देसंविवि का २६वाँ ज्ञान दीक्षा समारोह 
फार्मूलों से नहीं, जीवन अनुभव से चलता है : डॉ विनय पाठक 

अपने अनुठे पाठ्यक्रम संचालन के चलते प्रख्यात देवसंस्कृति विवि का २६वाँ ज्ञान दीक्षा समारोह सम्पन्न हुआ। इस अनुष्ठान में देसंविवि विवि मे चलाये जा रहे ५ सर्टिफिकेट कोर्स के छात्र- छात्राओं एवं आचार्यों ने मिलकर संग- संग चलने एवं साथ- साथ विद्याध्ययन में जुटने हेतु संकल्प सूत्र में बंधे, वहीं चयनित छात्र- छात्राओं को देसंविवि के प्रतीक चिन्ह एवं उपवस्त्र भेंट किये गये। 

ज्ञानदीक्षा समारोह के अध्यक्ष देसंविवि के कुलाधिपति डॉ प्रणव पण्ड्या जी ने कहा कि समस्त समस्याओं की जड़ अज्ञानता है। इसी को दूर करने के उद्देश्य से हमारे ऋषियों- महापुरुषों ने देवालय, आरण्यक, तीर्थ, गुरुकुल व आश्रम जैसे संस्थानों की स्थापना व उनका संचालन किया करते थे, जिसके माध्यम से वहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने की कला से दीक्षित व शिक्षित किया जाता था। आज उन्हीं परंपराओं का  निर्वहन करते हुए देवसंस्कृति विवि में अध्ययनरत विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ- साथ विद्या से नहलाकरा उन्हें प्रखर बनाया जाता है जिससे वे सफलता की सीढ़ी- दर सीढ़ी चढ़ते जाएँ। उन्होंने कहा कि विद्या अर्थात् जीवन जीने की कला से ही मनुष्य का जीवन निखरता व सार्थक होता है। कुलाधिपति डॉ पण्ड्या जी ने कहा कि देसंविवि का मुख्य उद्देश्य ज्ञान की खेती है। अपने जीवन रूपी जमीन में उन्नत किस्म की बीज यानी सद्ज्ञान को बोने से वह प्रकाश स्तंभ की तरह रोशनी देता है। उन्होंने कहा कि सद्ज्ञान का नियमित उपासना करने से विवेक की वृद्धि होती है और दूरदर्शिता आती है जो कर्मकौशल की कुँजी है। 

मुख्य अतिथि महावीर वर्धमान मुक्त विश्वविद्यालय, कोटा के कुलपति डॉ विनय पाठक ने कहा कि मनुष्य का जीवन फार्मूलों से नहीं, अच्छे अनुभवों के साथ चलता है। उन्होंने उच्च शिक्षण संस्थानों में नैतिक मूल्यों का समावेश करने की वकालत करते हुए कहा कि इंजीनियरिंग, मेडिकल, आईआईएम जैसे संस्थानों के विद्यार्थियों की सोच में नैतिकता व राष्ट्रीयता का भाव पैदा करना चाहिए, ताकि वे नीति पूर्वक समाज विकास में सहयोगी बन सके। इससे पूर्व कुलपति श्री शरद पारधी ने कहा कि विद्यार्थी जीवन मनुष्य जीवन का स्वर्णिम काल होता है। इसी आयु में विद्यार्थी अपने भविष्य व व्यक्तित्व को गढ़ते हैं। उन्होंने समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी व बहादुरी को जीवन में विकसित करने के सूत्र दिये। प्रति कुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि युवाओं में सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के साथ- साथ विद्या भी आवश्यक है और देवसंस्कृति विवि के पाठ्यक्रमों के माध्यम से विद्याथियों को इसी ढाँचे में ढाला जाता है। कार्यक्रम के समापन अवसर पर कुलसचिव संदीप कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया। मंच संचालन गोपाल शर्मा ने किया। तो वहीं ज्ञानदीक्षा का वैदिक कर्मकाण्ड सूरज प्रसाद शुक्ल ने संपन्न कराया तथा कुलाधिपति ने दोष रहित विद्याध्ययन के सूत्रों का संकल्प दिलाया। 

इस अवसर पर देवसंस्कृति विवि के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल के पाँचवें अंक का विमोचन किया गया। इससे पूर्व मुख्य अतिथि डॉ पाठक को कुलाधिपति डॉ पण्ड्या ने युगसाहित्य एवं स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मानित किया। इस समारोह में नवागन्तुक विद्यार्थियों के अलावा पत्रकार बन्धु, देसंविवि परिवार, शांतिकुंज के अंतेवासी कार्यकर्ता एवं अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। 

नागपुर की एकता विजय बालापुरकर पेशे से इंजीनियर हैं। समाजोत्थान हेतु देसंविवि के आवाहन सुन एकता देसंविवि से जुड़ी। वे कहती हैं कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई एवं इंजीनिरिंग कालेजों में पढ़ाने के अपने अनुभव  को पैनी करने के लिए इस विवि के योग पाठ्यक्रम को चुना है। इंजीनियरिंग में मैंने केवल शिक्षा (डिग्री) पाई है, योग के माध्यम से यहाँ विद्या (जीवन जीने की कला) का अध्ययन कर सर्वांगीण विकास कर पाऊँगी, ताकि समाज को अपनी प्रतिभा का पूर्ण लाभ दे सकूं। आंध्र प्रदेश के सुधाकर, बिहार के सूर्य प्रकाश त्रिपाठी आदि कई विद्यार्थी उच्च शिक्षित एवं नौकरी पेशा होने के बावजूद अपने अंदर के खालीपन को दूर करने के लिए देसंविवि से जुड़े हैं।






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