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  • मिशन के लिए ही पूरी तरह से अपना जीवन समर्पित कर चुके प्राणवान परिव्राजक प्यारेलाल की मुख्य पहचान है ‘दीवार लेखन’। वे अपनी साइकिल से पूरे देश में २४००० किमी. की यात्रा करते हुए प्रतिदिन दीवार लेखन करते रहे हैं। हजारों लोगों को मिशन से जोड़ चुके हैं। पूज्य गुरुदेव की जिन प्रेरणाओं से उन्होंने लोगों को मिशन से जोड़ा है, उन्हें संकलित कर पुस्तकों के रूप में भी प्रकाशित किया है। 

गायत्री जयंती पर शांतिकुंज आये हैदराबाद के उद्योगपति श्री गोकुलचंद उपाध्याय से मिशन के प्रति उनकी आस्था पर चर्चा चल रही थी। तभी परम पूज्य गुरुदेव की चेतना से जुड़ने के सौभाग्य की सराहना करते हुए उन्होंने पास खड़े परिव्राजक प्यारेलाल की ओर इशारा किया और कहा, ‘‘हमें तो मिशन से जोड़ने वाले ये हैं।’’ इनकी प्रेरणा से ही हमें अपने जीवन को सँवारने का और गुरुदेव जैसी महान सत्ता से जुड़ने का सौभाग्य मिला।

सन् ८२ में परम पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में समर्पित हुए प्यारेलाल जी ने ऐसे न जाने कितने जीवन-दीप जलाकर उनका जीवन ही बदल दिया है। संभवतः वे एक ऐसे युग निर्माणी परिव्राजक हैं, जिनका हीरक हार हमारी गुरुसत्ता ने पहनने की इच्छे व्यक्त की थी। जीवन में गुरुसत्ता के प्रति निरंतर बढ़ते समर्पण भाव के साथ आज भी वे और दीवारों पर उनके द्वारा लिखे गये गुरुदेव के विचार लोगों के जीवन में प्रेरणा-प्रकाश भर रहे हैं।

परिव्राजक प्यारेलाल मुख्यतः अपने दीवार लेखन अभियान के लिए विख्यात हैं। सन् ८५ में युगशिल्पी सत्र करते समय उन्हें श्री हेमचरण पटेल से दीवार लेखन की प्रेरणा मिली। इसके बाद उन्होंने अपने गृह जिले रायगढ़ (छत्तीसगढ़) के १००८ गाँवों में दीवार लेखन किया। ज्ञानरथ चलाते और साइकिल से यात्रा करते हुए उन्होंने हर दिन तीन गाँवों में दीवार लेखन किया। 

दीवार लेखन का जुनून
दीवार लेखन का इतना जुनून कि इसके बाद उन्होंने साइकिल से ही यात्रा करने की ठानी। बिलासपुर से हरिद्वार, हरिद्वार से कश्मीर, हरिद्वार से कोलकाता, कन्याकुमारी जैसी विशाल यात्राएँ वे करते रहे। २४००० कि.मी. से अधिक की साइकिल यात्रा उन्होंने की है। न कोई चाह, न आशियाने की परवाह। जहाँ जगह मिली वहीं सो गये। गुड़ और चने खाकर पेट भर लिया। जनसहयोग ही एकमात्र आजीविका का स्रोत रहा, लेकिन उन्होंने कोई दिन ऐसा न जाने दिया, जिस दिन दीवार लेखन न किया हो। 
प्यारेलाल जी ने अश्वमेधों में खूब दीवार लेखन किया। प्रथम पूर्णाहुति आँवलखेड़ा, महापूर्णाहुति हरिद्वार और जन्मशताब्दी समारोह में सेवाएँ दीं। बड़े कार्यक्रमों में वे पहुँच जाते हैं और जहाँ जाते हैं, वहीं की दीवारें बोलने लगती हैं। 

मुट्ठी फंड से बनायी शक्तिपीठ
प्यारेलाल जी ने अपनी जन्मभूमि बैसपाली, जिला रायगढ़ में एक-एक मुट्ठी चावल इकट्ठा कर शक्तिपीठ का निर्माण कराया है। वे पिछले १५ वर्षों से लगातार दक्षिणी राज्यों में सेवा कर रहे हैं। संगीत, कर्मकाण्ड, प्रवचन हर विधा में निपुण हैं। कार्य कोई भी हो, लक्ष्य एक ही कि लोग परम पूज्य गुरुदेव के विचारों को अपनायें, अपना जीवन धन्य बनायें। 

माया वर्मा का ममत्व मिला
मिशन की लोकप्रिय कवयित्री स्व. माया वर्मा से मिले प्रेम को वे संजीवनी की तरह सँजोये हैं। माया जीजी ने उनके सम्मान में उनकी डायरी में एक कविता भी लिखी है, ‘‘मेरा भैया प्यारेलाल...’’, जिसे वे सदा याद करते हैं। 

साहित्य संकलन
उनकी एक और अमूल्य निधि है, उनका संकलन और प्रकाशन। आरंभ में उन्होंने १००८ सद्वाक्यों का संकलन किया, जिसे वे दीवारों पर लिखते रहे हैं। मिशन के प्रज्ञागीतों को संकलित कर प्रकाशित कराया। इसके अलावा नियमित अध्ययन में जहाँ भी गुरुदेव के चुटीले विचार मिले, वे अपनी डायरी में नोट करते गये। प्रचार-प्रसार में उपयोगी रही अपनी तमाम सामग्री को ज्ञान ज्योति प्रज्ञा निधि के नाम से उन्होंने 
५ पुस्तकों में प्रकाशित किया है। जन सहयोग से वे योग्य पात्रों को निःशुल्क वितरित कर रहे हैं और नित नये जीवन दीप जला रहे हैं। 



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