Published on 2015-12-21
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गीता की कइयों ने टिप्पणी की और कइयों ने पढ़ी होगी, तो हजारों ने सुनाई व लाखों ने सुनी होगी। परन्तु गीता को जीने वाले चुनिंदा लोग ही होंगे। इन्हीं चुनिन्दा लोगों में से एक हैं गायत्री परिवार की प्रमुख स्नेह सलिला शैलबाला पण्ड्या, जिनका जन्म ही गीता जयंती के दिन आज से ६१ वर्ष पूर्व हुआ था। उन्हें गायत्री परिवार के करोड़ों लोग ‘श्रद्धेया जीजी’ के नाम से सम्बोधित करते हैं। 

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहाँ परिवार टूटते जा रहे हैं, वहीं शैल दीदी उन्हें बाँधे रखने तथा प्रेमपूर्ण जीवन जीने का मार्गदर्शन देती है। गायत्री परिवार में सभी धर्म संप्रदाय के, हर आयु वर्ग के लोग शामिल हैं। शैल दीदी नियमित रूप से गायत्री परिवार के भाई- बहिनों से मिलतीं तथा उनका दुःख- दर्द साझा करती हैं, तो वहीं देश- विदेश में रहने वाले लाखों परिजनों का पत्राचार के माध्यम से मार्गदर्शन भी करती हैं। 

श्रद्धेया जीजी अपने से मिलने वालों को समाज व राष्ट्र के विकास में जुटने के लिए प्रेरित करती  हैं तथा नारी जागरण शिविर, महिला सम्मेलन, युवा चेतना शिविर, युवा सम्मेलन आदि विभिन्न शिविरों के माध्यम से उनमें ममत्व व प्यार उड़ेलती हैं, उनके कष्ट- कठिनाई व समस्याओं में भागीदारी करती हैं। वे गरीब, असहाय, पीड़ितों की सेवा को ईश्वर सेवा मानते हुए उसे दूर करने का हर संभव प्रयास करती हैं। 

एक माँ की भांति समाज की पीड़ा उनमें दिखाई देती हैं। इसका एक उदाहरण तब देखने को मिला, जब केदारनाथ में भयंकर प्राकृतिक आपदा आई, तो उन्होंने स्वतः संज्ञान लेते हुए सबसे पहले पीड़ितों तक राहत सामग्री भिजवाई। पहाड़ के पीड़ित परिवारों के लिए मकान, स्कूल आदि निर्माण करवाये जो आज तक जारी है। गुजरात भूकंप हो या लातूर भूकंप, ओडिशा  व बिहार में बाढ़ हो या दक्षिण भारत में चक्रवाती तूफान, सभी में त्वरित निर्णय लेते हुए राहत  सेवा पहुँचाने में अहम् भूमिका निभायी। उनके कुशल मार्गदर्शन में देश की लाखों महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर समाज सेवा के कार्य में जुटी हैं। नारी चाहे तो हर कार्य कुशलता से कर सकती हैं, इसकी एक मिसाल उन्होंने अपने कार्य द्वारा प्रस्तुत की।


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