राष्ट्र का नवनिर्माण सकारात्मक विचारधारा और संघशक्ति से सम्भव- डॉ. पण्ड्याजी

Published on 2016-03-02
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राष्ट्रीय संगठन साधना सत्र का समापन, देश भर के ७०० से अधिक प्रतिभागी शामिल 

गायत्रीतीर्थ शान्तिकुंज में दिनांक २७ फरवरी से चल रही राष्ट्रीय संगठन साधना सत्र आयोजन का आज समापन हुआ। इस सत्र में देश भर के जिला समन्वयकों और जोन- उपजोन के कार्यकर्त्ताओं समेत ७०० से अधिक वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने भाग लिया। इस समापन सत्र को संबोधित करते हुए गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्याजी ने कहा, अच्छे काम और उसे बड़े स्तर पर करना हो तो अच्छे लोगों को संगठित होना जरूरी है। संसार में जब भी बड़े पैमाने पर अच्छे कार्य हुए हैं, उन सबमें अच्छे लोग एकजुट अवश्य हुए हैं। 

डॉ. पण्ड्याजी ने कहा समूह की संगठित शक्ति से ही विराट स्तर पर कार्य सम्भव होते हैं। इसीलिए ऋषियों ने संगच्छध्वं संवदध्वं संवोमनांसि जानताम् का उपदेश दिया है। संगच्छध्वं का तात्पर्य है साथ साथ चलना, परस्पर मिलकर प्रयत्न करना। संवदध्वं का अर्थ है अच्छी बातों  को मिलकर बोलना, समर्थन करना और संवोमनांसि यानि सब एकमत होकर, मन मिलाकर, सामंजस्य बिठाकर रहना। उन्होंने संगठन के लिए वरिष्ठता और कनिष्ठता के बीच के भेद भाव को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा विनम्रता वरिष्ठता का गुण होनी चाहिए। 
उन्होंने कहा, राष्ट्र के नव निर्माण हेतु सकारात्मक विचाराधारा वालों का समूह बनना जरूरी है। पूज्य गुरुदेव ने गायत्री परिवार को इसी हेतु स्थापित किया है। हमें अच्छे लोगों का परिवार बनाना है। गायत्री परिजनों को ऐसा होना चाहिए जिनको देखकर दूसरे लोग सीख लें। हमारे सारे  प्रज्ञा संस्थान, शक्तिपीठों, चेतना केन्द्रों से अच्छाइयों की पहल सदा जारी रहनी चाहिए। आज समाज को बेहद जरूरत है अपने जीवन से प्रेरणा देने वालों की। 

इससे पूर्व शांतिकुंज के सभी वरिष्ठों ने आये हुए परिजनों को मार्गदर्शन दिया। शांतिकुंज मनीषी  वीरेश्वर उपाध्याय, व्यवस्थापक गौरीशंकर शर्मा, जोन समन्वयक कालीचरण शर्मा, डॉ. बृज मोहन गौड़, एचपी सिंह, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, डॉ. शशि साहू, शक्तिपीठ प्रकोष्ठ प्रभारी केसरी कपिल आदि वरिष्ठों ने तीन दिवसीय संगोष्ठी में विचार व्यक्त किये। साथ ही वर्ष २०१६ को युवाक्रान्ति वर्ष के रूप में मनाने का संकल्प दिलाया। 


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