गुरु अनुग्रह का उपयोग व्यक्तित्व के श्रेष्ठ रूपान्तरण हेतु करें, यही है द्विजत्व

Published on 2016-08-11
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श्रावणी पर्व से जीवन के उन्नयन की ऐसी ही साधना हेतु तत्पर हों 

युगऋषि की अपील

युगऋषि ने अपने जीवन की विभूतियों, सिद्धियों के रास्ते सभी नैष्ठिक साधकों के लिए खोल कर रख दिये हैं। लोगों को महापुरुषों के जीवन से सम्बन्धित अलौकिक प्रसंग बहुत रोचक लगते हैं। वे उन्हें पढ़ना और उनकी चर्चा करना पसंद करते हैं। युगऋषि ने अपनी जीवनी में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि ऐसे प्रसंग थोड़ा उत्साहवर्धन तो कर सकते हैं, किन्तु उन्हें अनुकरणीय मानकर कोई उनका लाभ नहीं उठा सकता। वे तो महापुरुषों के जीवन में ही प्रकट होते हैं और उन्हीं के साथ चले भी जाते हैं। इसके विपरीत जिस रास्ते पर चलकर, जिन अनुशासनों का पालन करके वे जीवन की ऊँचाइयों तक पहुँचते हैं, वे सभी के लिए अनुकरणीय, उपयोगी और लाभकारी होते हैं। उन्होंने लिखा है -

जिन्हें ऋषि परम्परा के अध्यात्म का स्वरूप समझना हो, उन्हें निजी अनुसंधान करने की आवश्यकता नहीं है, वे हमारी जीवनचर्या को आदि से अन्त तक पढ़ और परख सकते हैं। आत्मविद्या और अध्यात्म विज्ञान की गरिमा से जो प्रभावित हैं और उसका पुनर्जीवन देखना चाहते हों, उन्हें निश्चय ही हमारी जीवनचर्या के पृष्ठों का पर्यवेक्षण संतोषप्रद और समाधानकारक लगता है।

आज के समय में समाज में अध्यात्म के बारे में अनेक भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं। उन भ्रान्तियों ने अध्यात्म को वैज्ञानिक स्तर से दूर करके, अनगढ़ चमत्कारों और अन्धविश्वासों से जोड़ दिया है। युगऋषि ने उस अनगढ़ता से उबरकर ऋषि परम्परा के प्रामाणिक अध्यात्म को समझने और अपनाने की अपील की है। जो उसे अपनाना चाहें उन्हें कोई नये प्रयोग करने की जरूरत नहीं, वे युगऋषि के जीवन प्रयोगों को पढ़कर उन्हें समझ भी सकते हैं और अपने जीवन में अपनाकर परख भी सकते हैं। लेकिन इसके लिए अपने अन्दर शिष्यत्व के गुणों को विकसित भी करना पड़ता है। गुरु के निर्देशों को विवेकपूर्वक समझना, श्रद्धापूर्वक अपनाना और निष्ठापूर्वक नियमों का निर्वाह करना होता है। यह कार्य बड़ी तत्परतापूर्वक धैर्य के साथ करना पड़ता है। गुरुदेव ने लिखा है —
 
हमें इतने समर्थ गुरु अनायास ही कैसे मिले, इस प्रश्न का समाधान एक ही है कि लम्बे समय से, जन्म- जन्मान्तरों से पात्रता अर्जन की धैर्यपूर्वक तैयारी की गयी, उतावली नहीं बरती गयी।

इस तैयारी के अनुसार ही शिष्य गुरु के अनुदानों का लाभ प्राप्त कर पाता है। इसके लिए गुरुवचनों पर अटूट विश्वास और समर्पण की साधना करनी पड़ती है। इस सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है —

गुरु के आदेश का प्राणपण से पालन, यही है समर्पण। बिना कोई तर्क बुद्धि लगाये, बिना कुछ ननुनच किये उनके एक इशारे पर गतिशीलता होती रही।

समर्पण शब्द बोल देना आसान है, लेकिन समर्पण साधना कठिन है। इसका अभ्यास बड़ी सावधानी से क्रमशः धैर्यपूर्वक किया जाता है। इसके अंतर्गत अपनी इच्छाओं को गुरु की इच्छाओं के अनुरूप ढालना पड़ता है। उनके द्वारा निर्धारित जीवन के अनुशासनों को साधने और तद्नुरूप कार्यकौशल बढ़ाने का अभ्यास भी क्रमशः बढ़ाना पड़ता है। समर्पण की साधना में कदम- कदम पर गहन आत्मसमीक्षा, तद्नुसार प्रवृत्तियों का शोधन और विकास करने के लिए तप करना पड़ता है।

सतत समीक्षा, निरन्तर प्रगति

गुरु शिष्यों के स्तर को देखकर उन्हें पहले उनके अनुरूप प्रारंभिक सुगम साधनाएँ बतलाता है। श्रद्धा- समर्पण के नाम पर उनके बताये हुए प्राथमिक पाठ को ही दुहराते रहना ठीक नहीं। अपनी गहन समीक्षा करते हुए प्रगति के सोपानों पर निरन्तर चढ़ना भी पड़ता है। प्रतीकों के सहारे साधना प्रारंभ करके उनके तत्वदर्शन तक पहुँचाना पड़ता है।

दृश्य से दर्शन तक :- युगऋषि ने समझाया है कि प्रारंभ में छात्रों को प्रतीकात्मक दृश्यों के सहारे समझाया जाता है, जैसे कबूतर का ‘क’ खरगोश का ‘ख’। बाद में ‘क’ और ‘ख’ के वास्तविक व्याकरण का बोध हो जाता है। उपासना के क्रम में भी यही रीति- नीति बरती जाती है। अपनी साधना के बारे में उन्होंने लिखा है—

गायत्री माता मात्र स्त्री- शक्ति के रूप में छवि दिखाती है, अब प्रज्ञा बनकर विचार संस्थान पर आच्छादित हो चली, जितना बन पड़ा विश्लेषण किया जाता रहा। हमने परखा भी है कि समझदारी, जिम्मेदारी, ईमानदारी और बहादुरी के रूप में प्रज्ञा का समन्वय आत्मचेतना की गहराई तक हुआ कि नहीं। प्रतीत होता रहा कि भावचेतना में प्रज्ञा के रूप में गायत्री माता का अवतरण हुआ है।

उन्होंने गायत्री को लौकिक माता के रूप में देखा, किन्तु उनके विश्वरूप, आदिशक्ति रूप के बोध की तरफ निरंतर बढ़ते रहे। उन्हें श्रेष्ठ आदर्शों, प्रवृत्तियों के समुच्चय के रूप में समझा और अपनाने की साधना चालू रखी। लिखा है -

गायत्री माता की सत्ता कारण शरीर में श्रद्धा, सूक्ष्म शरीर में प्रज्ञा और स्थूल शरीर में निष्ठा बनकर प्रकट होने लगी। इसके लिए बार- बार कठोर आत्मपरीक्षण किया जाता रहा है। देखा कि आदर्श जीवन के प्रति, समष्टि के प्रति अपनी श्रद्धा बढ़ रही है या नहीं। प्रलोभनों, दबावों से इन्कार कर सकने की स्थिति है या नहीं। पाया गया कि भावना परिपक्व हो गयी है और उसने अपनी स्वस्थ साधना- श्रद्धा को वैसा ही बना लिया है जैसा कि ऋषि- कल्प के साधक बनाया करते थे।

युगऋषि ने उक्त कथन में स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि श्रद्धा के भी स्तर होते हैं। साधना की उच्च सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए सामान्य लौकिक श्रद्धा पर्याप्त नहीं, उसके लिए भक्तों, ऋषिकल्प साधकों जैसी श्रद्धा चाहिए।

श्रद्धा- समर्पण

सामान्य स्तर पर श्रद्धा इष्ट के प्रति जुड़ाव- लगाव तो बनाये रखती है, किन्तु उसमें अपने लौकिक लाभों को पाते रहने का ही भाव प्रधान रहता है। परिष्कृत श्रद्धा क्रमशः समर्पण- विसर्जन, रूपान्तरण के सोपानों पर चढ़ती चली जाती है। इस प्रक्रिया से होकर गुजरने वाले साधक की इन्द्रियाँ और उनकी प्रवृत्तियाँ भी शोधित होने लगती हैं। गुरुवर अपने अनुभव लिखते हैं  :- 
शरीर के अणु- परमाणुओं में गायत्री माता का वर्चस्व समा जाने से काया का हर अवयव ज्योतिर्मय हो उठा और अग्नि से इन्द्रियों की लिप्सा जलकर भस्म हो गयी, आलस्य आदि दुर्गुण नष्ट हो गये। रोग- विकारों को उस अग्नि ने अपने में जला दिया।

समिधा जब अग्नि में समर्पित होती है तो पहले उसके विकार धुएँ के रूप में भागने लगते हैं। अगले चरण में समिधा स्वयं अग्निरूप होने लगती है। वही अनुभव उन्हें होता है।

शरीर तो अपना है, पर उसके भीतर प्रचण्ड ब्रह्मवर्चस लहरा रहा है व वाणी में केवल सरस्वती ही शेष है। असत्य, छल और स्वाद के वह असुर उस दिव्य मन्दिर को छोड़कर पलायन कर गये। नेत्रों में गुण ग्राहकता और भगवान का सौन्दर्य हर जड़- चेतन में देखने की क्षमता भर शेष है। छिद्रान्वेषण, कामुकता जैसे दोष आँखों में नहीं रहे। कान केवल जो मंगलमय है उसे सुनते हैं।

इन्द्रियों की प्रवृत्ति तो बदलती ही है, उससे भी अधिक गहराई से मन (रसाकांक्षा), बुद्धि (विचार शक्ति- विवेक), चित्त (संस्कार आदि) तथा अहंकार (स्वयं के बारे में अवधारणा) में भी वांछित परिवर्तन आने लगता है। गायत्री माता को आदिशक्ति, ब्रह्मवर्चस (ब्रह्मतेज) के रूप में अनुभव करते- करते अन्तःकरण भी उससे प्रभावित, परिवर्तित होने लगता है। युगऋषि अपना अनुभव लिखते हैं :-

गायत्री माता का परम तेजस्वी प्रकाश सूक्ष्म शरीर में- अन्तःकरण चतुष्टय में, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में प्रवेश करते और प्रकाशवान् होते देखा तथा अनुभव किया कि ब्रह्मर्चस अपने मन को उस भूमिका में घसीट लिये जा रहा है, जिसमें पाशविक इच्छा- आकांक्षाएँ विरत हो जाती हैं।

अगले चरण में रूपान्तरण का यह क्रम साधक को इष्ट से एकत्व का बोध करा देता है। गुरु ने लिखा है-

गायत्री पुरश्चरणों के समय केवल जप ही नहीं किया जाता रहा, साथ ही भाव तरंगों से मन भी हिलोरें लेता रहा। कारण शरीर का, भावभूमि का, अन्तस्थल के आत्मबोध, आत्मदर्शन, आत्मानुभूति और आत्मविस्तार की अनुभूति आदि का अन्तर्ज्योति के रूप में अनुभव किया जाता रहा। लगा अपनी आत्मा परम तेजस्वी सविता देवता के प्रकाश में पतंगों के दीपक पर समर्पित होने की तरह विलीन हो गयी। अपना अस्तित्व समाप्त, उसकी स्थान पूर्ति परम तेजस् द्वारा। मैं समाप्त- सत् का आधिपत्य। आत्मा और परमात्मा के अद्वैत मिलने की अनुभूति में ऐसे ब्रह्मानन्द की सरसता की क्षण- क्षण अनुभूति होती रही।

द्विजत्व :- साधना इसी क्रम से समर्पण- विसर्जन से विलय- रूपान्तरण तक चलती है। पहले वाला व्यक्तित्व रूपान्तरित होकर जब तक नये तेजस्वी, इष्टानुरूप न बने तब तक दूसरा जन्म कैसे माना जाय? जिन्हें गुरु के निर्देशों का अनुसरण करते हुए जीवन को, स्वयं को ऋषिपुत्र, प्रज्ञापुत्र के रूप में विकसित करना है, उन्हें द्विजत्व की साधना प्रारंभ करके ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। ऋषिकल्प रूपान्तरण के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। श्रावणी पर्व इसी साधना को पिछले जीवन क्रम की अपेक्षा अधिक प्राणवान, कारगर बनाने की प्रेरणा- ऊर्जा लेकर आता है।

श्रावणी पर्व से द्विजत्व के पोषण- संवर्धन की साधना एक नये जीवन की तरह की जाती है। जीवन के आदर्श लक्ष्य की तरफ प्रगति करने के लिए पुरानी भूलों को सुधार कर, खेती में खर- पतवार की तरह उभरने वाले दोषों को दूर करते हुए, अपने साधना अभियान को अधिक प्रखरता से चलाने की साधना संकल्पपूर्वक की जाती है। यह द्विजत्व की साधना व्यक्ति को महापुरुष की कोटि तक ले जाकर ब्रह्मलोक तक पहुँचाने की संभावनाओं को साकार करती है।

अविचलित भाव से बढ़ते रहें

साधना काल में संसार की अनेक बाधाएँ, अनेक लौकिक आकर्षण मन को भटकाने का प्रयास करते रहते हैं। साधक को उनसे अप्रभावित होकर सतत अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए। इस संदर्भ में युगऋषि ने कहा है कि गायत्री का देवता सविता- सूर्य है। सविता की उपासना से साधक में सविता जैसे गुणों का विकास होना चाहिए। वे लिखते हैं -

सूर्य केन्द्र है और अन्य समस्त ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं, वैसे ही तुम भी अपने को कर्त्ता केन्द्र और निर्माता मानो। परिस्थितियाँ, वस्तुएँ, घटनाएँ तो हमारी परिक्रमा मात्र करती हैं। जैसे परिक्रमा करने वाले ग्रह सूर्य को प्रभावित नहीं करते, वैसे ही कोई परिस्थिति हमें प्रभावित नहीं करती। अपने भाग्य के, अपनी परिस्थितियों के निर्माता हम स्वयं हैं। अपनी क्षमता के आधार पर अपनी हर एक इच्छा और आवश्यकता को पूरा करने में हम पूर्ण समर्थ हैं। गायत्री माता हम बालकों को गोदी में लेकर उंगली के संकेत से सविता को दिखाती हैं और समझाती हैं कि मेरे बालको, सविता बनो, सविता का अनुकरण करो।

द्विजत्व की साधना इसी स्तर के अविचलित भाव से पूरी होती है। बुद्धि में जब दूरदर्शी विवेकशीलता विकसित हो जाती है तो वह ‘प्रज्ञा’ बन जाती है। प्रज्ञा जब अविचलित रहने लगती है तब साधक ‘स्थिर प्रज्ञ’ हो जाता है। इसी परिष्कृत- पुष्ट प्रज्ञा को ‘ऋतंभरा प्रज्ञा’ कहा जाता है। इस संदर्भ में पूज्यवर लिखते हैं -

ऋतम्भरा - प्रज्ञा की अन्तराल में प्रतिष्ठापना होने के उपरान्त विचारणा का स्तर उस ऊँचाई तक जा पहुँचता है जिसे ब्रह्मलोक कहते हैं। शरीर पर मनःचेतना का परिपूर्ण नियन्त्रण है। जैसा सोचा जाता है वैसा कर्म अनायास ही होने लगता है। उत्कृष्ट चिन्तन की परिणति आदर्श कर्त्तव्य में होनी ही चाहिए। गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता के धनी व्यक्ति ही देवता कहलाते हैं।

द्विजत्व के साधक को इस स्थिति तक पहुँचने के लिए निरन्तर साधनारत रहना चाहिए। यही साधना साधक को लौकिक विभूतियों से सम्पन्न बनाती हुई उसे ब्रह्मवर्चस प्रदान करती है।




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