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दिल्ली जीवन अत्यंत हल्का- फुल्का और आनंददायी है। हमने अपनी अज्ञानता, महत्त्वाकांक्षा और अस्तव्यस्तताओं से उसे भाररूप बना लिया है। आज जो समस्याएँ हमें दिखाई देती हैं, हमारी क्षमता उससे कई गुना अधिक कर गुजरने की है। परेशानी यही है कि हम अपने को नहीं पहचानते और अपनी सामर्थ्य को विकसित करने का सही प्रयास नहीं कर पाते।

महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड, दिल्ली द्वारा आयोजित तीन दिवसीय जीवन प्रबंधन कार्यशाला को संबोधित करते हुए यह विचार शांतिकुंज के वरिष्ठ प्रतिनिधि आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी ने व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि व्यक्ति काम को भार मानकर करता है। यदि वह अपने चिंतन को बदल ले, ‘कार्य ही पूजा है।’ के भाव को अपनाकर ईमानदारी से अपने कार्य में उत्कृष्टता लाने का प्रयास करे तो वही कार्य ईश्वर के आशीर्वाद की तरह आनंददायी हो जायेगा। ईश्वर की उपासना की तरह हम काम को अपना मानकर उसमें उत्कृष्टता लाने का प्रयास करें तो अधिकांश समस्याओं का समाधान हो सकता है।

इस कार्यशाला में आदरणीय श्री उपाध्याय जी ने स्व का विस्तार करने, कम्पनी को परिवार के भाव से देखने और परस्पर सहयोग की भावना बढ़ाने जैसी शिक्षाओं को बड़े सरल शब्दों में मनोवैज्ञानिक ढंग से समझाते हुए सभी अधिकारी- कर्मचारियों का दिल जीत लिया। अध्यात्म के नये स्वरूप के दर्शन कर वे गद्गद दिखाई दिये।

एमटीएनएल द्वारा मनाये गये सतर्कता जागरूकता सप्ताह के अंतर्गत यह कार्यशाला आयोजित की गयी थी। अधिकारी और कर्मचारियों के दो अलग- अलग वर्गों में लगभग ३०० लोगों ने इसका लाभ लिया। शांतिकुंज के युवा पुरोहित सर्वश्री दिनेश पटेल, अंकुर मेहता, मंजरी मेहता, आशीष सिंह ने तीन दिवसीय कक्षाओं में कार्य में उत्कृष्टता लाने के विविध उपायों की चर्चा की। स्वास्थ्य, सहकारिता, पारिवारिकता, बच्चों का समग्र विकास भी चर्चा के विषय रहे।

शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता श्री कालीचरण जी कार्यशाला के समापन अवसर पर पहुँचे। उन्होंने स्वस्थ जीवन के लिए मन की स्वच्छता और उसके लिए प्रज्ञायोग साधना तथा नियमित स्वाध्याय पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि बाह्य जीवन में हमें जो गंदगी दिखाई देती है, वस्तुतः वह हमारे आंतरिक जीवन की गंदगी का प्रतिबिंब है। मन पवित्र किये बिना न स्वच्छता आयेगी, न सुख मिलेगा, न आनंद मिलेगा। इसके लिए उपासना के माध्यम से प्रभु समर्पित जीवन का अभ्यास अत्यंत आवश्यक है।


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