देश का इतिहास नये सिरे से लिखा जाना चाहिए - डॉ. प्रणव पण्ड्या


सांसद श्री विजय सोनकर जी लिखित पुस्तकों का विमोचन समारोह 
शांतिकुंज का संदेश

  •  हमारी संस्कृति का इतिहास एकता और समरसता का है।
  •  जाति के आधार पर इसे बाँटने का षड़यंत्र अंग्रेजी मानसिकता की देन। 
  •  आज का युवा जातिपाँति के आधार पर विभाजन नहीं, योग्यता के आधार पर राष्ट्र संचालन में प्रमुख भूमिका चाहता है। 

हमारे देश का इतिहास एकता और समरसता का इतिहास है। महारानी मीरा के गुरु रैदास थे। शहीद भगत सिंह ने फाँसी से पहले अपनी माँ के चरण स्पर्श करने की इच्छा व्यक्त की थी। जब वह पूरी नहीं हो सकी तो जेल की सफाई कर्मचारी एक महिला के चरण स्पर्श करते हुए अपनी वह इच्छा पूरी की कि कोख से जन्म देने वाली माँ तो अपनेपन के नाते मुझे साफ करती थी, लेकिन यह माँ तो आज भी मेरी सफाई करती है। 

अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख प्रतिनिधि आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने यह उद्गार सांसद श्री विजय सोनकर द्वारा लिखी और प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित तीन पुस्तक-हिंदू चर्मकार जाति, हिंदू वाल्मीकि जाति, हिंदू खटिक जाति के विमोचन समारोह में कहे। समारोह के मुख्य अतिथि श्री मोहनराव भागवत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक थे और अध्यक्षता श्री अशोक सिंघल, संरक्षक विश्व हिंदू परिषद ने की। उनके साथ केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री श्रीमती स्मृति इरानी, केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री 
श्री प्रकाश जावड़ेकर, लेखक 
श्री विजय सोनकर और प्रकाशक श्री प्रभात जी मंचासीन थे। 
डॉ. प्रणव जी ने अपने संदेश में ‘दलित’ जैसे शब्दों को देश को बाँटने वाली अंग्रेजी मानसिकता की देन बताया। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति भेदभाव को नहीं मानती। मानवीय एकता और समरसता को पुनःस्थापित करने के लिए इतिहास में हुई गड़बड़ियों को दूर करने के लिए इतिहास को फिर से लिखे जाने की आवश्यकता बतायी। 

गायत्री परिवार की विचारधारा स्पष्ट करते हुए उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव द्वारा बचपन में छपको अम्मा की सेवा का उल्लेख किया। उन्होंने गुरुदेव द्वारा हर वर्ग को पुरोहित बनाने, गायत्री परिवार में किसी की जाति न पूछे जाने जैसे तथ्यों की जानकारी दी। सामाजिक एकता और समरसता को सुदृढ़ करने के लिए नाम के साथ उपनाम जोड़ने की परंपरा को समाप्त करने का सुझाव भी दिया। 

शांतिकुंज प्रतिनिधि ने कहा कि आज का युवा जातिपाति के आधार पर विभाजन नहीं चाहता। वह अपनी योग्यता और प्रतिभा के आधार पर राष्ट्र संचालन में प्रमुख भूमिका निभाना चाहता है। देश में अच्छे दिन आ गये हैं। आने वाले १० वर्षों में इतना विकास होगा, जितना पिछले २००० वर्षों में नहीं हुआ। 

नवविमोचित पुस्तकों के संदर्भ में आदरणीय डॉ. साहब ने कहा कि मैंने ये तीनों पुस्तकें पढ़ी हैं। इन्हें न पढ़ता तो मैं बहुत-सी जानकारियों से वंचित रह जाता। ये पुस्तकें हर व्यक्ति को जरूर पढ़नी चाहिए। 

७ सितम्बर को एन.डी.एम.सी. कन्वेंशन सेंटर नई दिल्ली में आयोजित इस समारोह में मानवीय एकता के लिए संघर्ष करने वाले महापुरुष संत रैदास, संत कबीर, महात्मा फुले, गुरु  गोलवलकर, वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य को बड़ी कृतज्ञता के साथ याद किया गया। श्री प्रकाश जावड़ेकर ने अपनी माता से मिले संस्कारों का स्मरण किया। श्रीमती स्मृति इरानी ने कहा कि शिक्षा को भेदभाव मिटाने का स्रोत होना चाहिए। 


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