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  • जिन देवताओं की हम पूजा करते हैं उनके चित्रों का प्रयोग विज्ञापन के लिए किया जाना और फिर उनके चित्रों को  पैरों तले रौंदे जाने के लिए कहीं भी डाल देना अपमानजनक है। 
अपने देश में जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा, प्रांत आदि के नाम पर हमने न जाने कितनी दीवारें खड़ी कर रखी हैं। आये दिन झगड़े, दंगे, $फसाद होते रहते हैं। इनमें अवसरवादी अपनी रोटी सेकते हैं और निर्दोष जनमानस सिसकता-तड़पता दिखाई देता है। 

लेकिन कितने आश्चर्य की बात है कि जिन देवी-देवताओं की हम पूजा करते हैं, वंदना करते हैं, उनके चरणों में मस्तक झुकाते हैं, उन्हें अपमानित होते हुए हम रोज देखते हैं और हम पर जूँ तक नहीं रैंगती! 

हमारे श्रद्धास्पद देवी-देवताओं के चित्र तंबाकू और गुटखा के पाउचों पर छपते हैं। शंकर जी, गणेश जी, हनुमान जी की वंदना करने वाले बीड़ी-तंबाकू के पैकेटों से उन चित्रों को उतारते हैं और कहीं भी फैंक देते हैं। माचिस, कपड़ों के रैपरों पर भी भगवान के फोटो छापे जाते हैं, ग्राहकों की धार्मिक आस्थाओं को आकर्षित कर निजी लाभ कमाने के लिए। और हम उन्हें छोड़ देते हैं कूड़े के ढेर में सड़ने के लिए, पाँवों तले रौंदे जाने के लिए। पटाखों पर भी देवी-देवताओं के चित्र देख लीजिए। पर्व है लक्ष्मी पूजन का और लक्ष्मी बम चलाकर उसी लक्ष्मीमाता के चिथड़े उड़ाकर लोग कितना प्रसन्न होते हैं!

क्या हमें पता है कि जिस देश भारतवर्ष में इनकी पूजा-वंदना होती है केवल वहीं इनका सबसे ज्यादा अपमान होता है। मुस्लिम देश इंडोनेशिया ने तो गणेश जी का चित्र अपने २०,००० रुपये के नोट पर छाप रखा है। कई अन्य देशों में भी हिंदू देवताओं का बहुत सम्मान होता है। दूसरे धर्मों के देवताओं की ऐसी दुर्दशा कहीं देखी है आपने? क्या अपनी आस्था पर हो रहे आघात को इस तरह देखते रहना उचित है?

उरई के एक संत श्री राधानाथ महाराज और उनके सहयोगियों ने इससे आहत होकर देवी-देवताओं के हो रहे अपमान को रोकने के लिए पहल की है। उन्होंने प्रधानमंत्री जी, राष्ट्रपति जी और सर्वोच्च न्यायालय सहित कई संवैधानिक संस्थाओं का द्वार खटखटाया है। उन्हें ज्ञापन दिये हैं और जनहित याचिकाएँ दायर की हैं। लेकिन इस दिशा में प्रभावशाली परिणाम तो तभी निकल पायेंगे जब जनमानस जागेगा, जन समर्थन बढ़ेगा। आस्था के पतन के इस प्रवाह को रोका ही जाना चाहिए। 



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