सरस्वती विद्या मंदिर में डॉ. प्रणव जी ने बताया शिक्षा का उ्देश्य
  • मान. डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने किया सिस्टर निवेदिता भवन का लोकार्पण
भारतीय संस्कृति केवल नाच-गाने और खंडहरों तक सीमित नहीं है, यह महामानवों को गढ़ने की संस्कृति है। विदेशों में मात्र कुछ संत देखे जाते हैं, लेकिन भारत ने हर समय, हर युग में उच्च कोटि के ऋषि, मुनि, महामानव गढ़े हैं। उन्होंने सारे विश्व को शांति, एकता, अखण्डता के सूत्रों में बाँधने का प्रयास किया है। भारतीय संस्कृति ने सारे विश्व को अजस्त्र अनुदान दिये हैं। जो विद्या विद्यार्थी को इस संस्कृति में ढाल सके, वही सच्ची विद्या है। भारतीय संस्कृति अंतर्जगत को बलवान बनाती है। 

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने रुड़की के एक प्रतिष्ठित विद्यालय-आनंद स्वरूप आर्य सरस्वती विद्या मंदिर में आयोजित सभा में व्यक्त किये। वे नवसंवत्-२०७१ के प्रथम दिन विद्यालय के नवनिर्मित ‘भगिनी निवेदिता भवन’ का लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में आयोजित सभा को संबोधित कर रहे थे। 

माननीय डॉ. प्रणव जी ने शांतिकुंज और देव संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा उस वैभवशाली संस्कृति को देश और दुनिया में पुनःस्थापित करने के विविध प्रयासों की चर्चा की। शांतिकुंज के अश्वमेध यज्ञों से लेकर देसंविवि द्वारा विश्वव्यापी विद्याविस्तार के प्रयासों की जानकारी दी। अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही दासता की मनोवृत्ति बढ़ाने वाली शिक्षा-नीति में बदलाव लाने की आवश्यकता बतायी। 

विद्यार्थियों सहित सभी श्रोताओं को नवसंवत् शुभारंभ पर अपनी मंगलकामनाएँ प्रदान करते हुए कहा कि विद्या वही सार्थक है जो विद्यार्थियों के जीवन में वसंत ला सके। गुरुकुल कांगड़ी के इतिहास के विभागाध्यक्ष डॉ. जबर सिंह सेंगर सहित राम, कृष्ण, अरविंद, ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जैसे संस्कृति के अग्रदूतों के जीवन की प्रेरणाओं से भरपूर उनके वक्तव्य ने विद्यार्थियों और शिक्षाविदों को नयी सोच के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। 




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