• गंगा मैया और देव संस्कृति को दुर्बुद्धि के अभिशाप से मुक्त कराने का भागीरथी प्रयास
  • निर्मल गंगा जन अभियान का तीसरा चरण 

परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस आश्विन कृष्ण त्रयोदशी-२१ सितम्बर को गंगोत्री में शांतिकुंज प्रतिनिधि आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी द्वारा गंगा अमृत कलश यात्रा को हरी झंडी दिखाये जाने के साथ निर्मल गंगा जन अभियान का तीसरा चरण आरंभ हो गया। इस अवसर पर श्री गंगा पुरोहित सभी, श्री पाँच मंदिर समिति गंगोत्री धाम के प्रमुख, ईशावास्यम आश्रम से स्वामी हरिहर जी महाराज सहित अनेक तीर्थ पुरोहित, गायत्री परिवार के सैकड़ों कार्यकर्त्ता और नगरवासियों के जय-जयकार से पवित्र गंगोत्री धाम गूँज उठा। इससे पूर्व आदरणीय डॉ. साहब ने गंगा मंदिर और मंदिर के समक्ष गंगाघाट पर गंगा मैया का पूरे विधि-विधान के साथ अभिषेक-पूजन कर उसे गंगा रथ पर प्रतिष्ठित किया। 

सबसे महत्त्वपूर्ण है
 आपका सहयोग

गंगा अमृत कलश यात्राओं की सफलता में सबसे बड़ा योगदान उन टोलियों का होगा, जो रथ के पहुँचने से पहले जनजागरण अभियान चलाकर रथ के कार्यक्रमों की जानकारी लोगों तक पहुँचायेंगी, उन्हें पूजा-संगोष्ठियों में लायेंगी। परिजन इस कार्य में अपना अधिकतम सहयोग सुनिश्चित करें। 

निर्मल गंगा जन अभियान लोगों के विचारों में बदलाव लाने का अभियान है। विचार बदलेंगे तो आदतें बदलेंगी, आदतें बदलेंगी तो अच्छे संस्कार बनेंगे। कोई व्यक्ति चाहे गंगा के किनारे बसा हो, नर्मदा या गोदावरी के; हर व्यक्ति को निर्मल गंगा जन अभियान को अपनाना चाहिए। अपनी नदियाँ, सरोवर, जलकूप हर जलस्रोत को स्वच्छ रखने और स्वच्छ करने में सहयोग देने की मानसिकता का विकास करते रहना चाहिए। लोगों के विचार बदलेंगे तो गंगा मैया और सारी नदियाँ निर्मल हो जायेंगी। यह गंगा मैया के साथ अपनी संस्कृति को बचाने का महान भागीरथी अभियान है। 

गोमुख में प्रार्थना, ध्यान व स्वच्छता अभियान
अभियान का शुभारंभ एक दिन पूर्व गोमुख से हुआ। शांतिकुंज में आन्दोलन प्रकोष्ठ प्रभारी श्री के.पी. दुबे के नेतृत्व में ४५ सदस्यीय दल २० सितम्बर को पदयात्रा करते हुए गोमुख पहुँचा। वहाँ तर्पण, गंगापूजन, ध्यान और अभियान की सफलता के लिए सामूहिक प्रार्थना की गयी। गंगा अमृत कलश यात्रा के लिए गोमुख से जल ग्रहण कर दल वापसी यात्रा पर रवाना हुआ। 
हर-हर गंगे के बुलंद जयघोष से घाटियाँ गूँज उठीं। श्वेत-शीतल बर्फीले शिखर से माँ गंगा को दुर्बुद्धि के अभिशाप से मुक्त करने के लिए चलाये जा रहे एक और भागीरथी अभियान की सफलता का आशीष मिलता अनुभव होता रहा। पूरी पदयात्रा में जहाँ-जहाँ भी कूड़ा-करकट दिखाई दिया, गायत्री परिवार के परिजन उसको एकत्र करते चल रहे थे, जिसे गंगोत्री लाकर कूड़ेदान में फैंका गया। ४५ सदस्यों के दल में शांतिकुंज के ९ प्रतिनिधियों के साथ भागीरथ अंचल प्रभारी डॉ. वी.के. जोशी, श्री दिनेश मैखुरी, श्री बी.पी. बदानी और श्री जयस्वरूप बहुगुणा सहित स्थानीय परिजन शामिल थे। 

माँ गंगे का पूजन, ध्यान, अभिषेक
गंगा अमृत कलश यात्रा आरंभ करने से पहले आदरणीय डॉ. प्रणव जी ने गंगोत्री मंदिर के सामने गंगा के मुख्य घाट पर गंगा की धारा में बैठकर गंगा मैया का पूजन-अभिषेक किया। श्री गंगा पुरोहित सभा के अध्यक्ष रावल सुरेश सेमवाल ने स्वयं यह पूजन सम्पन्न कराया। इसके बाद गंगोत्री मंदिर में भी पूजन-अभिषेक किया गया। 

२० सितंबर की सायं गोमुख से गंगोत्री लौटे दल ने निर्मल गंगा दीपयज्ञ किया। इस अवसर पर गंगा पूजन, तर्पण, प्रार्थना, ध्यान का सामूहिक क्रम सम्पन्न हुआ। 

२१ सितम्बर को आदरणीय डॉ. प्रणव जी के सान्निध्य में गंगातट पर ही ध्यान और मंगल प्रवचन ने समस्त साधकों में नवऊर्जा का संचार किया। गंगोत्री से जल लेकर कलश में भरा गया। तत्पश्चात् इस गंगाजल कलश को साथ लेकर सभी ने गंगोत्री में प्रभात फेरी निकाली। लाखों लोगों की भावनाओं में सद्बुद्धि का संचार कर सद्भावना जगाने जा रहे इस मंगल कलश को भगीरथ शिला-जहाँ ऋषि भगीरथ और परम पूज्य गुरुदेव ने भी तप किया था तथा गंगोत्री मंदिर में कुछ समय के लिए स्थापित किया गया। उसके समक्ष गायत्री महामंत्र का जप और प्रार्थनाएँ की गयीं। 

  गंगा अमृत कलश यात्रा गोमुख से गंगासागर तक गंगा की पूरी २५२५ किलोमीटर लम्बाई में चलाया जाने वाला निर्मल गंगा जन अभियान का तीसरा चरण है। पाँच अंचलों में विभाजित पूरी लम्बाई पर कुल ९ यात्राएँ निकाली जा रही हैं। परम पूज्य गुरुदेव के जन्म दिवस २१ सितम्बर को गंगोत्री से आरंभ हुआ यह अभियान आगामी लगभग ६ माह तक चलेगा। यात्राओं का क्रम इस प्रकार है-
  • अंचल                    कहाँ से कहाँ तक
  • भगीरथ                  गोमुख से हरिद्वार
  • विश्वामित्र (बायाँ)      हरिद्वार से कानपुर
  • विश्वामित्र (दायाँ)      कानपुर से हरिद्वार
  • भरद्वाज (बायाँ)       कानपुर से वाराणसी
  • भरद्वाज (दायाँ)       वाराणसी से कानपुर
  • गौतम (बायाँ)          वाराणसी से सुलतानगंज
  • गौतम (दायाँ)          सुलतानगंज से वाराणसी
  • रामकृष्ण (बायाँ)       सुलतानगंज से गंगासागर
  • रामकृष्ण (दायाँ)       गंगासागर से सुलतानगंज

एक साथ पाँच रथ यात्रा पर होंगे। सभी अंचलों के बायें क्षेत्र से यात्राएँ आरंभ होंगी और गन्तव्य पर पहुँचने के बाद दायीं ओर से वापस लौटेंगी। 

तीसरा चरण ः स्वरूप और कार्ययोजना
सभी रथों के साथ जन जागरण, यज्ञ-दीपयज्ञ, वीडियो प्रोजेक्टर, प्रचार साहित्य जैसी समस्त सामग्री है। इनके माध्यम से किये वाले प्रमुख कार्य हैं-
१. रथयात्रा-पदयात्रा ः हर रथ यात्रा के साथ नैष्ठिक परिजन और श्रद्धालु पदयात्रा करते हुए साथ चलेंगे। वे हर गाँव, हर घर और हर व्यक्ति से संपर्क कर गंगा की स्वच्छता के लिए जागरूक करने का संदेश देते चलेंगे। 
२. दीवार लेखन ः पदयात्रा के मार्गों और गाँवों में निर्मल गंगा जन अभियान के नारे और स्वच्छता के निर्देश दीवारों पर लिखे जायेंगे। 
३. सभाएँ ः जहाँ-जहाँ गंगा अमृत कलशों के पूजन के लिए लोग एकत्रित होंगे, वहाँ छोटी-छोटी नुक्कड़ सभाएँ आयोजित कर उन्हें संदेश दिया जायेगा। 
४. स्वच्छता ः गंगाघाटों पर स्वच्छता अभियान चलाये जायेंगे। 
५. रैली ः पूर्व निर्धारित पड़ावों पर पूरे गाँव-कस्बे, नगर में सभा से पूर्व जनजागरण-आमंत्रण रैलियाँ निकाली जायेंगी। 
६. दीपयज्ञ-यज्ञ ः जहाँ रात्रि पड़ाव होगा, वहाँ सायंकाल दीपयज्ञ और प्रातः यज्ञ (स्थिति के अनुरूप) होंगे। इस अवसर पर गंगा की कथा-व्यथा पर डॉक्यूमेंट्री दिखायी जायेगी। 
७. गंगा प्रज्ञा मंडलों का गठन
अभियान के प्रति उत्साही लोगों को साथ लेकर ‘गंगा प्रज्ञा मंडल’ के नाम से उनका एक समूह गठित किया जायेगा। यह मण्डल जन जागरण अभियान को निरंतर बनाये रखते हुए निर्मल गंगा जन अभियान की विविध योजनाओं को क्रियान्वित करता रहेगा। दीपयज्ञ के अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं को गंगा को स्वच्छ बनाये रखने के लिए ‘करने’ तथा ‘न करने’ योग्य बातों का पालन करने के संकल्प दिलाये जायेंगे। 

दिव्य सत्ता के संरक्षण के संकेत भी मिले
भैरो बाबा प्रसन्न हुए
शांतिकुुंज की टोली गंगोत्री जा रही थी। भैरो घाटी में जब जंगला पुल के पास पहुँचे तो गाड़ी के सामने एक काला कुत्ता आ गया। वह आगे-आगे बीच सड़क पर चलता रहा, गाड़ी उसके पीछे-पीछे जाती रही। उस कुत्ते ने इसी तरह जंगला पुल पार करा दिया। जब आगे भी यही क्रम रहा तो चालक भाई के मुँह से अनायास निकला-भैरोबाबा अब तो रास्ता दो। कुत्ता सड़क के किनारे से पहाड़ी की ओर चला गया। ७-८ किलोमीटर बाद जहाँ भैरो घाटी समाप्त होती है, कुत्ता फिर दिखाई दिया। सबने आश्चर्य चकित होकर देखा, कुत्ता वही था। 

गंगोत्री पहुँचे। सहज भाव से इस घटना की भी चर्चा हुई तो लोग टोली के सदस्यों को बड़ी श्रद्धा के साथ प्रणाम करने लगे। बोले-जिन पर भैरोबाबा की कृपा होती है, वह कुत्ता उन्हें ही दिखाई देता है। निश्चित ही इस दैवी अभियान की सफलता का आशीर्वाद देने वे आये थे। 

भगीरथ शिला पर दीपयज्ञ
गंगा अमृत कलश यात्रा के लिए गोमुख से जल लाने के बाद सायंकाल गंगा मंदिर प्रांगण में दीपयज्ञ निर्धारित था, जिसकी अनुमति पहले मिल चुकी थी। न जाने क्यों ऐन वख्त पर यह अनुमति रद्द कर दी गयी। तब गंगा की गोद में एक शिला पर बैठकर  दीपयज्ञ करना पड़ा। 
बाद में पता चला कि यही वह भागीरथी शिला है जिस पर बैठकर भगीरथ ऋषि द्वारा तप किये जाने की मान्यता है। उल्लेखनीय है कि परम पूज्य गुरुदेव ने भी भगीरथ शिला पर बैठकर तप किया था। एक तरह से मानवता को दुर्बुद्धि के अभिशाप से मुक्त कर माँ गंगा को पुनर्जीवित करने चले ऋषिपुत्रों को यह ऋषिसत्ता का आशीर्वाद ही था।

निर्मल गंगा जन अभियान  -  अब तक की सफलताएँ

अखण्ड ज्योति के प्राकट्य की शताब्दी एवं परम वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी-२०२६ तक चलने वाला निर्मल गंगा जन अभियान पाँच चरणों में आयोजित किया गया है। गंगा अमृत कलश यात्राएँ अभियान का तीसरा चरण है, जिसमें गाँव-गाँव, घर-घर हर व्यक्ति से संपर्क कर लोगों को गंगा स्वच्छता के लिए जागरूक करना और अभियान के प्रति उत्साही लोगों के ‘गंगा प्रज्ञा मंडल’ गठन का लक्ष्य रखा गया है जो अभियान को निरंतरता प्रदान करते रहेंगे। 

पूर्व के दो चरण ः प्रथम चरण में गंगा प्रवाह की पूरी लम्बाई वाले क्षेत्र का सर्वेक्षण हुआ। प्रत्यक्ष स्थिति का आकलन कर जानकारियाँ एकत्रित की गयीं। जगह-जगह गंगाजल प्रदूषण की जाँच करायी गयी, चित्र लिये गये। जन सामान्य तक इन्हें पहुँचाने के लिए लघु फिल्म (डॉक्यूमेंटरी) तैयार की गयी। 

दूसरे चरण में पाँचों अंचलों में गंगा संवाद कथाओं का आयोजन हुआ। इसके अंतर्गत चुने हुए स्थानों पर १५० कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों तक अपनी बात पहुँचायी गयी। गंगा के दर्द को अनुभव करने वाले हर वर्ग, हर वय, हर धर्म के लोग अभियान से जुड़े। जगह-जगह क्षेत्रीय टोलियों ने अपनी तरह से कार्यक्रम आयोजित कर गंगा की कथा-व्यथा लोगों तक पहुँचायी। इस चरण में ४५० गंगा प्रज्ञा मंडलों का गठन हुआ, १० लाख लोग इस अभियान से जुड़े।  

अगले चरणों की रूपरेखा 
चौथा चरण सहयोग आन्दोलन का होगा। मार्च २०१५ से लगभग ६ माह तक चलने वाले इस आन्दोलन में गंगा को स्वच्छ रखने और स्वच्छ करने वाले तमाम उपायों को क्रियान्वयन होगा। जगह-जगह करने योग्य और न करने योग्य बातों का लेखन होगा, पोस्टर-होर्डिंग्स लगाये जायेंगे। प्रशासन के सहयोग से कूड़े के निस्तारण की व्यवस्थाएँ ठीक करने संबंधी कार्यवाही होगी। नियमित स्वच्छता-श्रमदान का क्रम बने, ऐसे प्रयास किये जायेंगे। 

कानून और न्यायालय के आदेशों का ठीक प्रकार से पालन हो, यह सुनिश्चित करने के प्रयास अगले चरण में किये जायेंगे। दूषित जल को गंगा में विसर्जित करने और पॉलीथीन का प्रयोग रोकने के लिए जनहित याचिका और सूचना का अधिकार का प्रयोग किया जायेगा, उस संदर्भ में लोगों को जानकारी दी जायेगी। 

इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय तथा दो राज्यों में उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं के सहयोग से निर्मल गंगा जन अभियान विधि प्रकोष्ठ का गठन कर दिया गया है। इस दिशा में जितनी भी जानकारियाँ इस प्रकोष्ठ को उपलब्ध होंगी, हमारा अभियान उतना ही सशक्त और प्रभावशाली होगा।

इस क्रम में विभिन्न वर्गों के बीच गोष्ठी और धरने जैसे कार्यक्रमों का भी प्रावधान है।  

गंगा प्रज्ञा मंडलों के सहयोग और प्रशिक्षण का कार्य भी चौथे चरण में प्रमुखता से होगा। उन्हें इसी के साथ आदर्श गाँवों के निर्माण के लिए भी प्रेरित और प्रशिक्षित किया जायेगा। 

पाँचवा चरण १० वर्षीय, सन २०२६ तक निरंतर चलने वाला होगा। निर्मल गंगा जन अभियान के समग्र क्रियान्वयन की विधि-व्यवस्था के लिए इसके अंतर्गत समय की माँग के अनुरूप कार्यक्रम आयोजित किये जाते रहेंगे। 

तीर्थ पुरोहितों का स्नेह-सहयोग पाकर अभिभूत हुए
गायत्री परिवार द्वारा चलाये जा रहे गंगा शुद्धि के अभियान से गंगोत्री का पुरोहित वर्ग गद्गद है। इस कार्यक्रम से गायत्री परिवार के साथ उनकी नजदीकियाँ और बढ़ गयीं। उत्तराखंड की आपदा में शांतिकुंज द्वारा की गयी जनसेवा और निर्मल गंगा जन अभियान से प्रभावित पुरोहितों ने गंगोत्री क्षेत्र में जनजागरण करने तथा स्वच्छता अभियान को क्रियान्वित करने में अपनी सहभागिता का विश्वास दिलाया। गंगोत्री आने वाले गायत्री परिवार परिजनों को पूरा-पूरा सहयोग करने का आश्वासन उन्होंने दिया।  

गंगा अमृत कलश यात्रा रवाना होने से पहले श्री पाँच मंदिर समिति गंगोत्री धाम के सभा कक्ष में आदरणीय डॉ. साहब का स्वागत-अभिनंदन समारोह रखा था। श्री पाँच मंदिर समिति के सचिव श्री सुरेश सेमवाल ने शांतिकुंज प्रतिनिधि के गंगोत्री आगमन और गंगा मैया की सनातन गरिमा को लौटाने के लिए उनके द्वारा किये जा रहे प्रयासों का हार्दिक अभिनंदन किया। उन्होंने धर्म-चेतना के जागरण से समाज के उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त करने के शांतिकुंज के प्रयासों की सराहना की। सामाजिक एकता के सूत्रों को प्रगाढ़ करने और अध्यात्म के प्रति जनमानस का उत्साह बढ़ाने वाले गायत्री परिवार के कार्यों की समीक्षा करते हुए उन्होंने कहा कि आप धर्म के आधार स्तंभ हैं, धर्म के गौरव हैं। 

आदरणीय डॉ. साहब ने अपने संदेश में अध्यात्म चेतना का विस्तार करते हुए समाज के बुनियादी विकास के सूत्र दिये। उन्होंने धर्म के उस स्वरूप को उभारने की आवश्यकता बतायी, जिसमें लोग परंपराओं से उठकर प्रगतिशील ढंग से सोचें। पुण्य लूटने की नहीं, गंगा को माँ मानने और उसे स्वच्छ रखने में पुण्यलाभ की धारणा बनायें।

शांतिकुंज प्रतिनिधि ने देव संस्कृति विश्वविद्यालय के धर्म विज्ञान संकाय के माध्यम से तीर्थ पुरोहितों के प्रशिक्षण की व्यवस्था बनाने की पेशकश की। तीर्थ क्षेत्र में स्वावलम्बन प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का आश्वासन दिया, ताकि धर्म में लोकमंगल की भावनाओं का अधिकाधिक समावेश हो, वह अर्थोपार्जन का साधन न बन जाये।


शांतिकुंज से शारदीय कार्यक्रमों की शृंखला में निकली टोलियाँ देंगी
  • गौ, गंगा, गीता, गायत्री, गाँवों के उत्थान का संदेश 
  • २० टोलियाँ रवाना हुईं
  • तीन कार्यक्रम - १. निर्मल गंगा जन अभियान २. समूह साधना कार्यक्रम  ३. युग चेतना विस्तार
इस वर्ष विजया दशमी के पावन अवसर पर शांतिकुंज से तीन तरह के अभियानों के लिए टोलियों को अत्यंत उत्साहवर्धक समारोह के साथ विदाई दी गयी। इनके साथ ही चारों अन्य अंचलों में गंगा अमृत कलश यात्राओं के लिए रथ रवाना हुए। आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी सहित शांतिकुंज के समस्त वरिष्ठ प्रतिनिधियों और उपस्थित आश्रमवासी-साधकों ने टोलियों पर गायत्री मंत्र एवं स्वस्तिवाचन के साथ पुष्पवर्षा करते हुए टोलियों को भावभरी विदाई दी। 
शांतिकुंज में टोलियों के प्रशिक्षण के लिए २७ सितम्बर से २ अक्टूबर की तारीखों में विशेष शिविर आयोजित किया गया। इसमें शांतिकुंज के अलावा देशभर के चयनित प्रतिनिधि शामिल हुए। आदरणीय डॉ. प्रणव जी, आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी सहित शांतिकुंज प्रतिनिधियों ने उन्हें इन कार्यक्रमों के द्वारा भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्व-गौ, गंगा, गीता, गायत्री को जनजीवन में प्रवेश कराने के उपाय बताये। उन्होंने कहा कि अपनी संस्कृति के इन्हीं आधारभूत तत्त्वों के प्रति आस्था जगाकर हम अपने गाँवों को फिर से स्वर्ग बना सकते हैं। प्रत्येक विषय पर विशेषज्ञों ने विस्तार से मार्गदर्शन दिया। 



सोचो ...!     समझो ......!!   जो उचित है, वही करो।
न करने योग्य 
  •  पूजा के बासी फूल और अन्य सामग्री गंगा में न डालें। 
  •  तट पर पॉलीथीन का प्रयोग और गंगा में विसर्जन न करें।
  •  प्लास्टिक के दोनों में दीपदान न करें।
  •  प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनी और जहरीले रंगों से रंगी मूर्तियों को गंगा में विसर्जित न करें।
  •  गुटका एवं शैम्पू पाउच प्रयोग न करें, गंगा में न डालें।
  •  कपड़े धोने और नहाने में साबुन का प्रयोग न करें।
  •  तटों और घाटों पर मल-मूत्रत्याग न करें। 
  •  मल-मूत्रयुक्त पानी गंगा में प्रवाहित न होने दें।
  •  शहर का गंदा नाला एवं उद्योगों का गंदा, जहरीला पानी गंगा में जाने देने से रोकें। 
  •  शव, अधजले शव या मृत पशुओं को गंगा में प्रवाहित न करें। 
  •  तटीय खेतों में रासायनिक खाद व कीटनाशक का प्रयोग न करें।

करने योग्य 
  •  बासी फूल और अन्य पूजन सामग्री का प्रयोग खाद बनाने में करें।
  •  पॉलीथीन के स्थान पर कागज की थैलियों का प्रयोग करें।
  •  मल-मूत्र त्याग करने के लिए शौचालयों का प्रयोग करें।
  •  कृषि के लिए गोबर अथवा कैंचुआ से बनी खाद तथा गोमूत्र से बने कीटनाशक का प्रयोग करें। 
  •  गंदे पानी के निस्तारण के लिए सोकपिट (सोखता गड्ढा) बनायें। 
  •  आटे के दीपक या पत्ते के दोने को गंगातट पर रखकर ही दीपदान करें, उन्हें प्रवाह में न बहायें। 
  •  मृतक पशुओं को भूमि समाधि दें।
  •  शवदाह के लिए श्मशान घाट या विद्युत शवदाह गृह का प्रयोग करें।


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