• गुरुपर्व पर ज्ञान का सम्मान 
  • २० हजार साधक-सृजेताओं ने युगधर्म निभाने की प्रतिबद्धता दोहराई
युगतीर्थ-शांतिकुंज अपने स्थापना काल से ही नवयुग के मत्स्यावतार का साक्षी रहा है। यह क्रम आज भी अनवरत जारी है। महाकाल के सहयोगी बनकर युग निर्माण आन्दोलन को गति देने का उत्साह निरंतर बढ़ रहा है। प्रस्तुत गुरुपूर्णिमा पर्व पर अपनी पावन गुरुसत्ता को श्रद्धांजलि अर्पित करने लगभग 20,000 लोग शांतिकुंज पहुँचे। सुबह से शाम तक पूरा परिसर खचाखच भरा नजर आया। 

गुरुपूर्णिमा पर्व तीन दिवसीय कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न हुआ। 10 जुलाई से ही जीवन में सद्गुरु की आवश्यकता, गुरुदेव-माताजी की महानता, उनके अनुदान-आश्वासन और आकांक्षाओं से अवगत कराने का क्रम चल पड़ा। ज्ञान के सम्मान के लिए विशेष कार्यक्रम जुड़े। बच्चों की काव्य प्रतियोगिता और युग साहित्य सृजेताओं का सम्मान किया गया। पूर्व दिवस पर विशाल जनजागरण रैली निकाली गयी। पर्व के दिन महाकाल ने भी भीषण गर्मी के बीच बदली कर उन्हें शीतलता पहुँचाते हुए अपने संरक्षण-अनुदानों का चिर आश्वासन दोहराया। 

गुरुपर्व की विशेषता और महत्ता को देखते हुए लगभग 2500 लोगों ने दीक्षा संस्कार कराये। अन्यान्य संस्कार भी कई-कई पारियों में हुए। यज्ञ, भोजन, गुरुस्मारकों के दर्शन-प्रणाम में पहली बार इतनी लम्बी-लम्बी कतारें दिखाई दीं। अखण्ड जप, दीपयज्ञ जैसे नियमित कार्यक्रमों के अतिरिक्त सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने लोगों की आस्था को परिष्कृत करने में अहम योगदान दिया। 


गुरुपर्व का संदेश

आदरणीया शैल जीजी
गुरु की सामर्थ्य और शिष्य की श्रद्धा जब मिलती है तभी चमत्कारी परिणति होती है। माटी के द्रोणाचार्य एकलव्य को अद्वितीय धनुर्धर बनाते हैं। रामकृष्ण परमहंस की काली साक्षात प्रसाद ग्रहण करने आती है। मीरा के गिरधर गोपाल विष को अमृत बना देते हैं। 

शिष्य की श्रद्धा विकसित करने के तीन उपाय है-उपासना, साधना, आराधना। उपासना अर्थात् अपनी इच्छा-आकांक्षाओं को बाँसुरी की तरह अपने इष्ट-आराध्य की इच्छाओं में विलीन कर देना। पोली बाँसुरी अपनी नहीं, अपने मालिक की इच्छा के स्वर निकालती है। 

अपनी कमियों को दूर करने का नाम साधना है। अपनी मान्यताओं, आस्थाओं, विचारों और विश्वास को ऊँचा उठाने का नाम साधना है। जल में कोई वाहन ६०-७० कि.मी. की रफ्तार से चलता है। उससे ऊपर जमीन पर ३००-४०० कि.मी. की रफ्तार से। जब उससे ऊपर उठते हैं तो आकाश में ढाई-तीन हजार किलोमीटर की रफ्तार होती है। 
जिस समाज में हम रहते हैं उसके विकास के लिए अपना श्रम, समय, ज्ञान, अपनी शक्ति, प्रतिभा समर्पित करने का नाम आराधना है। 


आदरणीय डॉ. प्रणव जी
साक्षात् भगवान हमारे गुरु बनकर आये थे। वे कहते थे-मैं भगवान महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया को गतिशीलन करने के लिए निमित्त बनकर आया हूँ, तुम भी मेरे निमित्त बन जाओ। 

हम अपने स्वरूप को भूल गये हैं। मोह ने हमें भ्रमित कर दिया है। जिस दिन अर्जुन की तरह हमें स्मृति प्राप्त हो जायेगी कि हम कौन हैं, क्या हैं, कितने बड़े गुरु के शिष्य हैं और परिवार-रिश्तेदार से, सुख-सुविधाओं से मोह नष्ट हो जायेगा उस दिन हम न जाने क्या से क्या करके दिखा देंगे। 

गुरुदेव कहते थे कि विषाक्तता को नष्ट करने के लिए हमने इंजेक्शन में दवा भर दी है। आप केवल सूई बन जाइये। इस गुरुपूर्णिमा पर्व पर हम सूई की तरह विषाक्तता निवारण के लिए उनके विचारों को फैलाने का निश्चय कर लें तो यह इस गुरुपूर्णिमा पर्व की सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है। 

अगले दिनों हमें करना है
  • १. आसपास के परिकर के लिए ः ग्रामीण परिसर को सुंदर बनाने के प्रयास हमें ही करने होंगे। हर जिले में कम से कम ५-६ गाँव को गोद लेकर उन्हें ग्राम प्रधान भारत के आदर्श के रूप में विकसित करना है, जिसे देखकर सरकार ऋषि और कृषि पर आधारित ग्रामीण प्रधान भारत के निर्माण के लिए प्रेरित और सक्रिय हो। 
  • २. जल के लिए ः सरकार ने ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम दिया है। उसका रचनात्मक सदुपयोग हो ऐसे प्रयास हमारे होने चाहिए। गंगा ही नही, भारत की हर नदी का हर तट साफ होना चाहिए। इसके लिए गायत्री परिवार के १० लाख कार्यकर्त्ता अपनी शक्ति लगा देंगे। पहला प्रयास हमारा होगा-हम गंगा को गंदा नहीं करेंगे। 
  • ३. वातावरण - गायत्रीमय बनाना होगा। सामूहिक साधना से साधनात्मक वातावरण बनाना होगा। अयोध्यावासियों ने राम के आह्वान पर असुरता के निवारण के लिए १४ वर्ष तक साधना की थी। सुख और भोगों का त्यागकर दुर्बुद्धि के विनाश के लिए हम अपनी साधना को प्रखर बनायें। 


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