• सर्वपितृ अमावस्या पर मातृसत्ता को शांतिकुंज की श्रद्धांजलि
  • ‘पाञ्चजन्य’ के संपादक श्री तरुण विजय ने अपनी माता की स्मृति में आयोजित किया था समारोह महामहिम अज़ीज कुरैशी और आदरणीय डॉ. प्रणव जी थे मुख्य अतिथि

  • ‘‘माँ है तो संवेदना है। माँ है तो संसार है।’’ 
शांतिकुंज के प्रमुख प्रतिनिधि आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने मातृसत्ता के प्रति अपनी यह प्रगाढ़ आस्था सर्वपितृ अमावस्या के दिन देहरादून में आयोजित एक श्रद्धांजलि सभा में व्यक्त की। यह सभा पांचजन्य के सम्पादक सांसद माननीय श्री तरुण विजय जी ने अपनी माता श्रीमती राजरानी जी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए आयोजित की थी। प्रदेश के राज्यपाल महामहिम अजीज़ कुरैशी समारोह के मुख्य अतिथि थे। 

‘अम्माजी’ के संबोधन से विख्यात् श्रीमती राजरानी जी का शांतिकुंज से अतिशय लगाव था। गतवर्ष दिवंगत हुईं अम्माजी पिछले ३० वर्षों से समय-समय पर शांतिकुंज आकर साधना करती रहती थीं। उनकी गुरुदेव-माताजी से प्रत्यक्ष भेंट हुई। अत्यंत विनम्र साधिका के रूप में उन्होंने सदैव आत्मसंतोष और लोकमंगल की ही कामना की। अम्माजी को श्रद्धांजलि देते हुए शांतिकुंज प्रतिनिधि ने श्रोताओं को अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी का सम्मान करने का संदेश दिया। इस अवसर पर अम्माजी के तीनों पुत्र तरुण जी और अन्य दोनों पुत्र भी उपस्थित थे।  

पोषण, संवेदना और संस्कार सिंचन
आदरणीय डॉ. साहब ने कहा कि माँ संवेदना बाँटते, पोषण करने और संस्कारों का सिंचन वाली सर्वोच्च सत्ता है। इसीलिए धरती माता, गौमाता, गौमाता जैसे संबोधनों से हम समाज की पोषक सत्ताओं को संबोधित करते हैं। 

दिया का दिव्य प्रेम
इस समय समाज में बूढ़े माता-पिताओं की दुर्दशा और बढ़ते वृद्धाश्रमों के प्रचलन के प्रति शांतिकुंज प्रतिनिधि ने चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जिस घर में माता-पिता का सम्मान होता है, उस घर में स्वर्ग का वास होता है। हमारी संस्कृति में वृद्धाश्रमों का कोई स्थान नहीं है। 
आदरणीय डॉ. प्रणव जी ने कहा कि शांतिकुंज द्वारा स्थापित युवा संगठन दिव्य भारत युवा संघ ‘दिया’ से जुड़े ५,००,००० युवा वृद्धों के सम्मान का क्रांतिकारी अभियान चला रहे हैं। वे वृद्धों को गोद लेकर सप्ताह में २ से ४ घंटे उनके बीच पहुँचकर उनकी सेवा कर रहे हैं। 


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