Published on 2015-11-25

इण्टरनेशनल कॉन्फ्रेन्स ऑफ इंडोलॉजी का ४० सदस्यीय अति विशिष्ट राजकीय अतिथियों का एक दल राष्ट्रपति महामहिम प्रणव मुखर्जी के प्रस्ताव पर भारतीय संस्कृति की झलक देखने शांतिकुंज पहुंचा। इस दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति और जीवन विद्या के बारे में जाना। गौरतलब है कि यह दल अपने प्रवास के दौरान देवभूमि उत्तराखंड एवं भारतीय संस्कृति के उत्थान में जुटे संस्थानों के माध्यम से विश्व की प्राचीनतम संस्कृति को जानने आया है।

दल के शांतिकुंज पहुंचने पर गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने मंगल तिलक कर स्वागत किया। इस अवसर पर डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि भारतीय संस्कृति वास्तव में विश्वसंस्कृति है। पूर्व में भी भारत से निःसृत ज्ञान- विज्ञान को अपना कर मानवता ने उन्नति के नये शिखरों को छुआ था। जिसके प्रमाण आज भी मिलते हैं। आज जीवन जीने की इस विद्या को पुनः जन सामान्य तक पहुँचाने का अभिनव कार्य गायत्री परिवार एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय मिलकर कर रहा है। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के मॉडल से प्रभावित होकर आधुनिक गुरूकुल की इस परंपरा को इंडोलॉजी कॉन्फ्रेन्स के सदस्यों ने विश्व भर में अपनाये जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

इस अवसर पर देवसंस्कृति विद्यालय के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ ने अतिथियों को अनोखा भारत नामक सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से देवभूमि उत्तराखंड एवं ऋषि संस्कृति की झलकियाँ प्रस्तुत कीं। इससे पूर्व डॉ प्रणव पण्ड्याजी राजभवन में राज्यपाल के निमंत्रण पर इन अतिथियों से मिले और उन्हें देवसंस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे शोध तथा अनुसंधानों से परिचित कराया।

चालीस सदस्यीय इण्टरनेशनल कॉन्फ्रेन्स ऑफ इंडोलॉजी के इस दल में यूएसए के प्रो डेविड फ्रावले, पौलेण्ड के डेनुटा स्लाविया, स्पेन के जेवीर रुइज, ब्राजील के मि. आस्कर, चीली के शेरजीवो मिल्टन सहित जर्मनी, इटली, रूस, अर्जेण्टिना, तुर्की, कनाडा, चेक रिपब्लिक, रोमानिया, श्रीलंका, मारिशस, डेनमार्क, चीन, इंडोनेशिया, नार्वे आदि के उच्च स्तरीय सदस्यों के अलावा आईसीसीआर के अधिकारी शामिल हैं।




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