Published on 2015-12-08
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महानगरों में कूड़ा-कचरा निस्तरण एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रही है, जिसे उपयोगी बनाते हुए उससे छुटकारा दिलाने के मद्देनजर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देते हुए कागज उद्योग की शुरुआत की गई है, जिसमें युवा वर्ग बड़ी संख्या में प्रशिक्षण प्राप्त कर स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपित डॉ. प्रणव पंड्याजी के अनुसार विश्व में प्रति दिन बढ़ते कागज एवं स्टेशनरी सामग्रियों के उपयोग से न केवल पर्यावरण, बल्कि आर्थिक संकट का भी हम सामना करने पर मजबूर हो रहे हैं। ऐसे में पेपर की रिसाइक्लिंग से एक बहुत बड़ी आर्थिक समस्या का समाधान निकल सकता है।

उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार के जनक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने स्वावलंबन से अर्थतंत्र को मजबूत करने का जो रचनात्मक अभियान चलाया था, उसके मद्देनजर हमने देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में कागज उद्योग की प्रारम्भिक शुरुआत 2011 से की थी, जिसका सफल परिणाम अब देखने को मिल रहा है।

विश्वविद्यालय के स्वावलम्बन विभाग के समन्वयक डॉ.टी.सी. शर्मा के अनुसार, प्रति दिन 50 किलोग्राम लुग्दी तैयार होती है, जिससे कार्यालयों एवं घरों में उपयोग होने वाली 56 प्रकार की हस्तनिर्मित सामग्रियां तैयार हो रही हैं। इन हस्तनिर्मित कागजों से विजिटिंग कार्ड, एल फोल्डर, कोबरा फाइल, फाइल कवर, लिफाफे, कैरीबैग, फोटो फ्रेम, पेन स्टैंड, फ्लावर पॉट सहित विभिन्न प्रकार की सामग्रियां बनायी जा रही हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।  


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