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 श्री युवराज सिंह ठाकुर अपनी धर्मपत्नी श्रीमती अंकिता सिंह (दोनों ही रायपुर के शंकराचार्य इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर के मैकेनिकल विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।) अपने पिता की अनमोल धरोहर समर्पित करने शांतिकुंज पहुँचे। वर्ष २००७ से जीवन के अंतिम समय (१५ सितम्बर २०१२) तक पिता स्व. श्री अशोक कुमार ठाकुर द्वारा लिखे गये ४,५०,००० गायत्री महामंत्रों की पुस्तकों को वे छः आकर्षक सजिल्द बड़े-बड़े ग्रंथों के रूप में लेकर वे आये थे। वे अपने पिता के तप और पुण्य की स्मृतियों को भले ही शांतिकुंज को सौंप गये हों, लेकिन गायत्री साधना के परिणाम स्वरूप परिवार में पनपती आस्था और उत्कृष्ट परंपराएँ उनके पुत्र एवं पुत्रवधु में हस्तांतरित होती दिखाई दीं। 

लोग अपने बेटे-बेटियों की खुशहाली के लिए सोना-चाँदी, रुपया-पैसा, सुख-सुविधा एकत्रित करते देखे जाते हैं, लेकिन पेशे से उच्च श्रेणी के शिक्षक अर्जुन्दा, जिला बालोद निवासी स्व. श्री अशोक कुमार ठाकुर ने कुछ और ही किया। श्रीमती अंकिता बताती हैं कि अर्जुंदा में कोई बहुत पढ़ा-लिखा या सम्पन्न परिवार नहीं है। स्व. श्री अशोक जी चाहते थे कि उनका बेटा खूब पढ़े और सुख-सौभाग्य प्राप्त करे। उसके लिए उसे संरक्षण और शक्ति मिले ऐसी कामना के साथ उन्होंने सन् २००७ में मंत्रलेखन अभियान आरंभ किया, जो अनवरत चलता रहा। 

हुआ भी ऐसा ही। पुत्र युवराज ने एम.टैक. तक की पढ़ाई की। आज उनका परिवार पूरी तरह से सुखी और हर तरह से सम्पन्न है। श्री युवराज सिंह बताते हैं कि जब से उन्होंने होश सँभाला तब से अपने पिता को नियमित उपासना करते देखा है। पिताजी ने जब मंत्रलेखन अनुष्ठान आरंभ किया तब से उन्हें ही संरक्षण और शक्ति नहीं मिली, बल्कि परिवार का वातावरण ही बदल गया। माँ श्रीमती साधना रानी की आस्था भी गायत्री के प्रति बढ़ती गयी। शांतिकुंज आकर श्री युवराज सिंह और श्रीमती अंकिता में भी गायत्री उपासना से जीवन सार्थक करने और लोकमंगल के कार्यों में अपनी आहुतियाँ समर्पित करने के संकल्प उभरे हैं। 




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