• भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की निरंतर बढ़ रही है लोकप्रियता, आकर्षित हो रहा है शिक्षा जगत

पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में बहती नयी पीढ़ी को गिरते सांस्कृतिक मूल्यों से बचाना आज की बहुत बड़ी चुनौती है। भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा ने औपचारिक शिक्षा के समानांतर बच्चों को अपनी सनातन संस्कृति और उनके महान मूल्यों की गरिमा समझाने में बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। सन् १९९४ में २००० बच्चों की भागीदारी से आरंभ हुई इस परीक्षा में गतवर्ष ५० लाख विद्यार्थी शामिल हुए हैं। लोग इसके प्रभाव से बच्चों में आ रहे परिवर्तन को अनुभव कर रहे हैं। उनकी सोच बदल रही है। विद्यालयों का वातावरण बदल रहा है। प्रांत, जिला और तहसीलों में होने वाले पारितोषिक वितरण समारोहों में शिक्षाविद् और समाज के मनीषी गायत्री परिवार के प्रयासों और उनके दूरगामी परिणामों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। नयी पीढ़ी की रगों में हो रहे संस्कृति के संचार से जन-जन उत्साहित है। 
जन उत्साह की बानगियाँ शांतिकुंज में आयोजित हो रहे भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा संबंधी विभिन्न शिविरों में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। इस संदर्भ में कुछ तथ्य ध्यान देने योग्य हैं -

  •  इस वर्ष भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के व्यक्तित्व परिष्कार एवं राष्ट्रीय पुरस्कार वितरण समारोह में ३५० बच्चों ने भाग लिया, जबकि हर वर्ष यह संख्या १०० तक ही सीमित रहती थी। 
  •  राष्ट्रीय चुनावों के बाद तीन शिक्षक गरिमा शिविर आयोजित हुए जिनमें आशा से कहीं अधिक ६५० की औसत संख्या रही। गतवर्ष तक यह अधिकतम ३००-४०० हुआ करती थी। 
  •  अधिकांश शिविरार्थी शिक्षक नये ही होते हैं। जो भी शिक्षक इस परीक्षा को गहराई से समझता है, वह इसकी पवित्र गंगोत्री, युगऋषि की तपःस्थली को देखने के लिए बहुत उत्साहित दिखाई देता है। 
  •  जन आस्था का सम्मान करते हुए देसंविवि के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या प्रत्येक शिविर के स्वागत उद्बोधन में बच्चों के व्यक्तित्व विकास की शांतिकुंज की अवधारणा स्पष्ट कर रहे हैं। माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या विदाई उद्बोधन देते हुए शिक्षा जगत को उसका युगधर्म बता समझा रहे हैं। शिक्षाविदों को जीवन का नया उद्देश्य मिल रहा है। 


प्रांतीय स्तर पर अग्रणी विद्यार्थियों का प्रतिभा परिष्कार शिविर 

शांतिकुंज प्रांगण में १७ से २० मई की तारीखों में राष्ट्रीय प्रावीण्य छात्र शिविर आयोजित हुआ। भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में भाग लेने वाले सभी राज्यों के ५वीं से १२वीं कक्षा वर्ग के प्रथम तीन वरीयता प्राप्त विद्यार्थियों को आमंत्रित किया गया था। ३५० विद्यार्थियों का इसमें भाग लेने के लिए शांतिकुंज पहुँचना भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की निरंतर बढ़ती लोकप्रियता का परिचय है।

अपनी संस्कृति से गहराई से जुड़े इन विद्यार्थियों के मानस परिष्कार के विविधविध उच्च स्तरीय प्रयास शांतिकुंज द्वारा किये गये। उन्हें आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी सहित शांतिकुंज के अनेक वरिष्ठ वक्ताओं ने संबोधित किया। भारत की समृद्ध संस्कृति और ज्ञान की धरोहर का दिग्दर्शन कराया। ऋषियुग्म के चितन, उनकी आकांक्षा और परिवर्तन की दिशाधारा का बोध कराया।
 
अधिकांश विद्यार्थी शांतिकुंज में धर्म-अध्यात्म के परिष्कृत स्वरूप को देखकर गद्गद थे। उन्होंने भीतर बैठे विवेकानंद के जागने जैसी अनुभूति की। समाज की सोच, दिशा और दशा बदलने के संकल्प उभरे। विद्यार्थियों ने बड़े उत्साह के साथ यहाँ की दिनचर्या निभायी, योग-यज्ञ किया, अधिकांश ने दीक्षा भी ली। वे आदरणीया जीजी का भरपूर स्नेह पाकर भावविभोर हो उठे। 

चार दिवसीय शिविर में खेल, गायन, वाद-विवाद एवं अन्यान्य प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था। विजेता विद्यार्थियों को शांतिकुंज के वरिष्ठ प्रतिनिधियों द्वारा सम्मानित भी किया गया। 




  •  आज का युवा दिग्भ्रमित है। वह फैशन, व्यसन और फास्ट फूड के चंगुल में फँसकर अपना जीवन बरबाद करता जा रहा है। वह अपने भीतर की अनंत संभावनाओं के प्रति उदासीन है।
  •  भारतीय संस्कृति योग की संस्कृति है। वह लघु को विभु, आत्मा को परमात्मा का दर्शन कराती है, अर्थात् व्यक्ति की क्षमताओं का अनंत विकास करती है। 
  •  शांतिकुंज भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा, संस्कृति मंडल, बाल संस्कार शाला जैसी योजनाओं से विद्यार्थियों को उसी महान संस्कृति के दर्शन करा रहा है, उसे अपनाकर मानव जीवन को सार्थक बनाने का संदेश दे रहा है। परम पूज्य गुरुदेव के साहित्य में, उनके द्वारा विकसित वैज्ञानिक अध्यात्मवाद में जन-जन का मार्गदर्शन करने की अनंत सामर्थ्य विद्यमान है। 
  •  देव संस्कृति विश्वविद्यालय परम पूज्य गुरुदेव के संकल्प का वह मूर्तमान स्वरूप है, जहाँ के विद्यार्थी उदात्त चिंतन, उत्कृष्ट जीवन से समाज को प्रभावित कर रहे हैं। वे अपने नैतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय कर्त्तव्यों का पालन करते हुए गौरव बोध कर रहे हैं। जिनमें आत्मिक उत्कर्ष की, अपने समाज और संस्कृति के लिए कुछ करने की चाह है, उन्हें देव संस्कृति विवि. के साथ जुड़ना चाहिए। 
-आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी, 
कुलाधिपति, देव संस्कृति विवि. 


आत्मबल और चरित्र जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा हैं। प्राचीन शिक्षा प्रणाली में इन्हीं को सबसे ज्यादा महत्त्व दिया गया, इसीलिए हमारी संस्कृति महान है, अक्षुण्ण है, विश्वव्यापी है। आत्मबल सम्पन्न और चरित्रवान व्यक्ति हर स्थिति में खुश रहता है। चरित्र विहीन व्यक्ति भय, आशंका, तनाव, क्रोध, लोभ, व्यसनों के भँवर में फँसता और दुःखी होता है। आज चरित्र निर्माण की परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। 
आद.  श्री गौरीशंकर शर्मा, 
व्यस्थपक, शांतिकुंज

  •  इस शिविर में बच्चों को शिक्षा और विद्या का अंतर समझाते हुए मोटे पैकेज पाने की आकांक्षा की बजाय लक्ष्मीबाई, सिस्टर निवेदिता, सुभाष, भगत सिंह, तिलक, गोखले, गाँधी, विवेकानंद, पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जैसे महापुरुषों का अनुसरण करते हुए महान उद्देश्यों के लिए जीने की प्रेरणा दी गयी। 
  •  संस्कृति मंडल, बाल संस्कार शालाओं को महत्त्व देते हुए अपनी वाणी, व्यवहार से साथी विद्यार्थियों के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करने की प्रेरणा दी गयी। 
  •  विद्यालय का वातावरण सुधारने की पहल करने के उपाय बताये गये। 
  •  समाज को बदलने के लिए सद्ज्ञान वितरण, नशा निवारण, वृक्षारोपण, आदर्श ग्राम विकास जैसी रचनात्मक योजनाओं में प्रत्यक्ष भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। 

  • पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली के प्रांतीय पुरस्कार भी इसी शिविर में वितरित किये गये। पाँच और राज्यों ने भी अपने राज्य के वरीयता प्राप्त विद्यार्थियों को शांतिकुंज प्रतिनिधियों द्वारा सम्मानित कराया।




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