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संगठन के लिए पारदर्शी व्यक्तित्व चाहिए:  उपाध्याय 
सही व्यवस्थाओं के लिए सही सूझबूझ चाहिए : गौरीशंकरजी 

हरिद्वार २२ फरवरी। अखिल विश्व गायत्री परिवार का केन्द्र शांतिकुंज हरिद्वार में संगठन साधना शिविर शृंखला के अन्तर्गत १४वाँ पाँच दिवसीय प्रान्तीय शिविर चल रहा है। १९ फरवरी से शुरू हुए इस शिविर में पूर्व जोने में आने वाले विहार व झारखण्ड के आठ जोन तथा पूर्वोत्तर जोन में सिक्किम, आसाम, मिजोरम, गुवाहाटी, नागालैंडअरुणाचरम् को मिलाकर हजार से अधिक परिजन भाग ले रहे हैं। कल सायं मुख्य सभागार में प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने ऋग्वेदीय संज्ञान सूक्त ‘संगच्छध्वं संवदध्वं’ तथा गायत्री मन्त्र पर संयुक्त रूप से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा ये सूक्त और मन्त्र हमें समन्वय संगठन की शिक्षा देते हैं। उन्होंने कहा, प्रणव और गायत्री मन्त्र से लेकर तमाम मन्त्र विभिन्न स्वरों और वर्ण समूहों के समन्वय- संयोजन से बने हैं और उसी समन्वयजन्य एकता से ही शक्ति पैदा होती है जो कि साधक को शक्तिमान बनाती है। हमें इनसे समन्वय की सीख लेनी चाहिए। 

उन्होंने कहा उत्तम स्वास्थ के लिए जिस प्रकार विविध शक्तिवर्द्धक वनौषधियों और रसायनों के संयोग- दवा आदि बनाये गये हैं, उसी प्रकार समाज को शक्तिशाली बनाने के लिए सबको संगठित होना चाहिए। उन्होंने गायत्री परिवार के जनक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का उदाहरण देते हुए कहा कि पूज्य आचार्यश्री ने गायत्री परिवार का निर्माण इसी समन्वय सहगमन की भाव सम्वेदना को जन- जन में जगाने के उद्देश्य से किया है। उनके अनुसार समन्वय से ही संगठन मजबूत बनता है। समन्वय से ही परिवार, समाज और राष्ट्र चलता है। हमें अपने परिवार, समाज और राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए संगठित होना चाहिए। 

उन्होंने गौ- सुरक्षा, नारी अत्याचार व आतंकी कारनामों पर गहरा दुःख व चिन्ता व्यक्त की और कहा, हमारी उपलब्धियाँ और प्रगतियाँ तभी सार्थक हैं जब हमारी माताएँ, बहिनें, बच्चे और घर- परिवार सुरक्षित रहें। उन्होंने २०१२ की दिल्ली दुर्घटना से लेकर अब तक हुई निन्दनीय घटनाओं का लम्बा दुःखद सिलसिला- छब्बीस हजार के करीबन बलात्कारी घटनाओं के बड़े रिकार्ड की बात कही और पीड़ा जाहिर करते हुए देशवासियों को झकझोरा कि अब तो जागो भाई! कब तक सोये रहोगे ?

डॉ. पण्ड्याजी ने रामायण काल का जिक्र करते हुए प्रश्न रखा कि जब धरती पर असुरों का अत्याचार बढ़ गया, तब भगवान राम ने वानर भालुओं और गिद्धों के समूह का संगठन बनाकर उनका सफाया किया। आज जब समाज में अनाचार, अत्याचार, बलात्कार और भ्रष्टाचार चरम सीमा पर हैं तो हम सजग और संगठित क्यों नहीं? उन्होंने इनसे निपटने के लिए सभी सम्प्रदायों के सदस्यों को एकजुट होने और मिलजुल कर कार्य करने का आह्वान किया।

इससे पूर्व मनीषी वीरेश्वर उपाध्यायजी ने कहा, संगठन व्यक्तित्व की पारदर्शिता से बनता और टिकता है। लोभ- लालच, दुराग्रहों, धाँधलियों और अहंकारों से न समाज का भला होता है न राष्ट्र का। व्यवस्थापक गौैरीशंकर शर्माजी ने कहा, व्यवस्थाएँ सूझबूझ से चलती हैं और सूझबूझ साधना, स्वाध्याय और सत्संग से पैदा होती है। संगठन एक सुव्यवस्था है जिसके लिए सही सूझबूझ चाहिए।

इसके अलावा शिविर को शांतिकुंज के केसरी कपिलजी,  डॉ. ओपी शर्माजी,  डॉ. बृजमोहन गौड़जी,  कालीचरण शर्माजी, नमोनारायण पाण्डेजी, विष्णुभाई पण्ड्याजी, केपी दुबेजी, श्रीमती यशोदा शर्मा आदि कई वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने अलग अलग विषय पर संबोधित किया। 


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