मारीना बनी- मीरा, यवगेनी बना- कृष्णा, तान्या बनी सुगीता, यूरा बना विदुर 

शांति की खोज में मनुष्य दर दर भटकता है। भारत एवं भारतीय संस्कृति के अलावा उसे कहीं और शांति नहीं दिखती, इसलिए विश्वभर तमाम देश के नागरिक भारत की ओर अग्रसर होते हैं। वैसे भी देवभूमि उत्तराखंड सदियों से आध्यात्मिक पर्यटन का प्रमुख केन्द्र रहा है। विश्व प्रसिद्ध हरिद्वार में चैतन्य तीर्थ  के रूप में प्रसिद्ध गायत्री तीर्थ में आज ऐसे ही सात विदेशी नागरिक भारतीय संस्कृति से दीक्षित हुए जो रशिया, युक्रेन व लाटविया के थे। 

शांतिकुंज स्थित विदेश विभाग द्वारा मिली जानकारी के अनुसार ये सातों नागरिक आज गायत्री मंत्र से दीक्षित हुए और अपने जीवन को गायत्री परिवार के जनक पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचारों के अनुरूप ढालने का संकल्प लिया। सभी को गायत्री परिवार प्रमुख डॉ प्रणव पण्ड्याजी ने गायत्री मंत्र की दीक्षा दी। इस  अवसर पर डॉ प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि सद्गुरु की प्राप्ति से ही मन की शांति संभव है। गुरु के बिना शिष्य भटकता रहता है। आज आप सभी का नया जीवन शुरू हो रहा है। उन्होंने कहा कि अब तक आप मारीना, तान्या और यवगेनी व यूरा  थे, किन्तु आज से आप मीरा, कृष्णा, सुगीता और विदुर के नाम से जाने जाओगे। डॉ पण्ड्याजी  ने सातों नागरिकों को भारतीय संस्कृति के अनुरूप नाम दिये। इस अवसर पर डॉ. पण्ड्याजी ने सातों साधकों को अपने कार्यक्षेत्रों में पहुँचकर जन जन तक युगऋषि के विचारों को पहुँचाने का आह्वान किया। रशिया से आई मार्टिना ने  समयदान व अंशदान देने का संकल्प लिया। विदेश विभाग से जुड़े डॉ ज्ञानेश्वर मिश्र ने बताया कि सातों साधकों ने सवा लाख गायत्री मंत्र का अनुष्ठान के साथ शांतिकुंज में रहकर संस्कृत सीख रहे हैं। वे यहाँ रहते हुए पौरोहित्य का प्रशिक्षण भी ले रहे हैं। 




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