आत्म परिष्कार और उज्ज्वल भविष्य के लिए करें समूह साधना के छोटे- बड़े प्रयोग

वर्ष 2014 के प्रथम दिन प्रभात की प्रथम किरणों के साथ समूह साधना वर्ष का शुभारंभ हुआ। पूरे देश से आये हजारों शिष्य- साधकों ने नये वर्ष का शुभारंभ ध्यान साधना, गायत्री महामंत्र के सामूहिक जप, यज्ञ, अखण्ड दीप दर्शन और गुरुचरण पादुकाओं के प्रणाम के साथ किया। आदरणीया शैल जीजी और आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने नववर्ष के उपलक्ष्य में सभी साधक, शिविरार्थी, आश्रमवासियों को प्रसाद और समूह साधना वर्ष का अभिनंदन पत्र प्रदान किया।
गायत्री परिवार वर्ष 2014 को समूह साधना वर्ष के रूप में मनायेगा। इस आशय की घोषणा नववर्ष की पूर्व संध्या पर शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में आदरणीय डॉ. साहब ने की। इस अवसर पर समूह साधना वर्ष के लोगों का विमोचन भी हुआ।

इस अवसर पर दिये अपने संदेश में आदरणीय डॉ. साहब ने समूह साधना वर्ष की महत्ता और कार्यक्रमों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति में असुरता के निवारण के लिए सदैव सामूहिक साधना प्रयोग हुए हैं। दुर्गा का अवतरण देवताओं के सामूहिक योगदान से हुआ था। भगवान राम के वनवास के समय सारे अयोध्या वासियों ने असुरता के निवारण के लिए सारे सुख और भोग का त्याग कर तप किया था। उन्होंने कहा कि गायत्री महामंत्र समूह चेतना के जागरण का मंत्र है, जिसमें समूह (हम) द्वारा परमात्मा को अंतःकरण में धारण करने और समूह की (हमारी) बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने की प्रार्थना की गयी है।
आदरणीय ने कहा कि अवतारों को भी असुरता के निवारण के लिए तपस्वियों की आवश्यकता पड़ती है। परम पूज्य गुरुदेव ने सन्1953 से 1956 तक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान, युग संधि महापुरश्चरण साधना सहित सामूहिक साधना के अनेक प्रयोग कराये, जिनके असाधारण परिणाम मिले हैं। आज समाज में उपस्थित हजारों रावणों के विध्वंस के लिए जिस वातावरण और ऊर्जा की आवश्यकता है, समूह साधना वर्ष 2014 से उसका निर्माण होगा।

समूह साधना वर्ष में यह करें-

शक्तिपीठ, शाखाओं में साधना शिविर आयोजित किये जायें।
जगह- जगह दैनिक और साप्ताहिक सामूहिक साधना आरंभ की जाये
समूह साधना वर्ष के उपलक्ष्य में विशेष अनुष्ठानों का आयोजन हो।
छोटे साधना- प्रार्थना प्रयोग ( मिनट)
कार्यालयों में कामकाज के आरंभ में सामूहिक ध्यान, जप, प्रार्थना हो।
कक्षा, संस्कार, संगोष्ठियों का आरंभ भी 5 मि. के ध्यान, जप, प्रार्थना से हो।
शिक्षण संस्थानों में प्रार्थना सभा, संगोष्ठियों व कक्षा के आरंभ में गायत्री मंत्र के बाद दो मिनट मौन प्रार्थना हो।
अपनी आस्था के अनुरूप इष्टमंत्र, नाम जप के साथ इसी तरह की प्रार्थनाएँ करने का अनुरोध किया जाये।
घर, दुकान, कार्यालय, सार्वजनिक स्थानों पर भी ऐसे प्रयोग किये जायें।





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