• प्रेरणाप्रद परंपरा की नयी पहल के साथ समाज को अर्पित किया जीवन

 
बंधनमुक्ति और मोक्ष अध्यात्म की सर्वोच्च कामनाएँ हैं। जीते जी अपना श्राद्ध-तर्पण करने का यह विधान इन्हें प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। अपने को समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त कर लेने और मात्र इष्ट की, ईश्वर की आकांक्षाओं को पूरा करने में ही तन्मय हो जाने वाला व्यक्ति ही सही मायनों में बंधन मुक्त है। मनुष्य जीवन को सार्थक करने के लिए हर व्यक्ति को इस साधना मार्ग को अपनाना चाहिए। 

अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख प्रतिनिधि आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने मिशन की नींव मजबूत करने वालों में से एक श्री वीरेन्द्र अग्रवाल के जीवच्छ्राद्ध ‘बंधन मुक्ति महोत्सव’ में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए यह संदेश दिया। 

आदरणीय डॉ. साहब ने श्री अग्रवाल जी के त्याग, समर्पणभाव का स्मरण करते हुए मंगल तिलक के साथ उनकी आत्मिक प्रगति की प्रार्थना की। उनके गुरु-शिष्य संबंधों की पवित्रता की सराहना की। सद्गुरु की परख और उनसे प्राप्त अनुदानों को गुरुकार्यों में ही लगाने की उनकी निष्ठा और उत्साह की भरपूर सराहना की। 

जीवच्छ्राद्ध संस्कार का कर्मकाण्ड १३ सितम्बर को श्री वीरेन्द्र जी के आवास गायत्री विला, जनता कॉलोनी में आयोजित हुआ। इस अवसर पर उनके समस्त परिवारी जन उपस्थित थे। धर्मपत्नी श्रीमती सीतादेवी अग्रवाल और उनके तीनों पुत्र चि. आलोक, विनय और संजय विभिन्न कर्मकाण्डों में उनका सहयोग करते रहे। शांतिकुंज से कर्मकाण्ड सम्पन्न कराने सर्वश्री शिवप्रसाद मिश्रा, सूरज प्रसाद शुक्ला, ओंकार पाटीदार, उदय किशोर मिश्रा आदि पहुँचे थे। 

सायंकाल समस्त परिवारी जन और इष्टमित्र आमंत्रित थे। श्री वीरेन्द्र अग्रवाल जी ने जीवित श्राद्ध के समय अपनी भावनाओं से उन्हें अवगत कराया। सांसारिक व्यवहार में जाने-अनजाने हुई भूलों या आहत भावनाओं के लिए विनम्रतापूर्वक क्षमा याचना की। 




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