Published on 2015-10-21

देवसंस्कृति विवि के विद्यार्थियों ने नवरात्र के अवसर पर सामूहिक अनुष्ठान किये, तो वहीं कुलाधिपति डॉ प्रणव पण्ड्याजी  ने नौ दिन तक श्रीमद्भगवत गीता  श्लोक क्रमांक २६ से ३४ तक विशेष व्याख्यान दिये। गीता व्याख्यान माला के दौरान कुलाधिपति डॉ पण्ड्या ने सत, रज, तम तीनों गुणों के अलावा साधकों के व्यक्तित्व विकास सहित विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन दिया। 

अध्यात्मवेत्ता डॉ पण्ड्याजी ने कहा कि सतोगुण- श्रेष्ठता, सात्विकता व प्रकाश लाता है, तो रजोगुण से सक्रियता बढ़ती है, जबकि तमोगुण साधक के अंदर आलस्य, प्रमाद और जड़ता भर देता है। गीतामर्मज्ञ डॉ  पण्ड्या ने गीता के ९वें अध्याय के ३३वां श्लोक का जिक्र करते हुए कहा कि पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्त भगवान की शरण में ही परमगति को प्राप्त करते हैं। इसलिए उन्हें सुखरहित और क्षणभंगुर मनुष्य- शरीर में आने के बाद निरन्तर भगवान का भजन करना चाहिए। आज जितने अमीर वर्ग के लोग हैं सब पुण्यशील हैं, पर उनमें से अनेकों के पास विवेक का अभाव है। ये पुण्यात्मा अपने राह भटक गये हैं। गीता  इन सबको मार्ग दिखाती है। साथ ही उन्होंने ब्राह्मण, पुण्यशील व्यक्ति, भक्त और राजर्षि पर विस्तार से प्रकाश डाला। 

कुलाधिपति ने मानव की महानता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मानव सदैव दूसरों की सेवा- सहयोग करते हैं, इसलिए भगवान भी मानव रूप धरते हैं और दानवों का नाश करते हैं। उन्होंने कहा कि पुण्यशील व्यक्ति अपने अनुसार जप, तप कर सकते हैं और भगवान की भक्ति में रमते हैं। किन्तु तप- साधना एवं अनुष्ठान प्रखर एवं प्रचंड तभी बनते हैं, जब उसमें सम्यक उपासना के साथ- साथ साधना और आराधना के कठोर अनुशासन जुड़ते हैं। इससे पूर्व कुलाधिपति डॉ पण्ड्याजी  ने विद्यार्थियों की विविध शंकाओं के समाधान मार्मिक शब्दों से दिये। इसके साथ ही देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के मृत्युंजय सभागार में चल रहे नवरात्र अनुष्ठान पर कुलाधिपति की नौ विशेष कक्षाओं का आज समापन हो गया। 



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