गुरुपूर्णिमा की पूर्व वेला, ११ जुलाई की प्रातःकालीन सत्संग सभा में मिशन के लिए क्रांतिकारी गीतों की रचना करने वाले और युग साहित्य का अनुवाद करने वाले मूर्धन्य महानुभावों का ‘युग साहित्य सृजन सम्मान’ प्रदान कर सत्कार किया गया। आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी, आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी, आदरणीय श्री गौरीशंकर शर्मा जी ने उन्हें युगव्यास परम पूज्य गुरुदेव की पावन स्मृति में शॉल, स्मृति चिह्न और सम्मान पत्र प्रदान कर सम्मानित किया। 

आदरणीय डॉ. प्रणव जी ने इस अवसर पर कहा कि हम सब निमित्त मात्र हैं। वास्तव में गुरुदेव की शक्ति और साहस से ही यह रचनाएँ संभव हो सकी हैं। वस्तुतः यह ज्ञान का सम्मान है। 

आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी ने कहा कि यह व्यक्तियों का नहीं, सत्कार्यों का, सद्गुणों अभिनंदन है। जो महानुभाव मंचासीन हैं वे सभी आप्तकाम हैं। जो भगवान तक पहुँच गया, उसे सम्मान की कामना कहाँ होती है? लेकिन आम जनता अभिनंदनीय के पीछे चलती है। उस दृष्टि से यह सम्मान समारोह बहुत महत्त्वपूर्ण है। इनकी प्रेरणा से साहित्य सृजन की परंपरा आगे बढ़े इसी में सम्मान समारोह की सार्थकता है। 

आदरणीय श्री गौरीशंकर शर्मा जी ने कहा कि मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की तरह उसकी चेतना की भी भूख होती है, जो आध्यात्मिक जीवन शैली से ही पूरी होती है। चरित्र, संवेदना, त्याग आदि ही व्यक्ति की सच्ची सम्पदा है। आज सम्मानित हो रहे महानुभावों की रचनाएँ इन्हें विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।  

स्व. माया वर्मा की ओर से उनकी बेटी डॉ. श्रद्धा सक्सेना ने और वयोवृद्ध कवि श्री मंगल विजय की ओर से उनके सुपुत्र श्री आनंद विजयवर्गीय ने सम्मान ग्रहण किये। 
इस अवसर पर आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड़या जी, आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी, श्री सत्यनारायण पण्ड्या-सेवा निवृत्त न्यायमूर्ति (आदरणीय डॉ. साहब के पिताजी), श्री शंभु दास जी, सीधी निवासी युगगायक श्री शरद पाण्डेय जी की सेवाओं का स्मरण करते हुए हजारों श्रोताओं ने उनका करतल ध्वनि के साथ सम्मान किया।  


श्री मंगल विजय, ओबेदुल्लागंज, रायसेन (म.प्र.)
श्री मंगल विजय जी कालजयी कवि हैं। शाश्वत लेखन करते हैं। गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति में कोई लेख लिखा, वैसे ही उनकी उस पर कलम चल पड़ती थी। गुरुदेव का लेख कविता में बदल जाता था। लेखनी मंगल विजय जी की होती थी, विचार गुरुदेव के होते थे। इसलिए सबके सब लोकप्रिय होते चले गये, क्योंकि शक्ति गुरुदेव की ही होती थी। 

श्री लाखन सिंह भदौरिया, भोजपुरा, मैनपुरी (उ.प्र.)
श्री लाखन सिंह ‘सौमित्र’ शौर्य और वीर रस के कवि हैं। काया से दुर्बल हो गये, लेकिन मन से आज भी सशक्त। लाखन सिंह जी और मंच पर बैठे शचीन्द्र भटनागर जी ने सोहनलाल द्विवेदी, गोपाल सिंह नेपाली, रंग जी आदि के साथ मंच पर बैठकर कविताएँ पढ़ी हैं और सम्मानित हुए हैं। गुरुदेव के संपर्क में आने के बाद से वे गुरुदेव के लिए कार्य करने लगे। गुरुदेव से जुड़ने के बाद इन्हें भी लगने लगा कि अब हमारा जीवन सार्थक हो गया। 

श्री चेतराम रहबर, हिसार (हरियाणा)
हरियाणा में शिक्षा विभाग से डिप्टी डायरेक्टर के पद से सेवा निवृत्त हुए। श्रीराम वचनाऽमृत पढ़ा तो मन में उमंग उठी कि कोई गुरु होना चाहिए। तब उनकी धर्मपत्नी को ध्यान में शांतिकुंज, हरिद्वार आने की प्रेरणा मिली, जिसका कभी उन्होंने नाम भी नहीं सुना था। वे आये, गुरुदेव को शिव रूप में अनुभव किया और तभी से गुरुदेव के साहित्य के अनुवाद कार्य में जुट गये। उनका उर्दू अनुवाद बड़ा प्रभावशाली है। 

स्व. माया वर्मा, ग्वालियर (म.प्र.)
विशुद्ध गृहणी थीं। अंदर से प्रेरणा आती थी, गुरुदेव ने हाथ रख दिया तो कुछ ऐसा हो गया जैसे हैरियट स्टो ने टॉम काका की कुटिया लिख दी। दो बार छत से गिरीं।  वे उन सौभाग्यशाली लोगों में से हैं जिन्हें गुरुदेव ने अपने सामने बिठाकर लेखन सिखाये। उनके अनेक अप्रकाशित गीत शांतिकुंज में हैं। हृदय को छू लेने वाली उनकी कविताओं में भाव-संवेदनाओं का गहरा पुट दिखाई देता है। 

श्री शचीन्द्र भटनागर,  मुरादाबाद (उ.प्र.) 
परम पूज्य गुरुदेव के जीवन पर महाकाव्य ‘प्रज्ञावतार’ लिख रहे हैं, जिसका पूर्वार्द्ध खंड प्रकाशित हो चुका है। वे मिशन के अत्यंत लोकप्रिय गीतों के रचयिता हैं। समय की आवश्यकता के अनुरूप जो भी उन्हें विषय दिया गया, उन पर सदाबहार, क्रांतिकारी रचनायें कीं। इन दिनों वे शांतिकुंज में ही अपना पूरा समय दे रहे हैं। 

श्री राजेन्द्र प्रसाद खरे, पिलानी (राजस्थान)
श्री राजेन्द्र प्रसाद खरे ने २० साल पहले अंग्रेजी अनुवाद का कार्य अपने हाथ में लिया। वे बिडला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, पिलानी, राजस्थान में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर थे। कभी पूरी तरह से अंतर्मुखी थे। गुरुदेव के संपर्क में आने के बाद वे उतने ही बड़े समाजसेवी हो गये। घर-घर जाकर झोला पुस्तकालय चलाने और लोगों को युग साहित्य पढ़ाने में खूब रुचि लेते हैं। उनका अंग्रेजी अनुवाद उच्च कोटि का है। उनके सहयोग से अंग्रेजी अखण्ड ज्योति पत्रिका प्रकाशित हो रही है। 




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