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नवरात्रि की पूूर्णाहुति के साथ ही शान्तिकुञ्ज में खेल महोत्सव २०१५ का आगाज हुआ। महोत्सव की शुरूआत गायत्री विद्यापीठ के बच्चों व शांतिकुंज के विभिन्न शिविरों में भाग लेने आये शिविरार्थियों द्वारा निकाली एक विशेष खेल रैली से हुई, जो गायत्री परिवार के संस्थापक द्वय का समाधिस्थल प्रखरप्रज्ञा-सजलश्रद्धा से आरम्भ होकर सप्तर्षि मार्ग होते हुए शांतिकुंज के श्रीरामपुरम् में निर्धारित खेल मैदान में पहुँची। यह महोत्सव २८ मार्च से ४ अप्रैल तक चलेगा। खेल समिति से मिली जानकारी के अनुसार इस खेल सप्ताह में विभिन्न प्रकार के शारीरिक व बौद्धिक खेल खेले जायेंगे एवं आठवाँ दिन प्रतिभागियों को पदानुसार पुरस्कृत किए जायेंगे। शारीरिक खेलों में-बॉली बाल, दौड़ सौ मीटर, रस्साकसी, कुर्सीदौड़, तीनटांग दौड़, लम्बी कूद, गोला फेंक, दण्ड द्वन्द्वयुद्ध, बोरी दौड़, दौड़ २०० मीटर, खोखो, कबड्डी, धीमी साइक्लिंंग, ऊँची कूद, मटका फोड़, योग-आसन प्रतियोगिता आदि हैं। बौद्धिक खेलों में-भाषण, निबन्ध, अन्त्याक्षरी, आध्यात्मिक प्रश्नोत्तरी, खजाने की खोज, कविता पाठ, शास्त्रीय गायन, सुगम गायन, विभिन्न वाद्ययन्त्रों का वादन आदि पर प्रतियोगिताएँ होंगी। साथ ही युगऋषि को जानो एवं हमारा मिशन-विचारक्रान्ति अभियान पर भी अभिव्यक्तियाँ प्रस्तुत की जायेंगी। इस महोत्सव में शान्तिकुञ्ज, ब्रह्मवर्चस एवं गायत्रीकुञ्ज के समस्त कार्यकर्त्ता भाग ले रहे हैं। खेल महोत्सव की शुरूआत करते हुए डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि खेल जीवन को तरोताजा बनाने के लिए अति आवश्यक हैं। खेलों के बिना जीवन बोझिल हो जाता है। खेल सरसता और समरसता बनाये रखते हैं। खेल खेलभावों के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। इसलिए खेलों के आयोजन होते रहने चाहिए और हरेक व्यक्ति को खेलों में भाग लेते रहने चाहिए। मनीषी वीरेश्वर उपाध्याय ने कहा जिन्होंने खेलों के मर्मों को जाना उन्होंने जीवन के मर्म को समझ लिया। क्योंकि जीवन भी एक खेल है और इसे खेल की तरह जीना खेलों से सीख मिलती है। 


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