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भारतीय संस्कृति में हर चीज में उसकी गुणवत्ता को खोजने व उसका सही  उपयोग करने की अलग विशेषता है। यहाँ वह तीक्ष्ण दृष्टि है जो सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तुओं में निहित सूक्ष्मतम अंशों के दर्शन कर लेती है। यह दृष्टि इस भूमि की उर्बर ऊर्जा प्रसून कहें या यहाँ के पवित्रमना मानवों पर हुई परमेश्वर की महत्कृपा- कलिका, खुशबू से भरी रहती है। यहाँ का मन्सा वह कुशल भृंग है जो हर प्रसून से स्निग्ध मधु ग्रहण कर लेता है। वह दुध से घृत निकालकर उससे दिया जलाता, दिया से जहाँ को रौशन करता, रोशनी से सुन्दर दृश्यों का लाभ लेता है। दृश्य प्रकृति से जीवन रस प्राप्त होता है जिससे प्राणी जगत जीता भी और उत्फुल्लित भी रहता है। निसर्ग से स्वर्गीय सम्पदा सम्प्राप्ति- कौशल यहाँ का अभिनन्दनीय वैशिष्ट्य है। 

यहाँ का वैज्ञानिक मन्सा हवा में उड़ने और दूरस्थ व्यक्तियों के साथ रूबरू होने की कुशलता का परिचय भी देता है। वह जीवन चक्र को सरस सुन्दर बनाये रखने में सहायक पर्व- त्योहरों का प्रचलन भी करता और उनसे सत्प्रेरणाओं के महत अनुदान भी प्रस्तुत कर लेता है। वह बारह महीनों की  तिथियों और दिवसों के सूक्ष्म मुहूर्त्तों पर अध्ययन कर उनमें किन मुहूर्त्तों में क्या कुछ करने से क्या कुछ लाभ हो, उसकी क्रियापद्धतियों के निर्धारण भी करता है। यहाँ तक कि सामान्य वस्तुओं व तिथियों से भी असामान्य लाभकारी तथ्यों को ढूँढ़ निकालना यहाँ की अनिर्वचनीय सांस्कृतिक सुगन्ध कही जा सकती है। 

उदाहरण स्वरूप हम कोई तिथि, जैसे पंचमी पर विचार करते हैं। शब्दों की दृष्टि से यह ‘पंचम’ में ‘ई’ का योग होकर बनी एक ऐसी शब्द- व्यंजना है जो स्थान, संख्या, लिंगादि कई अर्थों को द्योतन करती है। तिथि के रूप में  पक्ष के पाँचवें स्थान में पड़ती है और चन्द्रमा की पाँचवीं कला के रूप में जानी जाती है। यह पंचम चान्द्रकला एक ऐसी शुभ तिथि के रूप में प्रस्तुत  है जो वर्षभर के प्रत्येक मास में पड़ती है और वर्ष की चौबीस सूक्ष्म चान्द्रकलावधि में से कुछ में विशेष फलदायक व्रत, पर्व, देव पूजनादि पुण्यकर्मानुष्ठानों के शुभावसर आते हैं। हालाँकि इन सभी पर सम्यक् ध्यान देना सम्भव नहीं हो पाता, फिर भी तिथियों की महत्ता के बारे में विद्वज्जन जानते हैं और श्रद्धालु जन मानते भी हैं। जैसे- माघ शुक्ल पंचमी को वसंन्त पंचमी का उत्सव मनाया जाता है, क्योंकि तब पतझड़ समाप्त होकर प्रकृति की गोद सुरम्य हरियाली से भर रही होती है। इसे श्रीपंचमी भी कहते हैं। श्री यानि सरस्वती। इस अवसर पर बड़ी ही श्रद्धा के साथ उनकी पूजा होती है। बंगाल, बिहार, ओड़िशा आदि प्रान्तों में इस पूजनोत्सव को धूमधाम के साथ मनाया जाता है। पुरी के श्रीजगन्नाथ मन्दिर में इस अवसर पर पञ्चपल्लव पूजा विधान का विशेष आयोजन होता है जिसमें श्रीजगन्नाथ, बलभद्र और शुभद्रा जी का विशेष पूजाभिषेक किया जाता है। 

वैशाख शुक्ल पंचमी को आदि शंकराचार्य जैसे महान पुरुष के जन्म होने से  उनकी जयन्ती मनायी जाती है। श्रावण शुक्ल पंचमी को नाग पंचमी के रूप  में मनाया जाता है। इस दिन नागदेवी की विशेष पूजा अर्चा होती है और नागों को दूध पिलाया जाता है। इसी तरह भाद्रकुष्ण पंचमी को हलषष्ठी और भाद्रशुक्ल पंचमी को महान ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार इस अवसर पर स्नान- शौच करके वेदी बनाकर  उस पर विविध रंगों से अष्टदल कमल का चित्रण किया जाता, फिर उस पर ऋषियों की मूर्ति बनाकर विधान के साथ पूजन किया जाता है। 

ऋषियों का पूजन बहुत अर्थपूर्ण है। यों ऋषि मंत्रद्रष्टा, मन्त्रस्रष्टा और युगसृजेता होते हैं। समाज में जो भी उत्तम प्रचलन, प्रथा- परम्पराएँ हैं, उनके प्रेरणा स्रोत ऋषिगण ही हैं। इन्होंने विभिन्न विषयों पर महत्त्वपूर्ण शोधें की हैं। यथा- व्यासजी ने गहन वेदज्ञान को सुबोध पुराण ज्ञान के रूप में रूपान्तरित कर ज्ञानार्जन का मार्ग प्रशस्त किया। चरक, सुश्रुतादि आयुर्विज्ञान पर अनुसन्धान किए। जमदग्रि- याज्ञवल्क्य यज्ञ विज्ञान पर शोध प्रयोग किये। वशिष्ठ ने ब्रह्मविद्या व राजनीति विज्ञान तथा विश्वामित्र ने गायत्री महाविद्या का रहस्योद्घाटन किया। नारद जी ने भक्ति साधना के अनमोल सूत्र दिए। पर्शुराम ने ऊँच- नीचादि जातिगत भेद- वैषम्य का निराकरण किया। भगीरथ ने जल विज्ञान की महत्ता को समझकर धरती पर गंगावतरण के पुनीत पुरुषार्थ किया। पतंजलि ने योग विज्ञान की विविध साधना मार्ग प्रस्तुत किए। अन्य ऋषियों ने भी व्यापक  समाज हित के कार्य किए हैं जिनका मानव जाति सदा ऋणी रहेगी। 

ये सभी ऋषि भारतीय संस्कृति के उन्नायक, युग सृजेता, मुक्तिमार्ग का पथ प्रदर्शक, राष्ट्रधर्म के संरक्षक, व्यष्टि- समष्टि की समस्त गति, प्रगति और सद्गति के उद्गाता हैं। संसार के तमाम रहस्यमय विद्याओं की खोज, उन पर प्रयोग, समाज में सत्पात्रों को उनकी शिक्षा दीक्षा, उनकी  सहायता से अभिनव समाज निर्माण जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य सब इन महान  ऋषियों की ही देन हैं। इस युग के ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने उन ऋषियों के सृजन विचारों पर युगनिर्माण योजना का विराट अभियान चलाया है जो आज अखिलविश्व गायत्री परिवार के नाम से विश्वभर में कार्यरत है। और भी कई समूह वर्तमान हैं जो इस पर अमल कर रहे हैं। आइए, आज के पावन अवसर पर उनके चरण चिन्हों पर चलने का संकल्प  लें।


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