Published on 2016-06-16
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समाजसेवा समाज के पिछड़े और समस्याग्रस्त लोगों की कठिनाइयों को सुलझाने व उन्हें आगे लाने का नाम है। यह जितनी ही यज्ञ भावना के साथ की जायेगी, समाजसेवी को बदले में उतना ही आत्मसंतोष होगा, आत्मतृप्ति व लोकश्रद्धा मिलेगी, जो सस्ती वाहवाही, झूठे सुख और थोथी श्रद्धा से हजार गुना कीमती है।

करुणा जागे तो असमानता मिटे

सभी मनुष्यों के विकास और उन्नति की गति एक समान नहीं है। कोई व्यक्ति वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए चाँद पर चला जाता है तो कोई व्यक्ति गाँव के सिन्दूर लगे देवी-देवताओं को पूजकर उनसे रोग निवारण की प्रार्थना को परम पुरुषार्थ समझता है। एक व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से हजारों रुपये अपने शौक-मौज में खर्च कर सकता है, वहीं दूसरे व्यक्ति को अगली खुराक के लिए तपती हुई देह से जी-तोड़ मेहनत करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। एक व्यक्ति अच्छी सोसायटी और शिक्षा-दीक्षा की दृष्टि से फॉरेन रिटर्न या महापण्डित हो सकता है तो दूसरे व्यक्ति को अपने बेटे की नौकरी लग जाने का तार भी अधकचरे पढ़े-लिखे व्यक्ति से पढ़वाना पड़ता है। इसी प्रकार रहन-सहन की दृष्टि से एक व्यक्ति ऊँचे तबके का है तो दूसरे को रहने के लिए झोंपड़ी और पहनने को साधारण कपड़े भी मुश्किल से मिल पाते हैं।

असमानता या पिछड़ेपन की निम्रतर अवस्था और उन्नति का चरम शिखर हम मानव समाज में यत्र-तत्र बड़ी आसानी से देख सकते हैं। यों सबकी स्थिति, सामथ्र्य और परिवेश को देखते हुए प्रत्येक व्यक्ति समान हो भी नहीं सकता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आदमी-आदमी में राई और पहाड़ जैसी विषमता हो। कम से कम परिस्थितियाँ ऐसी न हों कि कोई साधनहीन पिता अपनी मेहनती, मेधावी, सुयोग्य संतान को पढ़ा भी न सके।     

राई और पहाड़ के इस अंतर को पाटने के लिए, पिछड़ेपन को दूर करने के लिए और उन समस्याओं को सुलझाने के लिए जो कि जीते जी मनुष्य को नारकीय यातना में झुलसाती रहती हैं, करुणा की आवश्यकता है। करुणा अर्थात् जो अपने से पीछे हैं, उन्हें आगे लाने की कसक। अर्थात् भ्रातृभाव से छोटे भाइयों का सहयोग  कर उन्हें प्रगति की दौड़ में सम्मिलित कराने के प्रयास।

पारिवारिक भाव का विकास हो

यहाँ करुणा से आशय दया का नहीं है। दया का शाब्दिक अर्थ तो होता है कि आप अपने से कमजोर व्यक्ति की सहायता कर उस पर कृपा कर रहे हैं। करुणा में कृपा का भाव या ऐसा विचार जरा भी नहीं होता कि मैंने अमुक व्यक्ति की सहायता कर बहुत बड़ा काम कर दिया।

करुणा एक कर्तव्यनिष्ठा से प्रेरित सहयोग और सेवा की भावना है, जैसे कि एक परिवार में होती है। परिवार का कोई सदस्य बीमार हो जाये तो दूसरे स्वस्थ सदस्य भाग-दौड़कर उसकी सेवा-सुश्रूषा करते हैं, डॉक्टर को बुलाते हैं, दवाई देते हैं; अर्थात् अपने बस में जो है वह सब कुछ कर लेते है। जब वह स्वस्थ हो जाता है तो उससे किसी प्रकार के प्रत्युपकार की चाह नहीं होती, न ही इस बात का विज्ञापन करते हैं कि हमने अपने भाई की सेवा-सुश्रूषा बड़ी भाग-दौड़ और हायतौबा मचाकर की।

व्यापारी मानसिकता से बचें

बिना प्रत्युपकार किए और बिना प्रतिदान माँगे किया गया सहयोग ही सच्ची सेवा है। यह भाव न हो कि हम अपने भाई की सेवा-सुश्रूषा करेंगे तो बदले में वह हमारा गुलाम हो जायगा। समाज सेवा में ऐसी नि:स्वार्थ भावना न हो तो वह किसी व्यापार से कम नहीं है। आध्यात्मिक विचारधारा का थोड़ा भी ज्ञान रखने वाले व्यक्ति यह अच्छी तरह जानते हैं कि बिना कुछ माँगे की गयी प्रभु की आराधना ही सच्ची आराधना है। अन्यथा बेटा, नौकरी, लड़की की शादी, नया मकान और लॉटरी खुल जाने की अपेक्षा रखते हुए किया गया भजन-पूजन भजन नहीं हो सकता है, कुछ और भले ही हो।

समाजसेवा-ईश्वर की सच्ची भक्ति

समाज सेवा को भी ईश्वर की भक्ति के समकक्ष रखा जा सकता है और एक मायने में तो यह प्रचलित ईश्वर-भक्ति के ढंग से ऊँचे स्तर की ही है। ईश्वर-भक्ति के नाम पर प्रतिमा पूजन कर प्रतीक उपासना करने वाले भक्त तो कई मिल जायेंगे, पर नर में ही नारायण का साक्षात्कार करके ईश्वर के व्यक्त स्वरूप की उपासना करने की निष्ठा ऊँचे स्तर की है और ऐसे ईश्वरनिष्ठ दुर्लभ होते हैं।

सब प्राणियों में भगवद्भाव रखना कठिन हो सकता है, क्योंकि यह अध्यात्म की उच्च कक्षा है। लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि जिसकी भी सेवा करें, उसके प्रति प्रेमभाव या कर्तव्यनिष्ठा का दृष्टिकोण रखें। लेकिन इस युग में जिस प्रकार क ई आध्यात्मिक सिद्धान्तों का अनर्थ किया गया है और आदर्शवादिता के नाम पर गलत रीति-नीति अपनाई गयी है, वही अनर्थ समाज सेवा के साथ भी हुआ है।

भटक रही है मानसिकता

कहा जा चुका है कि समाज सेवा एक पवित्र यज्ञ है। लेकिन जिस तरह हमने कई आध्यात्मिक आदर्शो के साथ अनाचार किया और अपने हीन स्तर के कारण उनके गौरव को घटाया, उसी प्रकार समाज सेवा के साथ-साथ स्वयं को भी समाजसेवी कहलाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं।

आज पिछड़ों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने के भाव के साथ समाजसेवा की उमंग घटती जा रही है। लोगों में इसके लिए ईमानदार प्रयास करने के स्थान पर अपने आप को विज्ञापित करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। आज लोग समाज सेवा करने के स्थान पर समाजसेवी कहलाना अधिक पसन्द करते हैं। इसलिए इस शब्द के साथ जुड़ी हुई शर्तों को पूरा करने की जगह महत्त्व इस बात को दिया जाता है कि कोई हमें साधना करते हुए देख रहा है अथवा नहीं। ध्यान इस पर नहीं रहता है कि हमारी साधना कैसी चल रही है, वरन् इस बात के लिए चिन्तित रहते हैं कि लोग हमें महत्त्व देते हैं अथवा नहीं।

यही कारण है कि लोग इस दिशा में नैष्ठिक प्रयास करने के स्थान पर अपने मुँह से अपनी बहादुरी और पराक्रम का परिचय ज्यादा देते हैं। यह नहीं देखते कि अपने प्रयासों से किसी का भला हुआ है अथवा नहीं, अथवा दूसरों का भला हो सके ऐसे प्रयास हम से हो पा रहे हैं अथवा नहीं, प्रधानता मिलती है अपने तमगे को चमकाने की।

सच्चे समाजसेवी की पहचान

सच्चाई तो यह है कि निष्ठावान समाज सेवक आत्म-प्रचार करने और अपनी सेवाओं का ढोल पीटने के स्थान पर मूक भाव से ही अहर्निश जनसेवा में लगे रहते हैं। चाहिए भी यही कि इस विशुद्ध साधना को पाखण्ड के रूप में नहीं, साधना के रूप में ही अपनाया जाय। इसलिए शुरुआत अपने से ही करनी चाहिए। इसका अर्थ है कि जिन आदर्शों की स्थापना हम समाज में होते हुए देखना चाहते हैं, उन आदर्शों को पहले हम अपने में उतारें और कथनी से नहीं करनी के उदाहरण से प्रस्तुत करें।

वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (वाङ्मय खंड-६४, राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बने-पृष्ठ ४.८६ से संकलित-सम्पादित)


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