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जीवन की सार्थकता प्रेम के विस्तार में और संगठन की सार्थकता विश्वहित हेतु कार्य करने में : डॉ. पण्ड्या
अखिल विश्व गायत्री परिवार का केन्द्र शांतिकुंज हरिद्वार में पाँच दिवसीय संगठन साधना शिविर शृंखला के अन्तर्गत १३वाँ प्रान्तीय शिविर चल रहा है। इन शिविरों का उद्देश्य परिजनों में एकता-समता और प्यार-सहकार का भाव जगाना है जिससे संगठन को मजबूती मिले। १४ फरवरी से शुरू हुए इस शिविर में दक्षिण-पूर्व जोन में आने वाले ओड़िशा प्रान्त के चार सौ पैंसठ परिजन भाग ले रहे हैं। इस शिविर को संबोधित करते हुए शांतिकुंज मनीषी वीरेश्वर उपाध्याय ने संगठन की रीति नीति पर मार्गदर्शन देते कहा कि जीवन अनुशासन से बनता है और संगठन अनुशासन से चलता है। विश्व का प्रत्येक घटक अनुशासन में बँधा है। जहाँ अनुशासन तोड़ा जाता है, वहाँ बिखरावजन्य अशक्ति पैदा हो जाती है जिसके चलते उल्लेखनीय कार्य सम्भव नहीं हो पाता और प्रगति का मार्ग बाधित हो जाता है। 

शिविर को संबोधित करते हुए गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा, संगठन एकजुट होने, सामूहिकता के भाव से काम करने और मिलजुलकर रहने से बनता और टिकता है। उन्होंने एकजुटता का हवाला देते हुए कहा कि सींक सींक मिल बुहारी बनती, धागा धागा मिल कपड़ा बनता, ईंट ईंट मिल भवन और बूँद बूँद मिल सागर बनता है। इसी तरह जन जन मिलकर संगठन बनता है। पर यह मजबूत तब होता है जब इसके सभी जनों में पारस्परिक प्रेम और सहकार का भाव हो। 

    उन्होंने ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल के १५१वाँ सूक्त-संज्ञान सूक्त—संगच्छध्वं संवदध्वं संवोमनांसि जानताम् का उद्धरण देते हुए कहा, संगठन साथ साथ होकर, एक ही उद्देश्य को लेकर मिल-जुलकर स्नेह प्यार पूर्वक बात करने और एकमत होकर चलने से सशक्त बनता है। डॉ. पण्ड्या ने कहा यह सूक्त परिवार, समाज और राष्ट्र की मजबूती का सूत्र सिखाता है। उन्होंने कहा परिवार, समाज या राष्ट्र तभी बिखरते हैं जब उनमें संगठन, एकता और पारस्परिक सद्भाव नहीं होता। हम सब एक हो जाएँ, एकजुट होकर सोचें और काम करें तो हमारा संगठन, हमारा समाज और राष्ट्र इतना सशक्त हो जाए कि फिर संसार की कोई भी ताकत हिला न सके ।

    डॉ. पण्ड्या ने परिजनों को व्यष्टि से समष्टि भाव की ओर विस्तार की प्रेरणा देते हुए कहा कि हमें केवल अपने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि दूसरों के बारे में, परिवार-पड़ोस, समाज और राष्ट्र के बारे में भी सोचना चाहिए और सम्भव हो तो इससे भी आगे बढ़कर विश्व मानवता के कल्याण की ओर कदम बढ़ना चाहिए। इसमें जीवन की भी सार्थकता है और संगठन की भी। 

    डॉ. पण्ड्या ने कहा, जीवन की सार्थकता प्रेम-आत्मीयता के विस्तार में और संगठन की सार्थकता विश्वकल्याण हेतु कार्य करने में है। उन्होंने बुराई से बचने और अच्छाई ग्रहण करने की प्रेरणा देते कहा, हमें भौंरों की तरह फूलों का पराग बटोरना चाहिए न कि गुबरीले की तरह गोबर से सने रहें। 

    उन्होंने ज्ञान वृद्धि का उपाय बताते हुए कहा, सोचकर बोलें, जो सुना उस पर मनन करें, जितना मनन किया उस पर निदिध्यासन करें और जितना निदिध्यासन किया उस पर ध्यान रखें तो ज्ञान अवश्य बढ़ेगा। फिर ज्ञान से आत्मवत्सर्वभूतेषु का बोध होगा और इसी भाव से ही प्रेम-प्यार का जागरण-गठन होगा जो सही मायने में सही संगठन को जन्म देगा जो स्वतन्त्र संगठन न रहकर विश्व संगठन के रूप में परिणत होगा। उन्होंने कहा युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने इसी सामूहिकता के जागरण का सपना देखा था जिसे उन्होंने सतयुग का नाम दिया और जिसे साकार करने में विराट गायत्री परिवार निरन्तर जुटा है। 
 
इस शिविर को शांतिकुंज जोनल प्रभारी कालीचरण शर्मा, शक्तिपीठ प्रकोष्ठ के केसरी कपिल आदि कई वरिष्ठ विद्वानों ने संबोधित किया। 



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