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गुरु-भगवान के विशेष अनुदान पाने हैं, तो व्यक्तित्व में ब्राह्मण-संत के गुण जगाने हैं


वे कृपालु हैं, लेकिन?
गुरु-भगवान स्वभावतः कृपालु हैं। उन्हें जन-जन का हित साधने में अच्छा लगता है। उनका भंडार भी अक्षय है। देते रहने से उसमें कमी नहीं आती, इसलिए भी उन्हें कभी हाथ सिकोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन फिर भी उनकी कृपा का सामान्य-सा लाभ ही शिष्यों, भक्तों को मिल पाता है, विशेष लाभ तो विरले ही पाते हंै। ऐसा क्यों? इसे उदाहरण से समझें।

माता-पिता अपने सभी बच्चों से प्यार करते हैं। उनका हित साधने के लिए उनका हृदय उमड़ता रहता है। उनके पास साधनों की कभी भी न हो, फिर भी क्या वे सभी बच्चों को समान मात्रा में पोषक पदार्थ खिला सकते हैं? नहीं। खिलाने का उनका मन होता है, फिर भी बच्चों की पाचन क्षमता के अनुसार ही उसे पोषक आहार दे पाते हैं। वे जानते हैं कि यदि बच्चे का पाचन ठीक नहीं और वे अपनी उदारता दिखाने के लिए उसे अधिक मात्रा में पोषक पदार्थ खिला दें तो अपना आहार तो बेकार जायेगा ही, बालक को भी नुकसान हो जायेगा। इसलिए वे सभी बच्चों का पालन अपनी करुणा के नाते कर सकते हंै,  किन्तु विशेष विकास के लिए तो बच्चों को भी श्रमशील और अनुशासनप्रिय बनकर भागीदार बनना पड़ता है। इसी प्रकार गुुरु-भगवान हर मनुष्य के लिए निर्वाह की सुविधाएँ तो अपनी कृपा-करुणा के नाते दे देते हैं, किन्तु विशेष विकास के लिए तो शिष्यों-भक्तों को भी साधना-पुरुषार्थ करना पड़ता है।

प्रशिक्षक अपने सभी छात्रों को समान रूप से प्रशिक्षण देते हैं। लेकिन विशेष स्तर वे ही पा पाते हैं, जो उनकी आज्ञा के अनुसार ही अपनी इच्छाओं और गतिविधियों को रूप दे पाते हंै। यदि उनके अनुभवों का विशेष लाभ प्राप्त करना है तो अपनी सोच और प्रयासों को उन्हीं के अनुसार ढालना-गढ़ना पड़ता है। यह प्रयत्न हर साधक को स्वयं ही करने पड़ते हैं। जो निष्ठापूर्वक प्रयास करते हंै, वे ही विशेष लाभ प्राप्त कर पाते हैं। इसीलिए पूज्य गुरुदेव अक्सर साधकों से कहते रहे कि ‘‘हमने तो तुम पर कृपा कर दी है, अब तुम स्वयं अपने ऊपर थोड़ी कृपा कर दो तो बात बन जाये।’’

वे तो तैयार हैं, किन्तु हम?
युगऋषि ने तो इस दिशा में कुछ आगे ही किया और दिया है। अन्य गुुरुजन अपने प्रियजनों को अपना शिष्य-पुत्र स्तर का बनाने की कामना व्यक्त करते हंै और उसके लिए कठोर साधनाओं का विधान बताते हैं। युगऋषि ने तो अपने प्रियजनों को अपने अंग-अवयव के रूप में विकसित करने की कामना की है तथा उसके लिए सहज-सुलभ मार्ग भी सुझाये हैं। नमूना के लिए -

‘‘हमारी एक ही महत्त्वाकांक्षा है कि हम सहस्रों भुजा वाले सहस्रशीर्ष पुरूष बनना चाहते हैं। तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ। यह हमारी मन की बात है। हमने  अपने मन की बात तुम से कह दी, अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो। पति-पत्नि की तरह गुरु-शिष्य की आत्मा में भी परस्पर ब्याह होता है, समर्पण होता है। समर्पण का अर्थ है दोनों का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना। ... जिसका अहं जिन्दा है, वह वैश्या है। जिसका अहं मिट गया वह पवित्रता है। देखना है हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क  बनने के लिए तुम अपने अहं को कितना गला पाते हो? इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। निरहंकारी का प्रथम चिन्ह है वाणी में मिठास।... अपनी विनम्रता, दूसरों का सम्मान और बोलने में मिठास, यही व्यक्तित्व के प्रमुख हथियार हैं। इनका सही उपयोग करोगे तो व्यक्तित्व वज़नदार बनेगा। (वाङ् -६८, १.१४)

गुरु के प्रति समर्पण की बात तो लगभग सभी करते हैं। किन्तु सौपते क्या हैं? अपनी कठिनाइयाँ, परेशानियाँ, तकलीफें उन्हें सौपते हैं और कामनाएँ, महत्वाकाक्षांएँ, आदतें सब अपने अनुसार ही रखना चाहते हैं। अपना ‘अहं’ तो अनगढ़ ही बना रहता है। उनके अंग बनना है तो अपने अनगढ़ अहं को गलाकर उसे गुरु के अनुरूप बनाने की साधना करनी पड़ती है।

हाथ, पैर, आँख, कान आदि के कार्य भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, किन्तु उन सब में एक समानता होती है। सभी अंग देहधारी की वेदनाओं, उमंगों आदि को सीधे अनुभव करते हैं। उनकी सामर्थ्य अलग-अलग स्तर की हो सकती है, किन्तु वे सभी अपनी पूरी सामर्थ्य एक ही दिशा में सहज ही लगा पाते हैं। उनके इसी समर्पण के नाते वे देहधारी के अभिन्न अंग कहलाने का श्रेय-सौभाग्य पाते हैं। गुरुदेव हम सभी को अपने अभिन्न अंग बनने का श्रेय-सौभाग्य देना चाहते हैं। इसीलिए उक्त वाक्य में उन्होंने अपने मनोभाव व्यक्त करते हुए कहा है कि ‘‘देखना है कि इसके लिए तुम अपने अहं को कितना गला पाते हो?’’

यह समर्पण साधना उनके जीवन में फलित हुई है, यह हम सब जानते हैं। उन्होंने स्वयं के अहं को पूरी तरह गला दिया तो वे अपने  मार्गदर्शक गुरु-प्रभु के साथ एकरूप हो गये। जो कुछ उनके साथ घटित हुआ, वह सब हमारे लिए भी संभव है। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है-

हमने जो समर्पण किया, उसके बदले में हमारी मार्गदर्शक सत्ता ने स्वयं को हमें सौंप दिया। हमारे अन्दर प्रभावोत्पादकता भर दी- वाणी में, लेखनी में, व्यक्तित्व में दैनन्दिन आचरण में। यही तुम्हारे अन्दर भी आ जाये। उन्होंने हमारे साथ कोई पक्षपात थोड़े ही किया है! तुम्हें भी वह सब क्यों नहीं मिल सकता जो हमें मिला है। बस कसौटी है अहं को गलाना, विसर्जन, समर्पण।(१.१४)

हम यदि अपने कार्यों और उनकी सफलताओं, उपलब्धियों की समीक्षा करें तो यह पायेंगे कि हम जब-जब जितने अंशों में अपने अहं को गला पाते हैं, तब-तब उतने ही अंशों में हमें उनकी शक्ति-सामर्थ्य के माध्यम बनने का सौभाग्य मिल जाता है। हममें से बहुतों को विभिन्न प्रसंगों में इस तथ्य का अनुभव हुआ है। यदि हम अपना अभ्यास बढ़ाते रहेंगे तो उनकी शक्ति सामर्थ्य के श्रेष्ठतर माध्यम बनने का सुख-सौभाग्य, संतोष हमें मिलता रहेगा।

बनें और बनायें
गुरुदेव ने अपने प्रियजनों, परिजनों से यह चाहा है कि वे अच्छे दिखने-दिखाने की जगह अच्छे बनने -बनाने की साधना अपनाएँ। बेहतर बनने वाले ही बेहतर कर पाते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने सबसे दो अपेक्षाएँ की हैं - १. अपने अंदर ब्राह्मण और संत के गुण को क्रमशः विकसित करें। २. स्वयं को साँचे जैसा बनाएँ, जो अपने संपर्क में आने वालों को श्रेष्ठ प्रामाणिक स्वरूप प्रदान कर देता है।

ब्राह्मण-साधु :- उन्होंने स्वयं को सच्चे अर्थों में ब्राह्मण और साधु बनाने की साधना ही। उनके अनुसार ब्राह्मण और साधु कोई वर्ग विशेष नहीं, वृत्ति विशेष वाले होते हैं। ब्राह्मण वह जो ईश्वर  प्रदत्त अपनी क्षमताओं को विकसित करता है, किन्तु उन्हें स्वयं के लिए खर्च नहीं करता। क्षमताओं के विकास में वह तेजस्वी, लेकिन स्वयं के लिए खर्च के मामले में अत्यंत किफायती, स्वल्प-संतोषी होता है।

साधु - वह जो संकीर्ण स्वार्थवृत्तियों के रूप में अपने जीवन के छेदों को पहचान कर उन्हें समाप्त कर देता है और संवेदना, उदार आत्मीयता के नाते अपने शक्ति-साधनों को लोकहित में लगा देता है।

वे कहते रहे हैं कि प्रत्यक्ष जगत में जो वैभव हमारे आस-पास दिखाई देता है, वह इन्हीं ब्राह्मण एवं साधुवृत्तियों की चमत्कारी देन है। अदृश्य परमात्मा और दृश्य विभूतिवानों को यह भरोसा हो गया है कि हमें जो मिलेगा, वह हीन स्वार्थों में नहीं लगेगा, श्रेष्ठ परमार्थ-प्रयोजनों में ही खर्च होगा, इसीलिए जब जितनी आवश्यकता पड़ती है तब उतने संसाधनों की पूर्ति कहीं न कहीं से हो जाती है। इसीलिए ब्राह्मण और साधु प्रवृत्तियों को जीवंत बनाये रखने के लिए वे अंत तक सचेष्ट रहे। लिखा भी है - 

हम अपने ब्राह्मण और संत को पुनः जिन्दा करेंगे। ब्राह्मण बचत करता है और संत खर्च कर देता है। ब्राह्मण संतोषी और संत दानी होता है। आदमी को दानी बनने के लिए संत बनना पड़ता है। हमने निश्चय किया है कि जिन्दगी के इन आखिरी क्षणों में अपने ब्राह्मण और संत को साध कर सबके लिए एक मिसाल पेश कर दें।  (१.११) 
उन्होंने स्वयं अपने जीवन की सार्थकता के लिए जो किया, वही आशा-अपेक्षा हम सबसे भी करते रहे हैं। लिखा है-

आप अपने ब्राह्मणत्व को जगा दीजिए, साधु को जगा दीजिए, ताकि आप अपनी नाव स्वयं पार कर सकें। ब्राह्मण बचाता है, संत दान करता है। आपके पास धन नहीं तो अपनी भावना, सद्विचारणा, श्रद्धा को तो समाज में बिखेर ही सकते हैं। वही बिखेरिए, संत बनकर अपना परिचय दीजिए। (वाङ् -६८, १.१३)

उन्हें अपना मानने वाले हर परिजन को अपनी जीवन साधना को इसी अनुसार स्वरूप देना चाहिए।

साँचा (डाई) बनें : युग परिवर्तन का नारा है ‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’। बदलाव की लहर को वेगवान बनाना है तो स्वयं श्रेष्ठ बनने के साथ सम्पर्क में आने वालों को भी श्रेष्ठ बनाने की क्षमता विकसित करनी होगी। उन्होंने लिखा है-

आजकल कर्मचारी (लेबर) सबके पास हैं, पर समर्पित कार्यकर्त्ता, जो स्वयं साँचा बनते हैं और अपने जैसा कई को बना देते हैं, वे नहीं दिखते। हमारी ख्वाहिश है कि हम अपने पीछे ऐसे ही कार्यकर्त्ता छोड़कर जायें जो साँचा (डाई) का काम करें। रॉ मटेरियल तो ढेरों कहीं भी मिल सकता है, पर ‘डाई’ कहीं-कहीं ही मिल पाती है। श्रेष्ठ कार्यकर्त्ता श्रेष्ठतम ‘डाई’ बनता है। तुम सबसे अपेक्षा है कि अपने गुरु की तरह एक श्रेष्ठ साँचा बनोगे। (वाङ्-६८, १.१५)

साँचे की विशेषता यह होती है कि वह साँचा, अर्थात् सच्चा होता है, दिखावटी-अप्रामाणिक नहीं। साथ ही वह दबाव झेलकर भी स्वयं प्रामाणिक तो रहता ही है, सम्पर्क में आने वाले पदार्थ को भी अपने अनुसार गढ़ देता है। आज समाज में कच्चे माल की तरह प्रतिभाशाली, पुरुषार्थी तो बहुत हैं, किंतु उन्हें परिष्कृत रूप देने में समर्थ साँचे जैसी परिष्कृत प्रतिभाओं की जरूरत है। पूज्य गुरुदेव उसी आवश्यकता की पूर्ति की उम्मीद हम सबसे लगाये हैं। 

श्रावणी की तैयारी
गुरुपूर्णिमा पर्व से गुरुसत्ता के अनुरूप बनने-विकसित होने की जो प्रेरणा-उमंग उभरी है, उसे श्रावणी पर्व पर सार्थक बनाने का एक अलभ्य अवसर सामने है। उसके कर्मकाण्ड जीवन में ब्र्राह्मण-साधु जैसी प्रवृत्तियों को विकसित करने और स्वयं को साँचे जैसा प्रभावशाली बनाने के सूत्रों को ही उभारते हैं। 

श्रावणी पर्व - परमात्मा के ‘एकोऽहं बहुस्याम’ संकल्प का प्रतीक दिवस माना गया है। सत्, चित्, आनंदरूप परमात्मा की सृष्टि भी सत्यं, शिवं और सुंदरम है। उसे वैसा बनाये रखने के लिए ईश्वरनिष्ठ साधक नैष्ठिक प्रयास करते रहते हैं। यह संसार जड़-चेतन, गुण-दोषमय है। काल-प्रभाव से जड़ता और दोष अपना प्रभाव बढ़ाने लगते हैं तो संकल्पपूर्वक चेतन और गुण को पुष्ट-प्रभावीरूप देना पड़ता है। 

श्रावणी पर्व पर यही किया जाता है। दस स्नान और हेमाद्रि संकल्प द्वारा जीवन में घुस पड़े स्थूल और सूक्ष्म विकारों को दूर किया जाता है। इस धुलाई के बाद जीवन को श्रेष्ठ वृत्तियों से विभूषित करने के लिए रंगाई जैसे पुरुषार्थ किये जाते हैं। 

शिखा सिंचन - जीवन को श्रेष्ठ विचारों, भावनाओं से ओतप्रोत रखने के उच्च स्तरीय, चोटी के साधक बनने के संकल्प को उभारता है। यह सद्बुद्धि-सद्भाव प्रदायिनी गायत्री का ही व्यावहारिक रूप होता है। 

यज्ञोपवीत नवीनीकरण - यज्ञोपवीत अर्थात् यज्ञीय अनुशासन में अपने प्रयास और पुरुषार्थ को बाँध कर रखने का पुनः संकल्प होता है। यदि कभी परिस्थितियों या हीन मनःस्थिति के कारण उसमें व्यतिरेक हुआ हो, तो उसे पुनः नयी स्फूर्ति के साथ अपनाने का संकल्प लिया जाता है। समीक्षा करनी चाहिए कि गायत्री के तत्त्वदर्शन की गहराई हमारे जीवन में कैसे बढ़े?

ऋषिपूजन - उनके अनुरूप जीवन बनाने का प्रतीक कर्म है। ब्राह्मण एवं संत प्रवृत्तियों के अभ्यास से ही ऋषित्व की प्राप्ति संभव होती है। स्वयं प्रामाणिक बनने तथा प्रामाणिक बनाने की साधना ही ऋषिचर्या होती है। विचार और प्रयास करने चाहिए कि जीवन यज्ञमय कैसे हो?

इसी प्रकार हरीतिमा संवर्धन, रक्षाबंधन जैसे क्रियाकलाप प्रकृति और संस्कृति को स्वस्थ रखने के अनुबंध रूप होते हैं। यदि विचार किया जाये तो गुरुसत्ता के द्वारा दिये गये निर्देशों को घोषणापूर्वक अमल में लाने का पवित्र उद्देश्य श्रावणी पर्व के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। 

युगऋषि से जुड़े प्रत्येक साधक को संकल्पबद्ध होकर यह प्रयास करना चाहिए कि गुरुसत्ता के निर्देशों के अनुसार श्रेष्ठ व्यक्तित्व गढ़ने, तद्नुसार बनने-बनाने के क्रम को तेजस्वी और प्रामाणिक बनाया जाय। श्रावणी पर्व तक अपने और अपने सहयोगियों के लिए कुछ सुनिश्चित लक्ष्य निर्धारित कर लिए जायें। श्रावणी पर आत्म परिष्कार के सार्थक प्रयोग के साथ निर्धारित लक्ष्यों को निर्धारित अवधि में पूरा करने के संकल्प लिये जायें और नयी ऊर्जा, नयी उमंग के साथ हम उस दिशा में लग जायें। पर्व सार्थक हो जाये और हम धन्य हो जायें। 



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