विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय आज की सबसे बड़ी आवश्यकता ,अध्यात्म और विज्ञान लंगड़े अंधे की जोड़ी, मानव हित दोनों का समन्वय जरुरी - डॉ पण्ड्या
हरिद्वार 27 अप्रैल।
देवसंस्कृति विवि के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य के लिए आज विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की सबसे बड़ी आश्यकता है। धर्म और अध्यात्म लंगड़े और अंधे की जोड़ी के समान हैं। दोनों मिलकर ही वर्तमान संकट से मानवता को उबार सकते हैं। 
वे देवसंस्कृति विवि में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद विभाग द्वारा आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे थे। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन नें डॉ प्रणव पण्ड्या ने कहा कि न केवल विज्ञान के भविष्य के लिए बल्कि मानवता के उज्जवल भविष्य के लिए भी विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय जरुरी है। विज्ञान और अध्यात्म के बीच के भेद की मार्मिक व्याख्या करते हुए डॉ पण्ड्या ने कहा कि विज्ञान जहाँ जड़ प्रकृति, भौतक जगत एवं बाह्य संसार का अध्ययन करता है, वहीं अध्यात्म चेतन प्रकृति एवं आंतरिक जगत का अध्ययन करता है। दोनों का उद्देश्य सत्य की खोज है, बस दिशा में अंतर है। भौतिक जगत में गहन अंतर्दृष्टि के साथ चेतन तत्व का उद्घाटन होता है। उन्होंने कहा कि आज अध्यात्म से कटा विज्ञान निरंकुश हो चला है और विध्वसंक रूप ले चुका है, वहीं धर्म अंधविश्वास से भर चुका है। आज मात्र कर्मकाण्ड को ही सबकुछ मानकर धर्म के नाम पर कट्टरता एवं साम्प्रदायिकता फैल रही है। जरुरत वैज्ञानिक दृष्टि एवं आध्यात्मिक स्पर्श की है। अध्यात्म समग्र जीवन का दर्शन है, चेतना का परिष्कार है, जो दैवी तत्व के चिंतन के साथ शुरु होता है। आत्म संयम और साधना के साथ यह आगे बढ़ता है। आंतरिक परिष्कार के साथ बाह्य जगत एवं जीवन संवरने लगता है।  
वैज्ञानिक अध्यात्म की ऐतिहासिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कुलाधिपति ने कहा कि किस तरह 1968 में अखंड ज्योति में वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रतिपादन के साथ युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने 30-40 वैज्ञानिकों के समर्पित दल के साथ इसे शुरु किया था और ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में प्रायोगिक प्रयासों के साथ इसे मूर्तरूप दिया। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में शरीर, प्राण एवं मन पर यौगिक क्रियाओं के सराहनीय प्रभावों की प्रस्तुति की। उन्होंने शिक्षण संस्थानों में वैज्ञानिक अध्यात्म के समावेश पर बल दिया।
इससे पूर्व वैज्ञानिक अध्यात्मवाद विभाग की मुख्य समन्वयक डॉ शाभंवी मिश्रा ने विभाग की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। वर्ष 2007 में स्थापित वैज्ञानिक अध्यात्म विभाग के पाठ्यक्रम ग्रेजुएट स्तर पर अनिवाय़र् पाठयक्रम के रुप में पढ़ाए जाते हैं। क्रमश: वर्ष 2009, 2011, 2012 में विभाग में ब्रह्माण्ड विज्ञान, मेनेजमेंट एवं व्यावहारिक प्रोजक्ट कार्य शुरु किए गए। 2014 से पाठ्यक्रम को दूरस्थ शिक्षा में जोड़ा जा रहा है। इस दौरान फंडामेंटल ऑफ साइंटिफिक स्प्रिचुअलिटी, स्प्रिर्चुअल साइकॉलोजी, और शोध पत्रों के संकलन पर तीन पुस्तकों का भी विमोचन किया गया, जिसमें डॉ शाम्भवी मिश्रा, पीयूष त्रिवेदी, श्रीमती मनस्वी श्रीवास्तव एवं रीना शर्मा का विशेष योगदान रहा। इस अवसर पर चिरायु वत्स, प्रणव तिवारी, विनीता पटेल, जिनिया सोफत, प्रियांशी, अरुणी सूर्यवंशी एवं दा सोमहर के श्रेष्ठ शोध पत्रों को भी पुरस्कृत किया गया।
दैनन्दिनी  जीवन में वैज्ञानिक अध्यात्म विषय पर कुलसचिव संदीप कुमार एवं प्रो. बीपी शुक्ला ने, वैज्ञानिक अध्यात्म क्षेत्र में शोध पर कुलपति डॉ एसडी शर्मा एवं रोजगार की संभावनाओं को लेकर श्री ज्वलंत भावसार, डॉ. अमल कुमार दत्ता तथा गुरुकुल के  प्रो० एमएम तिवारी ने वैज्ञानिक अध्यात्म के उच्च शिक्षा क्षेत्र में अवसरों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन प्रणव तिवारी एवं ऋतु रंजना ने किया।
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