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  • स्व. डॉ. एम. श्रीरामकृष्ण गायत्री के सिद्ध साधक थे। दक्षिण भारत में गायत्री चेतना के विस्तार का अभियान आरंभ करने वालों में उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। 

दक्षिण भारत में युगशक्ति गायत्री के प्रति जन-जन के मन में आस्था जगाने वाले परम पूज्य गुरुदेव के अनन्य शिष्य डॉ. मरेल्ला श्रीरामकृष्ण दिनांक ३० जून २०१४ को स्थूल देह त्यागकर अपने आराध्य की सूक्ष्म चेतना में विलीन हो गये। गायत्री परिवार द्वारा गुरुपूर्णिमा के दिन आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में हजारों परिजनों ने उपस्थित होकर उन्हें अपनी भावभरी श्रद्धांजलि अर्पित की। 

स्व. डॉ. एम. श्रीरामकृष्ण गायत्री के सिद्ध साधक थे। अथाह गुरुनिष्ठा और जीवन साधना के बल पर वे लाखों लोगों के श्रद्धास्पद थे। उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव की कई पुस्तकों का अनुवाद कर  उनके विचारों को तेलुगुभाषियों तक पहुँचाया। दक्षिण भारत में गायत्री चेतना के विस्तार का अभियान आरंभ करने वालों में स्व. डॉ. एम. रामकृष्ण जी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है।


स्व. डॉ. मरेल्ला श्रीरामकृष्ण का संक्षिप्त जीवन परिचय

१४ अक्टूबर १९४८ को आँध्र प्रदेश में कृष्णा जिले के मछलीपट्टनम में जन्मे डॉ. एम. श्रीरामकृष्ण ने बनारस हिंदू विवि. से रसायन शास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 
डॉ. श्रीरामकृष्ण को आध्यात्मिक जीवन के संस्कार अपने दादाजी से बचपन में ही मिले थे। बनारस में बिताया उनका हर दिन सद्गुरु की खोज में बीता। वहाँ ३३ प्रतिष्ठित गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त करने के बाद मथुरा में परम पूज्य गुरुदेव के विदाई समारोह में जब उनकी पहली मुलाकात गुरुदेव से हुई तो उसी समय उन्हें आभास हो गया कि उनकी खोज पूरी हो गयी है। उन्होंने गुरुदेव से दीक्षा ली और फिर गुरुदेव से सतत मार्गदर्शन लेते हुए उन्हीं की प्रेरणा से गुंटूर में रहकर जीवनभर दक्षिण भारत में युगशक्ति गायत्री का प्रचार-प्रसार किया। 

डॉ. श्रीरामकृष्ण जी ने लाखों लोगों को जाति, धर्म, पंथ, भाषा, नर-नारी के भेद से उठाकर गायत्री साधना और यज्ञ के लिए प्रेरित किया। अपने क्षेत्र में हजारों प्रज्ञा मंडल और कई आश्रमों की स्थापना करायी। परिव्राजकों के प्रशिक्षण के लिए शताधिक ‘अनुग्रह पीठ’ स्थापित कराये। 

वैज्ञानिक पृष्ठभूमि होने के कारण वे वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का विस्तार बड़ी कुशलता के साथ करते रहे। सैकड़ों सेमीनार, प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन किया। पंचकोश जागरण आदि साधनाओं के माध्यम से गायत्री महाविज्ञान समझाया। पिछले ४० वर्षों में एक लाख से ज्यादा सार्वजनिक यज्ञों का आयोजन उनकी प्रेरणा से हुआ। उनके द्वारा अनुवादित परम पूज्य गुरुदेव की पुस्तकों ने दक्षिण में गायत्री चेतना के विस्तार में बहुमूल्य योगदान दिया है। डॉ. श्रीरामकृष्ण जी ने भी कई पुस्तकों का लेखन किया है। 




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