वसंत पर्व विशेष चिंतन - इस वर्ष दो विशेष पुरुषार्थ करने है, युवा क्रांति और समूह साधना को प्रभावी बनाना

Published on 2016-02-05
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पुष्ट मनोभूमि में श्रेष्ठ संकल्पों के बीज बोरों वसंती उर्वर प्रवाह का लाभ उठायें ।

 

वसंत पर्व हर वर्ष की तरह एक दिव्य उर्वर ऊर्जा को लेकर इस वर्ष भी आ रहा है ।। समझदार किसानों  द्वारा खेतों में बोये गये बीज हों या प्रकृति के सहज प्रवाह में पनपने वाली वनौषधियाँ, दोनों को दिव्य पोषण वसंत का उर्वर दिव्य प्रवाह देता है ।। किसान की मेहनत और समझदारी इसी में होती है कि वह ऋतु के प्रवाह के अनुसार समय पर खेत तैयार करके उनमें उपयुक्त बीज बो देता है, ऋतु का प्रवाह उसके पुरुषार्थ को फलित कर देता है ।। ठीक ही कहा गया है कि-

माली सीते सौ घडा, ऋतु आये फल होय ।।

अर्थात्- माली कितना भी श्रम करे, ऋतुओं की संगति के बिना उसके श्रेष्ठ परिणाम मिल नहीं पाते ।। इसी के साथ यह भी सच है कि यदि माली समझदारी के साथ समय पर श्रम न करे, तो भी ऋतु का वांछित लाभ प्राप्त नहीं हो सकता ।। दोनों एक- दूसरे के पूरक हैं, एक- दूसरे की सार्थकता और महत्ता बढ़ाने में समक्ष हैं ।।

दोहरा प्रवाह- वसंत का दिव्य प्रवाह स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार की दिव्य धाराएँ लेकर आता है ।। स्थूल प्रवाह का प्रभाव वृक्षों में नयी कोपलों, आम के बौर, पलाश के फूलों, गेहूँ चना, सरसों की लहराती फसलों के रूप में स्थूल आँखों से सभी जगह दिखाई देता है ।। वनस्पतियों के औषधीय गुणों के विकास से लेकर फसलों की समृद्धि और फलों की सरसता इसी की देन है ।। इसलिए इसे ऋतुराज कहा जाता है ।।
   

वसंत का एक सूक्ष्म प्रवाह भी है, जिसका उपयोग अध्यात्म मार्ग के साधक, ज्ञानीजन आदि विशेष रूप से करते हैं ।। इस सूक्ष्म प्रवाह के नाते वसंत पर्व को माता सरस्वती का जन्मदिन भी कहते हैं ।। माता सरस्वती वीणा, पुस्तक धारिणी, अभयदायिनी हैं ।। वीणा संगीत- भाव संवेदना की प्रतीक है और पुस्तक ज्ञान- विवेक की परिचायक। यह दोनों विशेषताएँ साधक को अभय प्रदान करती हैं ।। वसंत का सूक्ष्म प्रवाह श्रेष्ठ संवेदनाओं एवं ज्ञान- विवेक को पोषण देने में सक्षम होता है ।। युगऋषि इसी प्रवाह का सदुपयोग कुशलतापूर्वक करके अपने जीवन में चमत्कारी उपलब्धियाँ हासिल करते रहे ।। हम सबसे भी उन्होंने यही अपेक्षा की है ।।

जीवन की खेती के सूत्र जीवन में महानता की खेती के सूत्र भी स्थूल जगत की उत्तम खेती के समान ही हैं। ऋतु के विशेष उर्वर प्रवाह का सही लाभ वही उठा पाते हैं, जो अपनी मनोभुमि को उपजाऊ बना लें, उसमें श्रेष्ठ संकल्पों के बीज समय पर बो दें। भुमि और ऋतु के संयोग से उभरी पोषण क्षमता का पूरा लाभ फसल को देने के लिए खर- पतवार की निराई समय पर मनोयोगपूर्वक करते रहे। गुरुदेव ने अपनी सफलता का श्रेय 'बोओ और काटो' के सूत्रों के सफल प्रयोग को ही दिया है। मन की भुमि को उपजाऊ बनाने, इच्छित फसल- उपलब्धियों के अनुसार संकल्पों का चयन और आरोपण करने के साथ श्रद्धा के जल से सिंचाई और तप- संयम की खाद की समुचित व्यवस्था बनाई। साथ ही खर- पतवार के रूप में उभरने वाले मनोविकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह अथवा वासना, तृष्णा, अहंता आदि) को प्रयासपूर्वक उखाड़ फेंकने की तत्परता भी बरती ।। इसी आधार पर उनके जीवन में चमत्कारी ढंग से ऋद्धि- सिद्धियों की फसल उपजती रही ।। हमें भी इसी प्रकार के साधना- कौशल को विकसित करना होगा ।।

मनोभूमि : संत तुलसी दास ने लिखा है कि वर्षा ऋतु उर्वरता लेकर आती है, किन्तु ऊसर भूमि में तृण भी नहीं उपजता ।।

ऊसर बरसे तृण नहीं जामा ।।

साधक को अपनी मनोभूमि को उपजाऊ बनाना पड़ता है ।। लक्ष्य के प्रति उदासीनता मनोभूमि को ऊसर बना देती है और लक्ष्य के प्रति लगाव, उमंग से उसमें उर्वरता आती है ।। बुद्धि- विवेक रूपी हल से उसे जोत कर मुलायम- सरल बनाया जाता है ।। ऐसी उपजाऊ भूमि में बोया बीज ही अंकुरित पल्लवित होकर अपना प्रभाव दिखाता है ।।

संकल्पबीज : उपजाऊ मनोभूमि में मौसम के अनुरूप सुनिश्चित संकल्पों को बीज की तरह स्थापित किया जाता है ।। क्या करूँ, क्या न करूँ? कितना करूँ, कितना न करूँ? यह असमंजस की स्थिति संकल्प बनने ही नहीं देती ।। संकल्प भले ही छोटा हो, पर सुनिश्चित हो, तभी बात बनती है ।। युगऋषि का यह कथन बिलकुल सही है कि कामनाएँ फलित नहीं होतीं और संकल्प निश्चित रूप से फलित होते हैं ।। 
 
मनोभूमि और संकल्प बीजों की सुसंगति को ही ऋतु के अजस्र अनुदानों का लाभ मिलता है ।। ऋतु के प्रभाव से भूमि के गर्भ में बीजों का विकास फसल के रूप में होने लगता है ।।

निराई : -उपजाऊ भूमि में ऋतु के प्रभाव से बोये हुए बीज तो उगते ही हैं, साथ ही हवा के साथ फेले अनेक अवांछित बीज भी खर- पतवारों के रूप में उसी तेजी से पनपने लगते हैं ।। खर- पतवार में जो उर्वरता खर्च हो जाती है, उतनी फसल कम हो जाती है ।। संकल्पों को विकसित करने वाली शक्ति मनोविकारों द्वारा सोख ली जाती है ।। साधक का पहले का परिश्रम निरर्थक होने लगता है ।। इसीलिए संत तुलसीदास ने लिखा है-
कृषि निवारहिं चतुर किसाना,
जिमि कुछ तजहि मोह मद माना ।। 

 
अर्थात् जैसे चतुर किसान खेती की निराई करते हैं, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति मनोभूमि में से मोह, मद- मान आदि को निकालते रहते हैं ।।

इसलिए चतुर साधक को मनोभूमि तैयार करने, बीजों का चयन और वपन करने के पुरुषार्थ के साथ ही निराई का पुरुषार्थ भी करना पड़ता है ।। हमें भी युगऋषि के चरण चिह्नों पर चलते हुए जीवन को धन्य बनाने के उद्देश्य से इन्हीं सूत्रों के अनुसार कुशलता एवं तत्परता के साथ आगे बढ़ना होगा ।। वसंत पर्व दिव्य उर्वर ऊर्जा लेकर आ ही रहा है; इस वर्ष के लिए निर्धारित विशेष लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हमें अपनी मनोभूमि में संकल्पों के बीज भली प्रकार स्थापित कर लेने चाहिए, ताकि वसंत ऋतु के सूक्ष्म प्रवाह के अनुदानों को हम धारण कर सकें, धन्य बन सकें। लक्ष्य पूर्ति के संकल्पों के साथ ही मन में उभरने वाले मनोविकारों को पहचानते हुए उन्हें साहसपूर्वक उखाड़ फेंकने की क्षमता विकसित करने का संकल्प भी अवश्य रखना चाहिए। आत्मशोधन की इस प्रक्रिया को एक श्रेष्ठ तप साधना मानकर उस पर आरुढ़ हो जाना चाहिए।

गुरुदेव ने एक बार वसंत पर्व पर कहा था कि हम आप लोगों को वसंत पर्व पर बड़ी भावना के साथ बुलाते हैं ।। हमारा मन होता है कि जिस प्रक्रिया से हमने उन्नति की है, वह आपको भी सिखा दें, अपने अनुभव- अनुदानों को आप पर बरसा दें। इस वसंत पर हमें उनका आमंत्रण स्वीकार करते हुए उनके इस बहुमूल्य अनुदान को अपना ही लेना चाहिए। इस प्रकार उनका हृदय भी गद्गद हो उठे और हम भी धन्य हो जायें ।।

 

नौष्ठिक प्रयास हों इस वर्ष के लिए दो विशेष अभियान घोषित हैं: 'समूह साधना' और 'युवा क्रान्ति' को प्रखर और प्रभावी बनाना ।। पाक्षिक और अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर उनके महत्व और स्वरूप पर प्रकाश डाला जा चुका है ।। आवश्यकता यह है कि परिजन उन्हें ठीक से समझें, अपने क्षेत्र की आवश्यकता और क्षमता के अनुसार लक्ष्य निश्चित करें तथा उनके समयबद्ध क्रियान्वयन की सटीक व्यवस्था बनायें ।।

समूह साधना :- इसके दोनों पक्षों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है ।।

1. किन्हीं बड़े लक्ष्यों की सिद्धि के निमित्त साधकगण संकल्पपूर्वक एक साथ जप, ध्यान एवं स्वाध्याय की साधना करें ।। इसके अनेक लाभ सुनिश्चित होते हैं ।। जैसे- साधकों में बिखराव दूर होकर आत्मीयता और संगठन का विकास होता है, जनकल्याण के बड़े संकल्पों की पूर्ति के लिए प्रकृति में अनुकूलता बढ़ती है, गायत्री- सावित्री साधना के संयुक्त लाभ मिलते हैं। सामान्य कार्यक्रमों को लक्ष्य करके बनाये गये संगठन बोद्धिक खींचतान में उलझकर बिखरने लगते हैं, किन्तु साधना की भावनात्मक एकता के नाते विकसित संगठन अधिक टिकाऊ और समर्थ सिद्ध होते हैं ।।

2. सामूहिक रूप से निर्धारण करने और समूहमन बनाकर सात्विक सहयोग के साथ आगे बढ़ने की साधना ।। इस संदर्भ में 1 दिसम्बर और 16 दिसम्बर के पाक्षिकों में स्पष्ट मार्गदर्शन दिया गया है ।। देवताओं के संयोग से दुर्गाशक्ति इसी साधना के परिणाम स्वरूप उपजी थी ।। भगवान श्री राम के मार्गदर्शन में रीछ- वानरों की अजेय क्षमता का आधार यही साधना रही है ।। योगीराज श्री कृष्ण के निर्देशन में पाण्डव दल की एकात्मकता ने ही महाभारत जीता था ।। युगऋषि के निर्देशन में सृजन सेनिकों, सृजन शिल्पियों की इसी एकात्म साधना से '' आत्मशक्ति के सहयोग से युगशक्ति के उद्भव' का लक्ष्य पूरा होना है ।।

इसके लिए केवल बौद्धिक स्तर पर लक्ष्य बना लेने से काम चलने वाला नहीं है ।। उसके साथ हृदय की भावनाओं और मनकी कामनाओं के बीच संगतिकरण बिठाने की साधना करनी होगी ।। ऋग्वेद के संज्ञान सूक्त का अंतिम श्लोक यही निर्देश देता है। देखें-

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि व: ।। समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ।। ऋ १९१/४

ऋषि कहते हैं 'हे साधको ! तुम सबके बौद्धिक संकल्प समान हों, हृदय के भाव एक जैसे हों, तुम सबके मन भी समान हों, ताकि तुम संगठित होकर सभी श्रेष्ठ कार्यो को सफल बना सको ।।

उच्चस्तरीय साधना के इन सूत्रों का अभ्यास सृजन शिल्पियों- सैनिकों को करना ही होगा ।। यदि हम अपने सर्वोत्तम प्रयास करेंगे तो वसंती दिव्य प्रवाह उनमें वह ऊर्जा भर देगा, जो लक्ष्य तक पहुँचे बिना रुकती या चुकती नहीं है ।।

2. युवा क्रान्ति :- इस वर्ष युवा क्रान्ति को प्रखरतर बनाने का भी लक्ष्य रखा गया है ।। इस पर 1 जनवरी था 16 जनवरी के पाक्षिकों में पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। अखण्ड ज्योति में भी इसका स्वरूप खोला गया है। इसके निमित्त भी हर क्षेत्र में सुनिश्चित संकल्प बीजों को साधकों की मनोभूमियों में स्थापित किया जाना है, ताकि वसंत का दिव्य प्रवाह उन्हें विकसित पल्लवित, फलित करने हेतु अपने अनुदान दे सके ।। एक वर्ष में यह अभियान क्रान्तिकारी रूप ले ले, ऐसा पुरुषार्थ करना है ।।

जवानी जागे :- भारत वर्ष को आयु सीमा के हिसाब से विश्व का सबसे युवा राष्ट्र माना गया है ।। यह अच्छी बात है, किन्तु जवानी को जगाने की जरूरत है ।। हमें सोचना होगा और कथित युवाओं को यह समझाना होगा कि

वह कैसी जवानी, जो समय की चुनौतियों से कतराये और अपनी सुख- सुविधाओं को जुटाने में ही जीवन खपा दे? जो हवा या पानी के प्रवाह में निर्जीव या निर्बल की तरह बहने को लाचार हो, उसे जवानी कैसे कहें? मनुष्यता के, राष्ट्रीयता के आदर्श कुछ अच्छा, कुछ नया करने के लिए करुणा भरी पुकार लगाते रहें और जिनके हृदय में समय की माँग पूरी करने का जज्बा न उठे, वे जवान कैसे कहे जाये?

हर आयुवर्ग के जीवन्त व्यक्तियों में वह जवानी जगानी होगी, जो श्रीराम की तरह असुरता के संहार और आदर्श रामराज्य की स्थापना का संकल्प भुजा उठा कर सके ।। जो कृष्ण की तरह अनीति को नाकों चने चबवा दे ।। जो चाणक्य और चन्द्रगुप्त की तरह भारत में स्वर्ण युग ला सके। जो विवेकानन्द की तरह हुंकार भर कर विश्व को भारतीय संस्कृति के गौरव का बोध करा सके ।। जो गोखले, तिलक, गाँधी, सुभाष चंद्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद एवं भगतसिंह की तरह विश्वव्यापी ब्रिटिश तंत्र की नींव हिला सके ।। जो आचार्य बिनोवा और आचार्य श्रीराम शर्मा की तरह उज्ज्वल भविष्य के स्वप्नों को साकार करने के सफल प्रयोग करके दिखा सके।

हर क्षेत्र में, समाज के हर वर्ग में युवाओं को अपने गौरव के संरक्षण के लिए प्रेरित, प्रशिक्षित करके उनके सुनियोजन का व्यापक और प्रामाणिक तंत्र बनाना होगा ।। युवाओं में कुछ श्रेष्ठतर करने और प्रान्तों में युवाओं को जाग्रत् प्रशिक्षित करने के दृढ़ संकल्प उभारने होंगे ।। उनमें 'एकला चलो '' का साहस और सहगमन का साधनात्मक कौशल भी विकसित करना होगा ।।

सावधान :- अगला कार्य उच्चस्तरीय है, उसके लिए पुरानी साधना और पुराने कौशल पर्याप्त नहीं, उच्चस्तरीय साधना द्वारा श्रेष्ठतर कौशल अर्जित करने से ही बात बनेगी ।।

लक्ष्य प्रधान रहे, चिन्तन उसी दिशा में लगा रहे ।। उपकरणों के रूप में प्रयुक्त होने वाले साधन, पद, प्रतिष्ठा को लव्य का दर्जा देने की भूल न हो ।। सृजन सैनिकों के सप्त महावृत्तों में प्रथम लक्ष्य और चिन्तन के सूत्र को गहराई से अपनाया जाय ।। लक्ष्य पर चिंतन केन्द्रित रहे तो चित्त अन्य प्रसंगों में भटकता नहीं है ।।

इसी प्रकार सातवें सूत्र के अनुसार प्रगल्भता, आस्था की अडिगता बनी रहे ।। कोई लोभ, आकर्षण या भय उसे डिगा न सके, ऐसी सैद्धान्तिक दृढ़ता भी अभीष्ट है ।। सच्चे युग सृजेता का गौरव इससे कम में मिलने वाला नहीं ।।

ऋषिसत्ता दुर्लभ श्रेय- सौभाग्य देने को आतुर है ।। वसंत का प्रवाह इसके लिए दिव्य अनुदानों का अजस्र प्रवाह लेकर चला आ रहा है ।। हमें अवसर चूकना नहीं है ।। उक्त सुअवसर का भरपूर लाभ उठाना ही है ।। तो आइये अभी से युगऋषि के निर्देशानुसार जीवन के उपवन को सुरम्य- सार्थक बनाने के लिए कुशल किसान की तरह हे मनोयोग और पूरी तत्परता से जुट पड़े ।। युगऋषि की तरह ही वसंत को अपने दिव्य अनुदान उड़ेल देने के लिए सहमत करें और जीवन को धन्य बनायें ।।

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