Published on 2015-01-20

संस्कृत केवल भाषा ही नहीं, परिभाषा भी ः डॉ चिन्मय पण्ड्या

संस्कृत व संस्कृति के साथ गायत्री परिवार का प्रयास सराहनीय ः प्रो चक्रवर्ती

विज्ञजनों ने माना कि संस्कृत का विकास होना ही चाहिए, पाँच वर्ग में पढ़े गये १७० शोध पत्र 

देवभूमि उत्तराखंड की देवनगरी हरिद्वार में देववाणी संस्कृत में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन आज हो गया। देवसंस्कृति विवि के मृत्युंजय सभागार में हुए समापन सत्र में संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किये गये।

विज्ञजनों ने एकमत से स्वीकार किया कि संस्कृत के विकास के लिए देवसंस्कृति विवि में हुई संगोष्ठी से जो बिन्दु उभर कर आये हैं, उसके विकास में सबकी भागीदारी हो। संगोष्ठी में वेद, साहित्य, दर्शन, आगम व व्याकरण वर्ग शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये। प्रतिभागियों ने वेदपाठ, विश्व शांति के लिए हुए दीपमहायज्ञ में भी रुचिपूर्वक भाग लिया। साथ ही प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर में देववाणी संस्कृत के विकास की कामना की।

समापन सत्र को सम्बोधित करते हुए प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि ९७ प्रतिशत भाषाओं की जननी संस्कृत है। संस्कृत केवल भाषा ही नहीं है, वरन् यह भारतीय संस्कृति की एक परिभाषा है। संस्कृत की बढ़ते उपयोग पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि नासा जैसे वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों के इंजीनियस कम्प्यूटर में भी संस्कृत का उपयोग करने लगे हैं। तो वहीं श्रीयंत्र में संस्कृत में ही लिखी जाती है। डॉ पण्ड्या ने कहा कि स्किल डेवलपमेंट सहित विकास के हर पहलुओं के लिए आर्ष ग्रंथों में बहुत कुछ छिपा है। आवश्यकता केवल उसका अध्ययन करने व पालन करने की है।

एनयूपीए के अध्यक्ष प्रो केके चक्रवर्ती ने कहा कि वर्तमान में आध्यात्मिक मूल्यों के साथ नैतिक पतन तेजी से हो रहा है। इस विकराल स्थिति में भी संस्कृत व संस्कृति के साथ गायत्री परिवार सराहनीय प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि देसंविवि के विद्यार्थियों के जीवन में शैक्षणिक व आध्यात्मिक विकास के गुण मुझे दिखाई भी दे रहा है। 

हिमाचल प्रदेश विवि के पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो वीके मिश्रा ने कहा कि भारतीय संस्कृति के विकास में युवाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस बीच उन्हें देवसंस्कृति विवि में हुई संस्कृत संगोष्ठी से एक नई राह दिखाई है।

समापन सत्र में प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए भाषा विभागाध्यक्ष प्रो राधेश्याम चतुर्वेदी ने बताया कि वैदिक साहित्य में राष्ट्रीय भावना, वेदों में स्त्रियों का महत्त्व, कश्मीरी शैव दर्शन में परावाद, संस्कृत के काव्य शास्त्रीय ध्वनि सिद्धांतों का हिन्दी पर प्रभाव जैसे अनेक विषयों पर प्रतिभागियों ने अपने शोध प्र्र्रस्तुत किये। कार्यक्रम के अंत में सेमिनार में आर्ष ग्रंथों के विभिन्न पक्षों पर प्रस्तुत किये गये शोध पत्र को विश्व समुदाय के बीच पहुंचाने पर बल दिया गया। चयनित प्रतिभागियों को स्मृति चिह्न एवं प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर डॉ गायत्री किशोर, प्रो वेदप्रकाश शास्त्री, प्रो जयदेव वेदालंकार, प्रो. सत्यदेव, प्रो मानसिंह, डॉ इंदु, डॉ टंकेश्वरी के अलावा भाषा विभाग के आचार्य एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।



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