अतिथियों ने मिले सम्मान को अपने सद्गुरु पूज्य आचार्यश्री को किया समर्पित

गुरु पूर्णिमा के पूर्व संध्या पर गायत्री तीर्थ शांतिकुंज के मुख्य सभागार में आयोजित एक समारोह में अपनी लेखनी से समाज को नई दिशा देने वाले साहित्यकारों, कवियों को सम्मानित किया गया। इस दौरान उन्हें शॉल, प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न भेंट किये। 


समारोह में अध्यक्ष की आसंदी से देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ प्रणव पण्ड्या ने कहा कि सही अर्थों में आज ज्ञान का सम्मान हुआ है। यह सम्मान एक तरह से गुरुज्ञान का सम्मान है, इसमें उनका सम्मान किया गया है जो आज सच्चे शिष्य बनकर साहित्य के माध्यम से दूसरे के जीवन को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। डॉ. पण्ड्या ने कवियों को सम्मानित करते हुए उनके स्वस्थ जीवन की मंगलकामना की। सम्मान समारोह के दौरान इन कवियों के गीतों के स्वर पूरे मंच में गुंजायमान हो रहे थे। 
 
व्यवस्थापक श्री गौरीशंकर शर्मा ने कहा कि मिल- जुलकर कार्य करने से ही प्रगति होती है। शांतिकुंज मनीषी श्री वीरेश्वर उपाध्याय ने कहा कि ज्ञान की श्रेष्ठता के सम्मान की परंपरा का निर्वहन करते हुए इन कवियों को सम्मानित किया गया। युवा अभिनंदनीय व्यक्तियों से ही सीखते हुए आगे बढ़ते हैं। इस दौरान उन्होंने युग निर्माण मिशन के हिन्दी साहित्य के अंग्रेजी अनुवादक -फ् वर्षीय पूर्व न्यायाधीश श्री सत्यनारायण पण्ड्या के अतुलनीय योगदान को भी याद किया।
मप्र की स्व. माया वर्मा को मिले सम्मान को उनकी सुपुत्री डॉ श्रद्धा सक्सेना ने एवं अस्वस्थता के कारण उपस्थित नहीं हो पाये मप्र के कवि मंगल विजय के सम्मान को उनके पुत्र आनंद विजय ने ग्रहण किया। वहीं लेखनी के धनियों में- मप्र के लाखनसिंह भदौरिया, राजस्थान के प्रो. आर.पी. खरे, उप्र के चैतराम रहबर एवं शचीन्द्र भटनागर को उनकी कविताओं एवं साहित्य क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए सम्मानित किये गये। मिले सम्मान को अतिथियों ने अपने सद्गुरु- आराध्यदेव पूज्य आचार्यश्री को समर्पित करते हुए कहा कि यह उनकी ही कृपा का फल है। इस अवसर पर गुरु पर्व मनाने आये हजारों स्वयंसेवी कार्यकर्ता, शांतिकुंजवासी, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के वैज्ञानिक- डॉक्टर्सदेसंविवि परिवार उपस्थित थे।

इससे पूर्व देश के कोने- कोने से आये गायत्री परिवार के साधकों ने प्रभातफेरी निकालकर गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा भावना प्रकट की। रैली शांतिकुंज से प्रारंभ होकर हरिपुर कला, देसंविवि परिसर होते हुए ऋषियुग्म के पावन समाधि स्थल पहुंची एवं वहाँ सद्गुरु पूज्य आचार्यश्री के सूत्रों को अपने व्यावहारिक जीवन में उतारने के लिए संकल्पित हुए।




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