Published on 2016-07-25

सम्मानित हुए शिक्षक
• श्री दीनानाथ बत्रा
• डॉ. प्रभाकर भानुदास मांडे
• सुश्री मंजूश्री बलवंत रहालकर
पुरस्कार में शॉल, श्रीफल, पुष्पगुच्छ और स्मृति चिह्न के साथ एक लाख रुपये की धनराशि प्रदान की गयी। गायत्री परिवार की ओर से ‘शिक्षा और विद्या’ वाङ्मय भेंट करते हुए उन्हें सम्मानित किया गया।

आज शिक्षकों के सामने विद्यार्थियों की सोच और उनकी प्रवृत्ति को सही दिशा देने की विराट चुनौती है। आज की भौतिकतावादी सोच वाली शिक्षा प्रणाली समाज में ब्रह्मराक्षस ही पैदा कर रही है। जानकारियों का तो बॉम्बार्डमेण्ट हो रहा है, लेकिन व्यक्तित्व में जीवन मूल्यों के अभाव में वह जानकारियाँ व्यक्ति को शांति और संतोष नहीं दे पा रहीं। आज की शिक्षा बड़े- बड़े पैकेज तो दिला रही है लेकिन सामाजिक समस्याओं का समाधान करती दिखाई नहीं देती। समाज में हिंसा, तनाव, अशांति पैदा करने वाले लोगों में बड़ी- बड़ी डिग्रियाँ रखने वालों की कमी नहीं है। इस विकृत शिक्षा प्रणाली को जीवन विद्या से विभूषित आचार्य ही सही दिशा दे सकते हैं।

अ.वि. गायत्री परिवार के प्रमुख आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने ये विचार अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय शिक्षक सम्मान समारोह को प्रमुख अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए व्यक्त किये। माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी एवं समारोह के मुख्य अतिथि सरसंघ चालक माननीय श्री मोहन भागवत ने शिक्षा जगत में उल्लेखनीय सेवाएँ प्रदान करने वाले विशिष्ट महानुभावों को ‘शिक्षा- भूषण’ सम्मान से अलंकृत किया।

माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी, कुलाधिपति देसंविवि ने अपने उद्बोधन में देश में शिक्षा की आदर्श प्रणाली विकसित करने के लिए गायत्री परिवार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की संक्षिप्त जानकारी भी दी। इस क्रम में शांतिकुंज में आयोजित हुए उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के प्रधानाचार्यों के शिविर का उल्लेख भी किया, जिसमें सम्मानित हो रहे शिक्षक श्री दीनानाथ बत्रा भी भाग ले चुके हैं।

शांतिकुंज प्रमुख ने अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के कार्यों की सराहना करते हुए डॉ. हेडगेवार, माननीय सुदर्शन जी, माननीय रज्जु भैया आदि का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति के आदर्श उनके जीवन में कूट- कूट कर भरे थे। महासंघ से जुड़े शिक्षक उन्हीं की महान परम्परा का अनुसरण कर समाज की बड़ी सेवा कर रहे हैं।

शिक्षक आचार्य बनें

माननीय श्री मोहन भागवत जी ने शिक्षकों के दायित्वों का उल्लेख करते हुए कहा कि हर विद्यालय में अच्छी ही बातें पढ़ायी जाती हैं, लेकिन विद्यार्थी सुनने से नहीं सीखते, वे वही बनते हैं जो उन्हें दीखता है। सिखाने वाले में जो दिखना चाहिए वह नहीं दिखता, इसीलिए विद्यार्थी भटक जाते हैं। शिक्षकों का दायित्व है कि वे अपने अनुकरणीय आचरण से विद्यार्थियों का व्यक्तित्व गढ़े, आचार्य बनें।

सम्मान की पुण्य परम्परा

माननीय श्री भागवत जी ने अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षकों के योगक्षेम के लिए किये जा रहे उत्कृष्ट कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि सरकारी तंत्र में पुरस्कार एक परम्परा बन गयी है, जिसके मानकों को पूरा करने वाले सम्मानित होते हैं, लेकिन बहुत सारे शिक्षक ऐसे हैं जो दूर- दराज में रहकर किसी प्रकार के सम्मान की आकांक्षा न रखते हुए समाज की सेवा कर रहे हैं, उन्हें खोजकर सम्मानित करना समाज का काम है। सम्मान की इस परम्परा से केवल शिक्षक ही सम्मानित नहीं होता, बल्कि उसके माध्यम से समाज को प्रेरणा मिलती है।
कार्यक्रम की रूपरेखा

‘शिक्षा- भूषण’ सम्मान समारोह २४ जुलाई को नई दिल्ली के केदारनाथ साहनी सभागार, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी सिविक सेण्टर में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता शैक्षिक फाउण्डेशन के अध्यक्ष एवं अ.भा.रा.शै. महासंघ के पूर्व अध्यक्ष श्री के. नरहरि ने की। दिल्ली के अलावा पूरे देश से आये शिक्षाविद्, शिक्षकगण, संघ और गायत्री परिवार के कार्यकर्त्ता लगभग १२०० की संख्या में इस समारोह में उपस्थित थे।

इसका शुभारंभ नन्ही छात्राओं द्वारा सरस्वती वंदना से और समापन ‘वंदे मातरम ...’ गान से हुआ। मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के पश्चात् अ.भा.रा.शै. महासंघ के महामंत्री श्री जे.पी. सिंघल ने कार्यक्रम की प्रस्तावना के साथ मुख्य अतिथियों का परिचय दिया। शिक्षक सम्मान आयाम प्रमुख श्री जयभगवान गोयल ने सभा के अंत में अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

अ.भा. राष्ट्रीय शिक्षक महासंघ

अ.भा.रा.शै. महासंघ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक इकाई है। यह महासंघ देश में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है। यह शिक्षकों की समस्याओं के समाधान के लिए शासकीय एवं गैर शासकीय प्रयास करता रहा है। शिक्षकों का गौरव बढ़ाने के लिए ‘गुरुवंदन’ और उन्हें उनके दायित्वों का बोध कराने के लिए ‘शिक्षक बोध दिवस’ जैसे कार्यक्रम इस महासंघ द्वारा चलाये जाते हैं।

शिक्षकों द्वारा शिक्षकों का सम्मान

इसी कड़ी में गतवर्ष से ‘शिक्षा- भूषण’ शिक्षक सम्मान का कार्यक्रम जुड़ा। इससे आदर्श शिक्षकों के अनुकरण की प्रेरणा समाज को मिल रही है। सम्मान की भी आदर्श परम्परा है। संघ द्वारा अपने सदस्यों से सदस्यता ग्रहण करते समय मात्र १०० रुपये का चंदा लिया जाता है। इसी से पुरस्कार की यह पुण्य परम्परा एवं अन्य योजनाएँ चलती है, किसी का अनुदान नहीं लिया जाता।


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