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वैशाखी के पावन अवसर पर गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में २४ जोड़ों ने सात फेरे लिये। इन्होंने दहेज विरोधी अभियान में शामिल होकर एक दूसरे का हाथ थामा। नवदम्पतियों ने इस पवित्र संस्कार में बताये जीवनोपयोगी सूत्रों को जीवन में अपनाने के संकल्प लिये। वहीं ऋषियुग्म की पावन चरण पादुका एवं १९२६ से सतत प्रज्वलित सिद्ध अखण्ड दीपक का दर्शन कर भावी जीवन की सफलता हेतु प्रार्थना की।

हरिद्वार के विपिन यादव सहित सभी वर ने संकल्प व्यक्त किया कि आज से धर्मपत्नी को अर्द्धांगिनी घोषित करते हुए, उसके साथ अपने व्यक्तित्व को मिलाकर एक नये जीवन की सृष्टि करता हूँ। अपने शरीर के अंगों की तरह धर्मपत्नी का ध्यान रखूँगा।

गढ़वाल क्षेत्र से आये एक वर के भाई ने बताया कि शांतिकुंज जैसे पवित्र स्थान में विवाह कराने से संस्कार की महत्ता एवं उपयोगिता समझ में आई। हमारे घर की यह तीसरी शादी है। पहले हुए कार्यक्रम से यह शादी कई मायने में काफी अच्छी रही। हमारे सभी सगे- संबंधियों ने संस्कार की महत्त्व को समझा। एक अन्य वर ने कहा कि मैं यहाँ अपने एक संबंधी की शादी में आया था। संस्कार के बारे में जाना, समझा। तभी से आदर्श विवाह संस्कार कराने का मन बना लिया था।

वहीं एक अन्य वर ने कहा -‘मैंने गायत्री परिवार के जनक पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी की आदर्श भारत की दिव्य स्वप्न को साकार करने की दिशा में एक पग आगे बढ़ाया है। आदर्श विवाह संस्कार दिन में होने से बिजली बचाकर परोक्ष से रूप से सरकार की बचत की है। धन बर्बादी व कई प्रकार की भागदौड़ से भी परिवार बच गया।

संस्कार प्रकोष्ठ के प्रभारी पं० शिवप्रसाद मिश्र ने कहा कि आदर्शों और सिद्धान्तों को यदि पति- पत्नी द्वारा अपना लिया जाए और उसी मार्ग पर चलने के लिए कदम से कदम बढ़ाते हुए अग्रसर होने की ठान ली जाए, तो दाम्पत्य जीवन की सफलता में कोई सन्देह ही नहीं रह जाता। कार्यक्रम संस्कार प्रकोष्ठ के आचार्यों ने वैदिक कर्मकाण्ड के साथ सम्पन्न कराया। इस अवसर पर नवदम्पतियों के अलावा उनके संबंधी भी बड़ी संख्या में मौजूद थे।


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