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जिनमें उत्कृष्टता की चाह है, ऐसे लोग अक्सर यह पूछते देखे जाते हैं कि हम क्या करें? यह पूछने से अधिक जरूरी है यह सोचना कि हम क्या बनें? क्योंकि व्यक्ति का निर्माण उसकी भावनाओं पर आधारित है। अच्छी सोच के साथ वह जो भी करेगा, भला ही करेगा। 

ऐसी ही एक घटना महेसाणा जिले में देखने को मिली जब पिछले १७ वर्षों से नगर के सीमंधर मंदिर, हनुमान मंदिर और साईंबाबा मंदिर के द्वार पर खड़े रहने वाले एक भिक्षुक गोदड़िया बापू ने २२ स्कूली छात्राओं को नये रंगीन वस्त्र खरीद कर दान दिये। ये बालिकाएँ मूक-बधिर विद्यालय की थीं। 

एक गोदड़ी को ही सिलकर वस्त्र के रूप में प्रयोग करने के कारण भिक्षुक खीमजीभाई प्रजापति गोदड़िया बापू के नाम से विख्यात् हो गये हैं। वे भले ही भिक्षा माँगते हों, लेकिन उनकी भावनाओं में तो भगवान बसे दिखाई देते हैं। इसीलिए वे लोगों से एक, दो, पाँच रुपये माँग कर इकट्ठा करते रहते हैं। उनमें से जितना जरूरी है उतना स्वयं पर खर्च करते हैं और शेष को चुपचाप बिना किसी को पता चलने दिये बालिकाओं को दान कर देते हैं। 

लोग बेटी के जन्म से दुःखी हो जाते हैं। उनकी यही भावनाएँ भिक्षुक गोदड़िया बापू को आहत करती हैं। इसीलिए उन्होंने अपने गुजारे से बची राशि से सदा बालिकाओं को खुशहाल बनाने के प्रयास किये हैं। २ सितम्बर के दिव्य भास्कर में प्रकाशित समाचार के अनुसार २२ मूक-बधिर बालिकाओं को दान दिया जाना भी ऐसे ही प्रयासों की एक कड़ी थी। उन्होंने आजीवन बालिकाओं के उत्थान के लिए प्रयास करते रहने का संकल्प लिया है। 



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