विद्यार्थियों में संस्कृति प्रेम जगाने का दायित्व शिक्षकों पर : एच पी सिंह

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में देशभर के शिक्षाविदों की तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन सम्पन्न हुआ। कार्यशाला के विदाई सत्र को संबोधित करते हुए शांतिकुंज व्यवस्थापक गौरीशंकर शर्मा ने ‘शिक्षकों का व्यक्तित्व कैसा हो’ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षक अगर सच्चे राष्ट्रनिष्ठ विद्यार्थी का गठन करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम उन्हें अपने ही व्यक्तित्व में राष्ट्रनिष्ठा विकसित करनी होगी। क्योंकि शिक्षा का जितना प्रभाव विद्यार्थियों में पड़ता है, उससे कहीं ज्यादा प्रभाव व्यक्तित्व का पड़ता है। उन्होंने कहा कि प्रभावशाली व्यक्तित्व ही भावी पीढ़ी का नवनिर्माण कर सकते हैं। जिनका स्वयं का चरित्र चिन्तन ठीक नहीं, वे सच्चरित्र नागरिक गढ़ने में सफल नहीं हो सकते। श्री शर्मा ने प्रतिभागी शिक्षकों को सजग करते हुए कहा, हमें अगर शिक्षक के रूप में व्यक्तित्व गढ़ने का अवसर मिला है तो उसका सही उपयोग करना चाहिए और अपने व्यक्तित्व को ऐसा प्रभावी, प्रामाणिक और पारदर्शी बनाना चाहिए जिससे हमारी वाणी ही नहीं, अपितु हमारा व्यक्तित्व अनुकरण की प्रेरणा प्रस्तुत करे।

विधि विशेषज्ञ श्री एच. पी. सिंह ने शान्तिकुंज के भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा विभाग द्वारा देशभर में चलायी जा रही भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का क्या महत्त्व है? शिक्षक वर्ग इससे किस तरह लाभ उठा सकते हैं? सांस्कृतिक उन्नयन के लिए शिक्षकों की क्या जिम्मेदारी होनी चाहिए? जैसे विषयों पर चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति ही विश्व में एक मात्र ऐसी गौरवमयी संस्कृति है जो युगों से धरती को नर-रत्न प्रदान करती आयी है। आज स्कूलों में शिक्षा तो दी जाती है, पर संस्कृति की गौरव गरिमा की उपेक्षा होती है। विद्यार्थियों में सांस्कृतिक सम्वेदना जगाने व सोच में सांस्कृतिक प्रेम पैदा करने का दायित्व शिक्षक आसानी से पूरा कर सकते हैं और उन्हें करना ही चाहिए। श्री सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का विश्वव्यापी आयोजन इसी उद्देश्य से हो रहा है जिसका सत्परिणाम अवश्य ही आने वाले समय में सामने आएगा।

 गौरतलब है कि शांतिकुंज द्वारा संचालित भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में पचास लाख से अधिक विद्यार्थी प्रति वर्ष भाग लेते हैं और उनके जीवन में अभीष्ट परिवर्तन भी देखे जा रहे हैं। इसके अलावा भासंज्ञाप विभाग के वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने भी कर्यशाला को संबोधित किया। तीन दिन तक चली कार्यशाला में प्रतिभागी शिक्षकों ने वर्तमान शिक्षा तथा मूल्यपरक शिक्षा, वर्तमान शिक्षा और भारतीय संस्कृति, विद्यार्थियों में बढ़ता पाश्चात्य प्रभाव व भारतीय संस्कृति के प्रति घटता रूझान, विद्यार्थियों से जुड़ी विभिन्न समस्याएँ तथा उनका निराकरण कैसे हो? युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा की गयी सर्वांगपूर्ण शिक्षा पद्धतियों की संकल्पना तथा उनके साकार होने से सम्बन्धित प्रभावी मार्गदर्शन आदि विषयों पर सविस्तार जानकारियाँ प्राप्त कीं। प्रतिभागी शिक्षाविदों में मप्र, झारखंड, उत्तराखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब सहित विभिन्न राज्यों से आये ४५० से अधिक शिक्षाविद शामिल रहे। मंच संचालन अतुल द्विवेदी ने किया।



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