Published on 2015-04-01


गायत्री विद्यापीठ शांतिकुञ्ज में चल रहे कत्थक नृत्य सेमीनार में बच्चों ने अपनी कला का हुनर दिखाया। जाह्नवी, श्रद्धा, पयश, आहुति, स्तुति, लावण्या, प्रज्ञा आदि बच्चों ने अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। बच्चों ने जयपुर, लखनउ व रागयढ़ घराने पर अपनी प्रस्तुतियां दीं। इसमें नर्तकों ने नृत्त, ठाट, आमद, सलामी, पडन, परमेलु, गत आदि का उपयोग किया। इस नृत्य सेमीनार में विद्यापीठ के 45 बच्चों ने भागीदारी की।

     कत्थक नृत्य के उद्घाटन करते हुए विद्यापीठ की प्रबंध समिति की वरिष्ठ सदस्या श्रीमती शेफाली पण्ड्या ने कहा कि कत्थक नृत्य भारतीय संस्कृति का परिचय देता है। भावों की प्रधानता होने के कारण इसमें एकाग्रता के विकास में सहायक होता है। उन्होंने कहा कि इस नृत्य की विशेषता नृत्य में भाव, हाथों की मुद्रा, अभिनव रस की प्रधानता होती है। देसंविवि सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के प्रभारी डाॅ शिवनारायण प्रसाद ने कहा कि भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार हेतु देसंविवि के साथ अब गायत्री विद्यापीठ जुड़ गया है। कला के माध्यम से संस्कृति के प्रचार में युवाओं की भागीदारी के लिए प्रयास किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में विद्यालयों से लेकर महाविद्यालयों तक के विद्यार्थियों को भी जोड़ा जा रहा है, ताकि भारतीय संस्कृति की ओर बच्चों में रूझान पैदा हो सके। 

     कार्यक्रम के समापन अवसर पर विद्यापीठ के प्रधानाचार्य प्रो0 श्याम नारायण मिश्रा ने कहा कि बच्चों द्वारा कई चक्कर व विभिन्न ताल में जटिल रचनाओं को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुती का यह पहला प्रयास है। कत्थक नृत्य का प्रशिक्षण मानवी वशिष्ठ ने दिया। समापन अवसर पर विद्यापीठ के शिक्षक-शिक्षिकाएं सहित अनेक लोग उपस्थित थे।

 


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