अनुशासित जीवन जीने का संकल्प ले लौटे संस्कृति रक्षक । आत्मा और परमात्मा का मिलन है : योग - डॉ. प्रणव पण्ड्या

Published on 2017-12-26

        


  आज का युवा पाश्चात्य संस्कृति का उपासक हो गया है। फैशन, व्यसन और फास्टफूड को अपनाकर वह पाश्चात्य संस्कृति की ओर अग्रसर हो रहा है। ऐसे में विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का अनुपम कार्य किया है भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा। यह कथन है देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा० प्रणव पण्ड्या जी का। वे शांतिकुंज में आयोजित प्राणीण्य छात्र व्यक्तित्व परिष्कार प्रशिक्षण सत्र में सहभागी होने आए सैकड़ों विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति एक संस्कृति मात्र नहीं, अपितु जीवन जीने की कला है। संस्कृति ज्ञान, वेशभूषा, रीति रिवाज और परम्पराओं की जननी है। वह मानव को देव मानव बनने का गुर सिखाती है। हमारे ऋषियों ने अपने तप बल से जिस संस्कृति को खोजा और संजोया, उसे ही हमने धर्म का नाम दिया। योग हमें आत्मनुशासन सिखाता है तथा आत्मा और परमात्मा का मिलन कराता है। मनुष्य भारतीय संस्कृति और योग के बिना दिग्भमित हो जाता है। डॉ. पण्ड्या के अनुसार संस्कृति ही उसे रास्ता दिखाती है, योग उसे चरम तक पहुँचाता है। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि आज का युवा जहाँ पैकेज की ओर भागता है, वहीं गायत्री विद्यापीठ और देवसंस्कृति विवि से निकले छात्र भारतीय संस्कृति के संवाहक बने हैं। उससे पूर्व पाँच दिवसीय प्रशिक्षण सत्र में आये विद्यार्थियों के लिए भाषण, काव्य एवं आध्यात्मिक प्रश्रोत्तरी की प्रतियोगिता आयोजित हुई जिसमें विद्यार्थियों ने बढ़ चढ़कर प्रतिभा प्रदर्शन किया। इस पाँच दिवसीय प्रशिक्षण के समापन अवसर पर विभिन्न प्रतियोगिता में भाग लेने वाले बच्चों को पुरस्कृत किया।  गौरतलब है कि भारत भर से आये इन छात्रों को श्री गौरीशंकर शर्मा ने पुरस्कृत किया। ये वे  विद्यार्थी हैं जिन्होने अपने जिले स्तर पर भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्तर पर स्थान प्राप्त किया था। 

          सूरदास किशन तड़वी ने जीता पुरस्कार, राष्ट्रीय स्तर की भाषण प्रतियोगिता में रहा अव्वल

          गुजरात के सूरत से आये बारहवीं कक्षा के सूरदास किशन तड़वी ने इस भाषण प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त कर एक अनूठी मिसाल कायम की है। इसके अलावा सूरत से ही आए सागर, जो अपंग है और अल्पेश में जो मूक वधिर है, इन तीनों छात्र विविध प्रतियोगिता में सफलताएँ प्राप्त कीं। एक प्रश्र में उत्तर में किशन ने कहा कि भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा देने से मेरे अन्दर आत्मबल विकसित हुआ है। शांतिकुंज में आकर मुझे शांति और प्रेरणा मिली है। इसके अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश, झारखण्ड सहित देशभर से आये साढ़े तीन सौ बच्चों में हरिद्वार के ज्वालापुर से आरजू अंसारी एवं अभिनव थापा ने भी जीते विविध पुरस्कार। 

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