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गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में देशभर के चयनित ४५० से अधिक शिक्षाविदों का तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। यह शिविर भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा प्रकोष्ठ की देखरेख में चल रहा है। इसमें मप्र, झारखंड, उत्तराखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब सहित विभिन्न राज्यों से आये शिक्षाविद सम्मिलित हैं। 

शिविर के प्रथम दिन प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए गायत्री परिवार प्रमुख डॉ प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि भारतीय संस्कृति का वैभवपूर्ण इतिहास चिरकाल से गरिमामय रहा है। भारतीय संस्कृति का जन्म वेदों के साथ जुड़ा है। वेद सभी धर्मों के मूल हैं। वेद में समस्त समस्याओं का समाधान निहित है। वेद अर्थात ज्ञान। ज्ञान की आराधना से ही मनुष्य जीवन ऊंचा उठता है। 

देसंविवि के कुलाधिपति डॉ पण्ड्याजी ने कहा कि श्रेष्ठ व्यक्तियों के पास बैठने से जो ज्ञान मिलता है, उसी से व्यक्ति, परिवार व समाज का भला हो सकता है। समाज विकास व संस्कृति रक्षा हेतु अनेक कर्मवीर नैष्ठिक साधक तैयार करने वाले स्वामी विवेकानंद जी के सृजन विचारों के उद्धरणों के माध्यम से डॉ पण्ड्याजी ने पतन की ओर जा रही युवा पीढ़ी को संभालने हेतु शिक्षाविदों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि युवाओं को भारतीय संस्कृति के धागे में पिरोया जाना चाहिए, ताकि वे देवताओं, संतों और मनीषियों के इस देश के समग्र विकास में अपना योगदान दे सकें। 

प्रज्ञा अभियान के संपादक श्री वीरेश्वर उपाध्याय ने समग्र क्रांति के अग्रदूत युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा प्रवर्तित महत्त्वपूर्ण योजनाओं व विभिन्न रचनात्मक कार्यक्रमों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। श्री उपाध्याय ने शिक्षाविदों को सभ्य सुशिक्षित युवा को समर्थ, समृद्ध और स्वच्छ भारत के निर्माण में समय लगाने हेतु प्रेरित करने की बात कही। वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री कालीचरण शर्मा ने सृजन शिल्पियों की रीति- नीति विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। 

शिविर संचालक के अनुसार इस शिविर में सन् २०१४ के कार्यों की समीक्षा तथा २०१५ की कार्य- योजनाओं पर चर्चा की जायेगी। मंच संचालन अतुल द्विवेदी ने किया। इस अवसर पर देश भर से आये चयनित शिक्षाविदों के अलावा शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय परिवार भी उपस्थित थे। 


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