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अंग्रेजों से टक्कर लेने वाले भगतसिंह, राजगुुरुसुखदेव को शहादत दिवस पर दी श्रद्धांजलि
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज में इन दिनों नवरात्र साधना चल रही है जिसमें देशभर से हजारों साधक- साधिकाएँ भाग लेकर अनुष्ठान कर रहे हैं। आज शांतिकुंज के मुख्य सभागार में गायत्री परिवार प्रमुख डॉ . प्रणव पण्ड्याजी ने उन साधकों को साधना के बारे में मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि अपने आचार- विचार और व्यवहार को साध लेने का नाम ही साधना है।

डॉ. पण्ड्याजी ने गायत्री और यज्ञ को परस्पर पूरक बताते हुए कहा कि जीवन में ये दोनों ही होने चाहिए। गायत्री सद्ज्ञान की देवी है और यज्ञ सत्कर्मों का प्रेरक। जीवन में प्रगति इन दोनों के होने से ही होती है। उन्होंने यज्ञ का अर्थ त्याग, सहिष्णुता, दान और करुणा बताते हुए कहा कि माँ जीवन भर यज्ञ करती हैं। जबसे बच्चा माँ के गर्भ में आता है, तभी से उसके जन्म होने और बड़ा होकर मनुष्य बनने तक उनके पालन पोषण रूपी यज्ञ ही माता पिता करते हैं। उन्होंने कहा माता- पिता के उस त्याग बलिदानों की पवित्रता भरी भावनाओं के कारण ही समाज को संस्कारित बच्चे मिलते हैं।

उन्होंने कहा कि आज भावनाओं में पवित्रता न रहने के कारण ही दूषित विचार वाले बच्चे पैदा हो रहे हैं और समाज में आपराधिक गतिविधियाँ बढ़ रही है। दाम्पत्य जीवन में पवित्रता का समावेश कर पुनः संस्कारित पीढ़ियाँ गढ़ी जा सकती हैं। डॉ. पण्ड्याजी ने हवाला देते हुए कहा, गायत्री परिवार के जनक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने इसी संस्कार परम्परा को पुनर्जीवित करने का सूत्र बताया है और विचार क्रान्ति अभियान द्वारा इसी भावना और विचारणाओं के परिमार्जन का प्रयत्न प्रयास निरन्तर चल रहा है, ताकि सभ्य- समाज की रचना की जा सके।

डॉ. पण्ड्याजी ने यज्ञ को दान का पर्याय बताते हुए कहा कि देना ही यज्ञ है। जो देते हैं, दान करते हैं, यथा नेत्रदान, देहदान, धनदान आदि वह सब यज्ञ हैं। उन्होंने गंगा सफाई अभियान, स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण जैसे कार्यों को भी यज्ञ बताते हुए इसमें भागीदारी करने की प्रेरणा दी। उनके अनुसार वह हर कर्म यज्ञ है जिनके करने से मानव समाज का कल्याण होता है। समाज में शान्ति, सद्भाव, मैत्री, प्रेम तथा साहचर्य का भाव जगता है और सच्ची इंसानियत की संवेदना जाग्रत होती है।

उन्होंने कहा कि शरीर के अन्दर इंद्रिय- विशेषताओं एवं चक्र- अधिपतियों के रूपों में विभिन्न देवतागण विराजमान रहते हैं। उनका सदुपयोग करके यज्ञ कर्म को पूरा करना चाहिए। ज्ञान के रूप में सरस्वती, कर्म के रूप में वसु आदि देवता तथा विभिन्न विचारणाओं के रूप में विभिन्न देवशक्तियों का सुनियोजन करके जीवन यज्ञ को सफल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

डॉ .पण्ड्याजी ने कहा कि जो जितना सत्कर्म किया, चाहे अग्रि में आहुतियाँ डाले या न डाले, उसके द्वारा यज्ञकर्म संपादन हुआ समझना चाहिए। उनके अनुसार मनुष्य के समस्त संस्कार यज्ञ से चालू होते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक समस्त जीवन यज्ञमय है, संस्कारमय है। हमारा जीवन यज्ञ से आरम्भ हो और शाम को समाप्त भी यज्ञ से, अर्थात ध्यान उपासना से होना चाहिए। उन्होंने साधना यज्ञ का व्यवहार बताते हुए कहा, प्रातः जागरण के समय आत्मबोध का यज्ञ करें और रात को सोते समय तत्वबोध का यज्ञ करें। हर रात नयी मौत और हर प्रभात को नया जन्म की भावना करना यज्ञ ही है। जो ऐसा यज्ञ करेंगे, उनका जीवन अवश्य सुख शांतिमय होगा। इस अवसर पर अंतिम श्वास तक अंग्रेजों से टक्कर लेने वाले भगत सिंह, राजगुरु, व सुखदेव को याद करते हुए उनकी शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि दी गयी। इस मौके पर देश- विदेश से आये साधक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।






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