सुप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग त्र्यंबकेश्वरतीर्थ में आयोजित हुआ साधना शिविर

नाशिक (महाराष्ट्र)
युग परिवर्तन के दो आधार है-चरित्र और संवेदना। जैसे-जैसे साधक का आत्मबल बढ़ता जाता है, उसी अनुपात में उसमें सत्कार्यों के लिए साहस उभरता  जाता है। उसकी संवेदना जागती है तो सेवाभाव बढ़ता है। अतः जिनमें महाकाल के सहचर बनने के अखण्ड सौभाग्य का लाभ उठाने की हूक है, जो अपनी साधना की सफलता चाहते हैं, उन्हें चरित्र विकास पर पूरा-पूरा ध्यान देना चाहिए। घर-परिवार की सुख-शांति का आधार यही है। परम पूज्य गुरुदेव का ‘मानव में देवत्व के उदय’ और ‘धरती पर स्वर्ग के अवतरण’ का उद्घोष इसके बिना पूरा नहीं हो सकता। 

ये विचार शांतिकुंज के वरिष्ठ प्रतिनिधि आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी ने कुंभ नगरी श्रीक्षेत्र त्र्यंबकेश्वर में आयोजित साधना शिविर को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। ४ से ८ जून की तारीखों में यह शिविर आयोजित हुआ, जिसका जलगाँव, नाशिक, धुले और नंदुरबार जिलों के ३९१ साधकों ने लाभ लिया। शांतिकुंज से श्री शरद पारधी, श्री अरुण खंडेलवाल, श्री अशोक ढोके और श्री विनायक जी शिविर संचालन के लिए त्र्यंबकेश्वर पहुँचे थे। 

यह पूरी तरह से मौन शिविर था। साधकों को साधनात्मक मनोभूमि के बीच आत्मचिंतन-आत्ममंथन करने का दुर्लभ सुयोग मिला। आदरणीय श्री उपाध्याय जी ने इस शिविर में शरीर के पंचकोशों की महत्ता और उनके जागरण से देवत्व के उदय के संबंध में विस्तार से चर्चा की। सद्गुरुदेव के सामीप्य के सौभाग्य का लाभ उठाने की प्रभावशाली प्रेरणाएँ उभरीं। 

पाँचों दिन की दिनचर्या साधना, स्वाध्याय, चिंतन-मनन से ओतप्रोत थी। प्रतिदिन २४ कुण्डीय गायत्री यज्ञ हुआ। शिविर की सफलता में सर्वश्री अमृतभाई पटेल, नवनीतभाई, जयंती भाई, त्रिभुवन भाई और रामावत परिवार ने प्रमुख योगदान दिया। 

मन मिले, हृदय खिले

  • भावी सक्रियता का अवरोध समाप्त हुआ
बेण्डल, हुगली (प.बंगाल)
गायत्री आश्रम बेण्डेल में १२ से १६ जून की तारीखों में पाँच दिवसीय पंच कोशीय साधना शिविर आयोजित हुआ। पूरे पश्चिम बंगाल की कई शाखाओं के वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने भी इसमें भाग लिया। यह शिविर में साधना का उद्देश्य और स्वरूप जानने का ही सत्परिणाम था कि जो कार्यकर्त्ता विभिन्न मुद्दों पर मतभेद रखते थे, वे साधना से आत्म परिष्कार की आवश्यकता अनुभव करने में एकमत थे। पाँच दिन की साधना और प्रशिक्षक श्री लालबिहारी सिंह के विचारों के परिणाम स्वरूप उनमें मतभेदों वाले बिंदुओं पर भी सहमति बनती दिखाई दी। 

दूसरी ओर बंगलाभाषी शिविरार्थियों में इस शिविर ने साधना के प्रति अनूठी उमंग जगायी। धर्म के प्रति लोगों की अवधारणा बदलती दिखाई दी। ५० से अधिक शिविरार्थी इस साधना शिविर में बड़े उत्साह के साथ शामिल हुए। 


ग्रामीण अंचल में समूह साधना का अभिनव प्रयोग

मंदसौर (मध्य प्रदेश)
तहसील मंदसौर के ग्रामीण अंचलों में असुरता के उन्मूलन और सतयुगी रामराज्य की स्थापना के लिए समूह साधना का सुंदर क्रम चल पड़ा है। समर्पित परिव्राजक श्री रामशरण ब्रह्मचारी वहाँ के गाँव-गाँव में गोष्ठियों के माध्यम से रामचरित मानस की सरस चौपाईयाँ प्रस्तुत करते हुए आवश्यक वातावरण बना रहे हैं। 

गोष्ठियों में गाँववासियों को श्री ब्रह्मचारी जी ने बताया कि समस्याएँ हर युग में आयी हैं और उनके समाधान के लिए सामूहिक साधना-प्रार्थनाओं का ही सहारा लेना पड़ा है। रावण राज्य में आम जनता के साथ ऋषि-मुनि संकट में थे। सभी मिलकर पहले ब्रह्माजी के पास गये, प्रार्थना की। उनके कहने पर शिवजी के पास पहुँचे, शिवजी ने उन्हें मार्ग दिखाया। आज भी समस्याओं का अंबार है। इनका समाधान सामूहिक प्रयासों से ही होगा। हम सबको मिलकर देवताओं से प्रार्थना करनी होगी। समूह साधना से निश्चय ही संकट के बादल छटेंगे, स्वर्णिम प्रकाश के दर्शन होंगे। 

अभियान के आरंभिक चरणों में समाचार भेजे जाने तक अमलावद, दलौदा सागरा, ऐलची, रींछालालमुहा, आक्या उमाहेड़ा में गोष्ठियों और समूह साधना का क्रम आरंभ हो चुका था। अमलावद के श्री राधेश्याम शर्मा के अनुसार वहाँ गायत्री मंत्र जप, चालीसा पाठ, सामूहिक अनुष्ठान जैसे प्रयोगों के साथ स्थानीय आस्था के अनुरूप हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा पाठ के साथ परमात्मा से सद्बुद्धि माँगने की प्रार्थनाएँ करायी जा रही हैं। 




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