Published on 2015-05-17

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के मुत्युजंय सभागार में दो दिवसीय संस्कृत संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। 18 से 19 अप्रैल की तिथि में आयोजित हुई इस सेमीनार का देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्याजी, उत्तराखंड सरकार के मुख्य सचिव श्री एन रविशंकर ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन कर शुभारंभ किया। 

 
सेमीनार में आये विद्वज्जनों ने संस्कृत भाषा के विकास के लिए सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता को एक स्वर में स्वीकार किया। वेद, साहित्य, दर्शन, आगम व व्याकरण वर्ग में शोधार्थियों अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये। अतिथियों ने सेमीनार की - स्मारिका का भी विमोचन किया।

कार्यक्रम के शुभारंभ के अवसर पर कुलाधिपति आदरणीय डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि संस्कृति का रक्षा करनी हो, तो संवेदना की रक्षा जरूरी है। संवेदना की वाणी संस्कृत है। समाज में आज जो कुछ घटित हो रहा है, उसका बड़ा कारण संस्कृत की उपेक्षा है। वेद, उपनिषद् आदि ज्ञानार्जन की पुस्तकें देववाणी में है और आज की युवापीढ़ी को उन्हें जानने- समझने के लिए संस्कृत सीखेन को प्रेरित करना होगा।

मुख्य अतिथि श्री एन. रविशंकर ने उत्तराखंड आगमन पर सभी का स्वागत करते हुए देवभूमि उत्तराखंड, देवनगरी हरिद्वार और देव संस्कृति विश्वविद्यालय में देववाणी संस्कृत में सेमीनार से समाज को काफी उम्मीद है। उन्होंने इस सेमीनार में उपस्थित विद्वज्जनों की ओर आशा भरी निगाह से देखते हुए कहा कि अब निश्चित ही संस्कृत के विकास को हम देख पायेंगे। संस्कृति का सारांश ही वसुधैव कुटुंबकम् है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में सेमीनार में पहुँचे एनयूपीए के अध्यक्ष प्रो. के.के. चक्रवर्ती ने कहा कि वर्तमान में आध्यात्मिक मूल्यों के पतन के साथ नैतिक पतन भी तेजी से हो रहा है। इस विकराल स्थिति में भी संस्कृत व संस्कृति के प्रति गायत्री परिवार सराहनीय कार्य कर रहा है। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के जीवन में शैक्षणिक व आध्यात्मिक विकास के गुण मुझे दिखाई दे रहे हैं। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो. वी.के. मिश्रा ने कहा कि भारतीय संस्कृति के विकास में युवाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस बीच उन्हें देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की इस सेमीनार ने नई राह दिखाई है।

कार्यक्रम के समापन के अवसर पर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि ९७ प्रतिशत भाषाओं की जननी संस्कृत है। संस्कृत केवल भाषा ही नहीं है, वरन् यह भारतीय संस्कृति की एक परिभाषा है। आज नासा जैसे वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों के इंजीनियर्स भी कम्प्यूटर में संस्कृत भाषा का उपयोग करने लगे हैं। श्रीयंत्र संस्कृत में ही लिखा जाता है।

उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. महावीर अग्रवाल ने कहा कि संस्कृत सम्पूर्ण विश्व में प्रतिष्ठिïत हो, इस निमित्त हम सभी को सतत प्रयास करते रहना चाहिए।

संगोष्ठी के दौरान अतिथियों के बीच प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर में भव्य दीपमहायज्ञ हुआ। यज्ञाचार्यों, छात्रों ने दीपयज्ञ की मार्मिक प्रस्तुति के द्वारा पूज्य गुरुदेव एवं युग निर्माण मिशन की विचारधाराओं से अवगत कराया। हजारों दीपों के प्रज्वलित होते ही मंदिर स्थल जगमगा उठा। दीपमहायज्ञ की पूर्णाहुति के अवसर सभी विद्वज्जनों ने संस्कृत के विकास में सामूहिक प्रयास करने का संकल्प लिया।

सेमीनार के समापन सत्र में भाषा विभागाध्यक्ष प्रो. राधेश्याम चतुर्वेदी ने सभी का आभार प्रकट करते हुए कार्यक्रम की विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। प्रो. जयदेव वेदालंकार, प्रो वेदप्रकाश शास्त्री, प्रो. सत्यदेव, डॉ गायत्री किशोर त्रिवेदी, डॉ इन्द्रेश पथिक आदि की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।     


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