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स्वाईन फ्लू से कैसे बचें? 

स्वाईन फ्लू का रोग आज विश्व मानव के सामने ऐसा खतरा बनकर उभरा है कि उससे निपटने के लिए विश्व के मूर्द्धन्य चिकित्सा वैज्ञानिकों को भी पसीना आ रहा है। यह कभी भी- कहीं भी होने वाले आतंकी हमलों से कम खौफनाक नहीं है। परिवार से लेकर समाज और राष्ट्रीय स्तर तक की अर्थ- समस्या और प्रगति के रास्ते का रोड़ा बना सामाजिक कलह से भी यह ज्यादा भयंकर है जो किसी को भी, कभी भी शिकार बना लेता है। अवश्य ही इससे निपटने के लिए विश्व स्तरीय जागरूकता की आवश्यकता है। 

स्वाईन फ्लू की गम्भीरता की ओर इंगित करते ये शब्द देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या के हैं, जिन्हें उन्होंने विवि के समग्र स्वास्थ्य प्रबन्धन केन्द्र के स्टाफ के सामने, स्वाईन  फ्लू जैसी समस्याओं से निजात पर रिसर्च से रिलेटेड डिस्कशन हेतु हुई एक भेंट के दौरान प्रकट किए। डॉ. पण्ड्या के निर्देशन में संचालित देसंविवि के इस विभाग तथा अन्य विभागों द्वारा भी इस खास मुद्दे पर सतत खोज चलता रहता है कि मानव समाज को समग्र रूप से स्वस्थ, सबल, सुसंस्कृत और समुन्नत कैसे बनाया जाय? वैज्ञानिकों की तरह यहाँ भी स्वाईन फ्लू से निजात पर कार्य चल रहा है और आशा की जा रही है, राहत के नतीजे अवश्य निकलेंगे। फिलहाल यहाँ स्वाईन फ्लू के लक्षणों पर प्रकाश तथा बचाव के कुछ उपाय सुझाए गये हैं। 

स्वाईन फ्लू एच १ एन १ वायरस के कारण होने वाला एक संक्रमणजन्य रोग है जो किसी भी आयु वर्ग के व्यक्तियों को हो सकता है। यह वायरस दूषित वातावरण, दूषित वायु एवं श्वास- प्रश्वास के माध्यम से संक्रमित होता है। मांसाहार करने वालों में इसकी संभावना ज्यादा रहती है। नशा आदि व्यसन मनुष्य को खोखला और कमजोर बना देते हैं और कमजोरों को रोग आसानी से धर दबोचते हैं, इसलिए व्यसनी भी इससे बच नहीं सकते। 

डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि स्वाईन फ्लू के खौफ से बचना हो तो वातावरण को साफ सुथरा रखना होगा, यज्ञादि माध्यमों का अवलम्बन लेना होगा, सात्विक आहार- विहार अपनाना होगा तथा व्यसन मुक्त रहना होगा। उन्होंने जानकारी दी कि इस तरह की समस्याओं से बचाव व बीमार स्थितियों में लाभ के मद्देनजर शान्तिकुञ्ज एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा विशेष औषधीय हवन सामग्री का निर्माण वर्षोर्ं पूर्व किया  जा चुका है और प्रयोग में भी लायी जा रही है जिसके परिणाम अच्छे आ रहे हैं। ब्रह्मवर्चस रिसर्च सेंटर में औषधीय सामग्रियों द्वारा हवन से वातावरण एवं मानवीय स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस पर गहन शोध हुआ है और अच्छे परिणाम भी सामने आए हैं। नियमित यज्ञ करने वालों पर रोगाणुओं का आक्रमण कम होता है, वह संक्रमण से बच जाता है। औषधीय हवन से वातावरण में फैले रोगाणु नष्ट होकर वायु शुद्धि होती है और मनुष्य को ताजा शुद्ध ऑक्सीजन की प्राप्ति होती है जिससे स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसीलिए ऋषियों ने यज्ञ परम्परा का प्रचलन किया है। 

ज्ञातव्य हो कि अखिलविश्व गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या के निर्देशन में देश के कई प्रभावित राज्यों, जैसे गुजरात, राजस्थान आदि के शक्तिपीठों में गायत्री परिजनों द्वारा स्वाईन फ्लू के दुष्प्रभावों से बचने हेतु प्राथमिक बचाव- उपचार के रूप में निःशुल्क वनौषधीय क्वाथादि सेवन का व्यापक अभियान चलाया जा रहा है और निम्रांकित सुझाव भी दिए जा रहे हैं। 

स्वाईन फ्लू के लक्षण 

संक्रमण होने पर तेज बुखार, सिरदर्द, ठण्ड लगना, कँपकँपी, गले में खरास, छींक आना, नाक से लगातार पानी बहना, साँस लेने में कठिनाई, थकान इत्यादि हैं। 

बचाव के उपाय/सावधानियाँ— 

आयुर्वेद के अनुसार इस ऋतु- सन्धि काल में श्वास, काश एवं कफ व्याधियों की सम्भावना ज्यादा रहती है, इसलिए इसी हिसाब से सावधानी बरतनी होगी। अतः— 

-उन व्यक्तियों को अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है जिन्हें बार- बार सर्दी जुकाम होता है। 
-जिन्हें वेदर एलर्जी, एलर्जिक अस्थमा या एलर्जिक रिनाइटिस की प्रॉबलम हो, ऐसे व्यक्तियों को भी विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है। 
-स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। पीड़ित व्यक्ति के प्रयोग में लाये जाने वाले वस्त्र तौलिया, रूमाल, बर्तन आदि को साफ रखें, उनका उपयोग अन्य लोग न करें। खाँसते- छींकते समय मुँह ढके रखें, रूमाल का प्रयोग करें। 
-बचाव हेतु नियमित प्राणायाम करें। सम्भव हो तो नियमित हवन (यज्ञ) भी करें। 
-गन्दगी, संक्रमणयुक्त स्थान एवं पीड़ित व्यक्तियों के घरों के आसपास हवन अवश्य करें। सार्वजनिक, सामूहिक रूप से हवन अवश्य करें। 
-कपूर, लौंग, गुड़ का बूरा, नीमपत्र, जावित्री, तिल, घी का हवन अत्यन्त लाभकारी। 
-तुलसी पत्र एवं आज्ञाघास (जरांकुश) उबालकर पियें। 
-दालचीनी चूर्ण शहद के साथ अथवा दालचीनी की चाय लाभदायक। 
-तुलसी पत्र, कालीमिर्च उबाल- छानकर पियें। दिन भर सामान्य जल की जगह तुलसीयुक्त गुनगुने जल का सेवन करें। 
-हल्दी इस रोग में विशेष लाभकारी है। नियमित हल्दी युक्त दूध अथवा हल्दी, सेंधानमक, तुलसी पत्र पानी में उबालकर पीना भी फायदेमन्द है। 
-लेमन टी, प्रज्ञापेय (बिना दूध का) या ब्लैक टी में नींबू की कुछ बूँदें डालकर पियें। 
-तरल आहार का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करें। ठण्डा, गरम एक साथ न लें, विरुद्ध आहार- विहार से बचें। 
-विटामिन सी से भरपूर आहार लाभदायक है। आँवला विटामिन सी का अच्छा स्रोत है। 
-आयुर्वेदिक औषधि ‘षडंग पानीय’ उबालकर पियें। यह बाजार में तैयार भी मिलती है। 
-पसीना आने पर तुरन्त कपड़े न निकालें, न ही तुरन्त पंखे या ठण्डे जल का प्रयोग करें। 
-नमकयुक्त गुनगुने जल से स्नान लाभदायक है। 
-दूषित जल व दूषित अन्न का प्रयोग न करें, वासी और गरिष्ठ भोजनों से बचें। 
-गिलोय, कालमेध, चिरायता, भुईंआँवला, सरपुंखा, वासा इत्यादि जड़ीबूटियाँ लाभदायक हैं। 


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