Published on 2015-09-21
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विश्व शांति दिवस अथवा अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस प्रत्येक वर्ष २१ सितम्बर को मनाया जाता है। यह दिवस सभी देशों और लोगों के बीच स्वतंत्रता, शांति और खुशी लाने का एक आदर्श दिवस माना जाता है। विश्व शांति दिवस मुख्य रूप से पूरी पृथ्वी पर शांति और अहिंसा स्थापित करने के लिए मनाया जाता है। शांति सभी को प्यारी होती है। इसकी खोज में मनुष्य अपना अधिकांश जीवन न्यौछावर कर देता है। किंतु यह काफ़ी निराशाजनक है कि आज इंसान दिन- प्रतिदिन इस शांति से दूर होता जा रहा है। आज चारों तरफ़ फैले बाज़ारवाद ने शांति को व्यक्ति से और भी दूर कर दिया है। पृथ्वी, आकाश व सागर सभी अशांत हैं। स्वार्थ और घृणा ने मानव समाज को विखंडित कर दिया है। यूँ तो विश्व शांति का संदेश हर युग और हर दौर में दिया गया है, लेकिन इसको अमल में लाने वालों की संख्या बेहद कम रही है। 

यमन, सीरिया से लेकर विश्व के अधिकतर देश इन दिनों अशान्त हैं। संसार में हिंसा की आग बड़ी तेजी से फैल रही है। हत्या मारपीट, उपद्रव, दंगे, लूटमार और अपराधों में बड़ी तेजी से बाढ़ आ रही है। मनोवैज्ञानिकों और प्रकृति विज्ञानियों की दृष्टि में इसका एक बड़ा कारण जनसंख्या का बहुत अधिक बढ़ जाना है। पिछले दिनों ब्रिटेन के दो प्रसिद्ध समाज शास्त्री क्लेअर रसेल और  डब्ल्यू एस रसेल ने कई मामलों का अध्ययन करने के बाद जो निष्कर्ष प्राप्त किये, उनसे यही सिद्ध होता है कि इस तरह की घटनाओं के मूल में वस्तुतः प्रकृति प्रेरणा ही काम कर रही है। इन दिनों छुट पुट कारणों से उत्पन्न हुए मन मुटाव भी भयंकर हिंसावृत्ति के रूप में उभर रहे है और उनकी चपेट में प्रतिद्वन्द्वियों के निरीह बाल बच्चे भी आ जाते हैं। धन के लालच में चोरी ठगी की अपेक्षा सफाया करके निश्चिन्तता पूर्वक लाभान्वित होने की आपराधिक प्रवृत्तियाँ पिछले दिनों तेजी से बढ़ी हैं। क्योंकि हिंसा वृत्ति इतनी उग्र होती जा रही है। इस पर विभिन्न दृष्टियों से विचार और कई परीक्षण करने के बाद यही सिद्ध हुआ कि जनसंख्या का दबाव मनुष्य को उथला, असहिष्णु और असंतुलित बना देता है, इसी कारण लोग जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं अथवा हत्या और हिंसा करने में जरा भी नहीं झिझकते। 

दुनियाँ में शान्ति की स्थापना के लिए एकता और समता की आवश्यकता है। एकता की स्थापना के लिए समता आवश्यक है। एक समर्थ और दूसरा असमर्थ रहे तो समर्थ अहंकारिता प्रदर्शन के लिए, अपहरण के लिए उद्यत रहेगा। जो असमर्थ है, वह अपने साथ अनीतिपूर्ण भेदभाव बरते जाने से निरन्तर असंतुष्ट रहेगा। विग्रह का प्रधान कारण यही है। कारण के रहते न विग्रह का निवारण हो  सकता है, न निराकरण। आये दिन युद्ध और विग्रह बने ही रहेंगे। रक्त में विष घुला हुआ हो तो कोई न कोई रोग उभरता ही रहेगा। एक का उपचार करते करते सफलता के कुछ लक्षण दीखे नहीं कि नयी व्याधि नये रूप में उबल पड़ेगी। पत्ते सींचने पर परिश्रम करने  की अपेक्षा जड़ में पानी देना चाहिए। शान्ति और स्थिरता के लिये एकता और समता की सोचनी चाहिए। 

समता का अर्थ साम्य सबसे प्रबल और प्रमुख है। साम्यवाद में इसी पर जोर दिया गया है। हर व्यक्ति योग्यता के अनुसार काम करे  और आवश्यकता के अनुरूप लेता रहे। बचत राष्ट्रकोष में जमा हो। उसे व्यक्ति विशेष के अधिकार में रहने देने से अहंकार बढ़ेगा औैर दुर्व्यसनों की भरमार होगी। पूँजी राज्य कोष में जमा रहने से उसके द्वारा जनहित के महत्त्वपूर्ण कार्य किये जा सकेंगे। 

भारतीय संस्कृति और भारतीय अध्यात्म बोओ और काटो और विश्व एक कुटुंब है, इस भावना को मानता आया है। समाज में एकता समता लाने के लिए एक ज्योत के, एक प्रकाश, एक विचार के नीचे आकर हम सबको आने वाले कल के बारे में सोचना होगा। यह तो निश्चित है वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के बिना शांति का सन्देश सम्भव नहीं। 


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