Published on 2016-03-08
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आज अधिकांश व्यक्तियों का जीवन उलटी दिशा में चल रहा है। मनुष्य स्वकेन्द्रित हो गया है। वह केवल अपने लाभ की बात ही सोचता है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति में लगा रहता है। स्वार्थ के आगे संयम तो स्वतः ही टूट जाता है। अमर्यादित आचरण से भी उसे संकोच नहीं होता। स्वयं के बाद वह अपने परिवार की बात सोचता है। पति- पत्नी और बच्चों तक ही वह सीमित रह जाता है। आगे समाज व राष्ट्र के बारे में तो वह सोचता ही नहीं।

होना तो यह चाहिए कि पहले राष्ट्र और समाज कल्याण के कार्य करें और फिर अपने कुटुंब व परिवार के। स्वयं का कल्याण तो स्वतः ही हो जाएगा। जब इस प्रकार की भावना मन में आएगी तो मनुष्य कभी भी दुःखी नहीं होगा, चाहे कैसी भी समस्याएँ उसके सामने क्यों न आएँ। इस उलटे मार्ग पर हम इसीलिए चल पड़े हैं क्योंकि हमने ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ के महामंत्र को भुला दिया है।

आज मनुष्य के मानसिक संताप तथा समाज में व्याप्त अनेकानेक बुराइयों, आधि-व्याधियों का मूल कारण ही यह है कि हमने ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ की इस स्वर्ग नसैनी को खंडित कर दिया है, उसकी पवित्रता भंग कर दी है। धर्म के वास्तविक शाश्वत स्वरूप को तिलांजलि दे दी है। धर्म विमुख होने से हमारे समस्त क्रिया- कलाप हमें पतन के गर्त में ही ले जा रहे हैं।


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