अपने समाज के पुरोहित होने का गौरव अनुभव करते हैं श्रीराम गुरुकुल के विद्यार्थी

खड़कौद, बुरहानपुर (मध्य प्रदेश)
अप्रैल २०१४ के एक मासीय युग शिल्पी सत्र में श्रीराम गुरुकुल, खड़कौद के ३२ नन्हें (कक्षा ३ से ९ तक के) विद्यार्थी भी शामिल हुए। विद्यालय के गणवेश में अनुशासन और उत्साह से लबरेज इन विद्यार्थियों को देखना सुखद था। सत्र की विभिन्न कक्षा लेने वाले आचार्यों को भी उन्होंने खूब प्रभावित किया। 

सामान्य नहीं, युग निर्माणी अग्रदूत
ये छोटे-छोटे बच्चे सामान्य नहीं, अपने क्षेत्र में युग निर्माण आन्दोलन की जड़ों को गहरा और मजबूत करने वाले अग्रदूत हैं। इन्हीं की तरह विद्यालय में अध्ययन करने वाले २६० विद्यार्थी पुरोहितों की टोली नवरात्रि के दिनों में जब गाँव-गाँव जाकर एक साथ एक ही समय में गायत्री यज्ञ कराते हैं तो पूरा गाँव गायत्रीमय हो जाता है। लगभग ७० गाँवों में इनका कार्यक्षेत्र है, ये सभी इनके स्वभाव, संस्कारों को देखकर गदगद् हैं। इनकी सक्रियता से समाज बदल रहा है, जन-जन में युग निर्माणी आस्था जाग रही है। बच्चों की इन्हीं विशेषताओं को लेकर उनके एक समूह और आचार्यों से चर्चा हुई। 

गुरुकुल न आते तो अनपढ़ ही रह जाते
गुरुकुल संचालक श्री सचिन पाटिल ने बताया कि इनमें से अधिकांश बच्चे खानाबदोश जिंदगी जीने वाले वनवासी घरों के हैं। ऐसे गरीब परिवार के लोग जिनके लिए अपने बच्चों को शिक्षा देना संभव नहीं, वे श्रीराम गुरुकुल में प्रवेश पाते हैं। यह आवासीय गुरुकुल है जो पिछले ९ वर्षों से समाज की निःशुल्क सेवा कर रहा है। इन नौ वर्षों में श्रीराम गुरुकुल के बच्चों ने अपने घर, परिवार और समाज का दिल तो जीता ही है, जिला और प्रांतीय स्तर तक अपनी अलग पहचान बनायी है। विद्यालय के १००-१२५ बच्चे पिछले ५ वर्षों से हर वर्ष जिला स्तर के गणतंत्र दिवस समारोहों में योग प्रदर्शन कर हमेशा प्रथम स्थान प्राप्त करते रहे हैं। श्री सचिन बताते हैं कि ये ऐसे बच्चे हैं जो हमारे गुरुकुल में न आते तो शायद अनपढ़ ही रह जाते। 

बच्चों को होता है गौरव-बोध
श्रीराम गुरुकुल में प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में जागरण से लेकर शयन तक शांतिकुंज जैसी ही नियमित दिनचर्या है। अनुशासित वातावरण, संस्कारित जीवन और गुरुदेव के क्रांतिकारी विचार इनके जीवन में पूरी तरह से घुल-मिल गये हैं। न केवल संस्कारों में, बल्कि शिक्षा में भी ये बच्चे किसी से कम नहीं। इसके लिए उन्हें कड़ी मेहनत करायी जाती है। 

ये विद्यार्थी जब भी यज्ञ कराने या छुट्टी में अपने गाँव जाते हैं तो पूरा गाँव इन्हें बड़ी श्रद्धा और सम्मान के साथ देखता है। गाँव वाले तो इनके आने का लाभ लेने को लालायित होते हैं। वे इनसे यज्ञ कराते हैं और आशा करते हैं कि इससे उनके घर में भी गुरुदेव की कृपा बरसे, सुख-शांति आये, उनके बच्चे भी संस्कारी और सतोगुणी बन जायें। 

अपने घर-परिवार से मिलने वाले इस सम्मान से बच्चे भी भावविभोर दिखाई दिये। वे भरे हृदय से अपने गुरुकुल का आभार व्यक्त कर रहे थे। कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि जब वे अपने गाँव के दूसरे बच्चों को गाली-गलौच करते देखते हैं तो उन्हें लगता है कि भगवान की उन पर कितनी बड़ी कृपा है जो उन्हें ऐसी गंदगी से बचा लिया। कई बच्चों ने भरी आँखों से अपने घर के लड़ाई-झगड़े, नशे से धुत पिता द्वारा माँ को पीटे जाने के किस्से सुनाये। इन परिस्थितियों को बदलने का उत्साह उनमें दिखाई दिया। 

सफलता का उत्साह
ये विद्यार्थी इस बात से बड़े खुश दिखे कि उनके संस्कारों का प्रभाव उनके घर-परिवार पर भी दिखाई देता है। उनके पिता व घर के अन्य लोग उनके आग्रह का सम्मान करते हैं। बच्चों को सबसे ज्यादा खुशी अपने अभिभावकों का नशा छुड़ाने में मिलती है। नशा छूटने से घर का वातावरण भी बदलता है, मार-पीट कम होती है, सुख-शांति बढ़ती है, प्रेम भाव बढ़ता है। जब भी बच्चों ने घर की पुरानी दयनीयता को याद किया, उनकी आँखें नम हो गयीं। फिर एक ठंडी साँस लेकर बताते हैं कि गुरुदेव ने उन्हें बचा लिया। 

प्यार की धरोहर पाकर धन्य हुए
चि. लोकेश ने कहा, ‘‘यहाँ आने से पहले मेरी कल्पना थी कि शांतिकुंज किसी पहाड़ पर एक शांत आश्रम होगा, लेकिन यहाँ पहला कदम रखते ही मेरी मान्यताएँ बदल गयीं। ऐसा लगा जैसे हम स्वर्ग में आ गये हैं। एक माह के अध्ययन के बाद नयी शक्ति का संचार हुआ है। अब हम सामान्य बच्चे नहीं, परम पूज्य गुरुदेव-माताजी जैसे महान ऋषि के बच्चे हैं। हम उनके बताये रास्ते पर चलकर समाज को जरूर बदलेंगे।’’

श्रद्धेय डॉ. साहब और श्रद्धेया जीजी के प्यार को ये बच्चों जीवन की अनमोल धरोहर के रूप में सँजोकर लौटे। उन्होंने कहा कि यह प्यार उन्हें बार-बार आने के लिए प्रेरित करेगा। बच्चों ने कहा, ‘‘हम चाहते हैं कि हमारा पूरा परिवार यहाँ आये। यहाँ सबसे भरपूर प्यार मिलता है।’’

देव संस्कृति विवि. में गढ़ेंगे अपना भविष्य
देव संस्कृति विश्वविद्यालय देखकर सभी विद्यार्थी अभिभूत थे। यह उनके सपनों का विश्वविद्यालय बन गया। विद्यालय आचार्य श्री सचिन पाटिल ने कहा कि वे अपने सभी विद्यार्थियों को यहाँ प्रवेश दिलाना चाहते हैं। वे इसके लिए बच्चों को कड़ी मेहनत करा रहे हैं। 



कुछ विशेष प्रसंग
शांतिकुंज से स्वदेश लौटते हुए यह टोली जन्मभूमि आँवलखेड़ा भी गयी। वहाँ विद्यार्थियों ने २५ गाँवों की परिव्रज्या करते हुए उनके ७२० घरों में गायत्री यज्ञ सम्पन्न कराया। 

श्रीराम गुरुकुल के संचालक बच्चों का पालन-पोषण पारिवारिक भावनाओं के साथ करते हैं। बच्चों को गोशाला से निःशुल्क दूध दिया जाता है, लेकिन बच्चों की भावनाएँ भी इतनी उदात्त कि बड़े बच्चे इसे स्वीकार न कर अपने छोटे भाइयों को उसे उपलब्ध कराते हैं।


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