयदान का आह्वान करते हुए स्वजनों को अपनी मान्यताओं को बदलने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि साधन सुविधा वाला जीवन जीने वाला व्यक्ति बड़ा होता है, यह मान्यता हमें बदलनी होगी। सादा जीवन जीकर भी हम बड़े काम कर सकते हैं, महान इंसान बन सकते हैं, यह सत्य अपने अंतःकरण में प्रतिष्ठित करना होगा। भगवान के कार्य के लिए जन्म मिलना और गुरुदेव जैसी महान सत्ता से जुड़ना जीवन का महानतम सौभाग्य है यह धारणा पुष्ट हो, तभी समयदान का उत्साह जागता है। कार्यकर्त्ता शिविर में पूरे देश के जोनल एवं उपजोनल केन्द्रों के समन्वयकों, स्थानीय समन्वयकों, लेखा सहयोगियों  को आमंत्रित किया गया था। श्री कालीचरण शर्मा जी ने गायत्री परिवार को ऋषि परंपरा का अनुयायी बताते हुए इस परंपरा को जन-जीवन से जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने इस वर्ष की कार्ययोजना की चर्चा की।शिविर में वरिष्ठ भाईयों द्वारा उद्बोधन, विचार-विश्लेषण एवं प्रश्नोत्तरी द्वारा जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। प्रतिभागियों के बीच विचार-विमर्शर् तथा समूह चर्चाएँ भी सम्पन्न हुईं। लोकरंजन से लोकमंगल की भावना से शांतिकुंज के कार्यकर्त्ताओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत हुए। प्रातःकाल अलग-अलग जोन से पधारे परिजन आदरणीय डॉ. साहब एवं आदरणीया जीजी से भेंट-परामर्श हेतु मिले। भोजन परोसने, स्वागत-आवास, स्टेज सज्जा, वाहन व्यवस्था, समूह चर्चा, मंच संचालन आदि सभी कार्यों में शांतिकुंज के विभिन्न जोनल कार्यालयों ने अपनी सेवाएँ दीं। समापन सत्र ३ मार्च (प्रातः ८.३० से पूर्वाह्न ११.१५) को समूह चर्चाओं के निष्कर्ष बताये गये, जिसमें सर्व सम्मति तथा सर्वानुमति से लिये गये कार्ययोजनाओं के विभिन्न स्वीकृत प्रस्ताव बताये गये। फिर विभिन्न जोनल प्रतिनिधियों ने अपनी अनुभूतियाँ तथा ग्रहण की गयी प्रेरणाओं का उल्लेख किया। आदरणीय श्री गौरीशंकर जी, व्यवस्थापक शांतिकुंज के व्याख्यान के पूर्व विशेष प्रेरणाप्रद प्रज्ञागीत की संगीतमय प्रस्तुति की गई। उन्होंने अपने हृदयस्पर्शी व्याख्यान में विदाई की कसक को व्यक्त किया तथा सभी लोकसेवियों को गुरुदेव के दिशाबोध को स्मरण कराया। बाद में ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल के समक्ष (जिसे भाईयों-बहिनों के समूह ने उठाया था।) सभी परिजनों को शपथ व्रत धारण कराया गया। अंत में गुरुसत्ता तथा तीर्थचेतना की ओर से आशीर्वचनों के साथ सभी प्रतिभागियों पर पुष्पवृष्टि की गई तथा शांतिपाठ किया गया। मन में विछोह की कसक लिये पर विभिन्न मोर्चों पर ज्ञान, प्रेम और सेवा के माध्यम से जन-जन में देवत्व जगाने, जाग्रत् आत्माओं में युगधर्म के परिपालन का उत्साह जगाने का संकल्प लिए हुए सभी प्रतिभागीगण शांतिकुंज से विदा हुए।   समयदान को युगधर्म मानते हुए परिव्राजक और वानप्रस्थ परंपरा के पुनर्जीवन की आवश्यकता प्रमुखता से बतायी गयी।  प्रज्ञा मंडल, महिला मंडल, युवा मंडल आदि सभी प्रकार के मंडलों के एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित हों।  विभिन्न मण्डलों के समूह के रूप में नवचेतना विस्तार केन्द्रों की स्थापना हो।  समर्थ शक्तिपीठ परिव्राजक सत्रों का आयोजन करें।  शक्तिपीठों पर सामूहिक पर्व आयोजनों को प्रोत्साहन मिले, ताकि सभी वर्ग के लोग युग निर्माणी प्रेरणाएँ ले सकें।  वानप्रस्थों के सम्मेलन आयोजित किये जायें।  शक्तिपीठ, जिला, उपजोन स्तर पर ११, २१, ५१, १०८ गाँवों में जनजागरण के संकल्प के साथ साइकिल यात्राएँ निकाली जायें।  विभिन्न प्रकार के आयोजनों से लोगों को सरकारी, गैर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी जाये।  ग्रामीण अंचल में यज्ञ-संस्कार प्रधान, सामान्य नगरों में प्रज्ञापुराण प्रधान और बड़े नगरों में दीपयज्ञ-प्रज्ञा प्रवचन प्रधान कार्यक्रमों के सुझाव प्रतिभागियों की ओर से आये।   हर जिले में एक आदर्श गाँव का विकास किया जाये।


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